मुल्क को सैनिक तर्बीयत की जरूरत

आगरा। विगत में ‘कासिम’, ‘गौरी’ और ‘गजनवी’ के नाम से संदेश भेजकर देश के मुख्तलफ हिस्सों में आतंकी हमला करने वाला संगठन इंडियन मुजाहिदीन इस बार भले ही चुप है, लेकिन शक की सुई उसी पर जाकर टिक रही है। हैदराबाद धमाके  का अंदाज पूरी तरह से इंडियन मुजाहिदीन से ही मिल रहा है। अब तक किसी भी तरह की ठोस सुराग हासिल नहीं करने के बावजूद जांच एजेंसियां भी इस बात को स्वीकार कर रही हंै कि इस हमले में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ हो सकता है। पिछले कुछ समय से इंडियन मुजाहिदीन भारत में अपने नेटवर्क का विस्तार तेजी करने की कोशिश कर रहा है और बहुत हद तक उसे अपने अभियान में सफलता भी मिल रही है। कसाब और अफजल गुरु की फांसी के बाद से आतंकी सगंठनों की ओर से हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। यही वजह है कि पूरे मुल्क को हाई अलर्ट कर दिया गया था। इसके बावजूद आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब हो गये। आज यह दावे के साथ कोई नहीं कह सकता कि आने वाले दिनों में और हमले नहीं होंगे। चूंकि अब हैदराबाद हमले में संलिप्त किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हुई है, इसलिए कहा जा सकता है कि हमलों का सिलसिला जारी रहेगा, भले ही स्थान बदल जाये। अब सवाल उठता है कि मुल्क को इस तरह के हमलों से कैसे निजात दिलाई जाये?
यह दुर्भाग्य की बात है कि अभी तक आतंकवाद को लेकर एक राष्टÑीय सोच नहीं बनी है और न ही राष्टÑीय चरित्र। हर बार हमले के बाद व्यापक पैमाने पर रोष जताने का सिलसिला चलता है, फिर धीरे-धीरे हम सब कुछ भुलाकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। सुरक्षा महकमों से जुड़े लोग भी अगला हमला होने तक शांत पड़ जाते हैं या फिर उनकी रफ्तार धीमी हो जाती है। इस मामले में भारत को अमेरिका से सीखना चाहिए। ट्विन टावर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिकी राष्टÑपति जूनियर बुश ने आतंकियों को नेस्तनाबूत करने की कसम खाई थी और पूरा राष्टÑ उनके साथ था। बाजाब्ता आतंकवाद के खिलाफ जंग की शुरुआत की गई और वहां का हर नागरिक अपनी पूरी शक्ति के साथ इस जंग में शामिल हो गया। इसी का नतीजा है कि आज अमेरिका की सुरक्षा चाक-चौबंद है और उसे दूसरा हमला नहीं झेलना पड़ा। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की यह कोशिश रहती है कि किसी भी तरह की आतंकी घटना घटने के पहले ही उसमें शामिल लोगों को गिरफ्त में ले लिया जाये। जर्मनी और इंग्लैंड के निवासी भी जेहनी तौर पर आतंकवाद का सफाया करने के लिए तैयार हो गये हैं। यही वजह है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग उनके दिन-प्रति दिन के जीवन में शामिल है। यहां तक कि तमाम मजहबी संस्थाओं को भी ताकीद कर दी गई है कि अवांछित तत्वों को वे प्रश्रय न दें। वैसे वहां के मजहबी संस्थान इस बात को लेकर खुद अलर्ट हैं।
भारत में स्थिति ठीक इसके उलट है। बार-बार होने वाले हमलों के बावजूद यह चिह्नित करने की कोशिश नहीं की जा रही है कि मुल्क में आतंकियों को फलने-फूलने के लिए खाद और पानी कहां से मिल रहा है। इनका अंतिम उद्देश्य क्या है? इतना तो तय है कि मुल्क में आतंकवाद मजहब की आड़ में ही फैल रहा है। इस सच्चाई से आंख चुराने का मतलब होगा बीमारी को जानबूझकर समझने से इनकार करना। दुनिया के हर मजहब में दूसरे मजहब को नकारने की भावना भी बलवती होती है। इस सच्चाई को भी हमें स्वीकार करना होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो यूरोप को ‘क्रूसेड’ से नहीं गुजरना पड़ता और अरब से ‘जिहाद’ की लहर नहीं उठती, हिन्दुस्तान में ‘धर्मयुद्ध’ के नारे नहीं बुलंद होते। इस बात को निस्संकोच स्वीकार करना होगा कि मजहब और आतंकवाद एक दूसरे से जुड़े हुये हैं।
मजहब के सहारे ही आतंकवाद पैर पसारता है। स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब अपने लिए मनोनुकूल फिलॉसॉफी गढ़ते हुये यह व्यावहारिक स्तर पर संगठन का रूप लेता है और दूसरों को हलाक करने लगता है। मजहब के लिहाज से भारत एक जटिल मुल्क है और यही वजह है कि आतंकवाद के लिए यह मुफीद भी है। सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों के लिए यहां भरपूर गुंजाइश है। थोड़ी सी कोशिश करने पर कम पढ़े-लिखे ‘जेहाद’ की राह पर चलने के लिए तैयार युवा इन्हें सहजता से मिल जाते हैं। थोड़ा सा ब्रेन वॉश के बाद  ‘शहादत’ को ही वे अपनी जिंदगी का मकसद समझने लगते हैं। इंडियन मुजाहिदीन इसी ‘शहादत’ की भावना के सहारे अपने नेटवर्क का विस्तार करने में लगा हुआ है। इसके पहले यह काम सिमी द्वारा किया जा रहा था।
इंडियन मुहाहिदीन का उद्देश्य दक्षिण एशिया में ‘खिलाफत’ की स्थापना करना है। स्वाभाविक है कि भारत में खिलाफत की स्थापना वह भारतीय संविधान की कब्र पर करने की मंशा रखता है। अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उसने भारत के खिलाफ स्पष्ट रूप से युद्ध छेड़ रखा है।  खौफनाक बात यह है कि इस युद्ध में निशाना भारतीय सेना नहीं बल्कि आम नागरिक हंै। चार जून, 2010 को भारत सरकार ने इंडियन मुजाहिदीन को एक आतंकवादी संगठन घोषित करते हुये उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। अमेरिका और इंग्लैंड की हुकूमत ने भी इसे आतंकवादी सूची में डाल रखा है। लेकिन इसका कार्य क्षेत्र भारत ही है। सार्वजनिक स्थलों को यह टारगेट बनाता है।
भारत बहु संस्कृतियों से भरा एक विशाल देश है। विभिन्न धर्मों व मतों के लोगों को अपने विश्वासों के प्रचार-प्रसार के लिए यहां पूरा अवसर मिलता है। यहां का संविधान उनके पक्ष में है। आतंकी मानसिकता वाले लोग इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं। यह हकीकत है कि कई  गैर मुल्की खुफिया संगठनों के लोग भारत में मजहब की आड़ में ही सूचनाएं एकत्र करने का काम कर रहे हैं। जब मुल्क के अंदर ही उनकी मानसिकता के लोग मिल जाते हैं तो उनका काम और आसान हो जाता है। भारत में लश्करे तोइबा, जैशे मोहम्मद, इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन गैर कानूनी तरीके सक्रिय हैं। इनका नेतृत्व उन खतरनाक आतंकियों के हाथों में है, जो कहीं दूर बैठ कर भारत को तबाह करने की साजिशों में लगे हुये हैं।
खुफिया संगठनों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इंडियन मुजाहिदन अब दक्षिण भारत में अपने संगठन का विस्तार तेजी से कर रहा है। केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु पर इस संगठन की गतिविधियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। इसकी कोशिश गरीब तबके के नौजवानों को अपने साथ जोड़ने की होती है। पहले उन्हें मजहब की घुट्टी पिलाई जाती है और फिर उन्हें यह समझाया जाता है कि उनकी काहिली की वजह से उनका मजहब खतरे में पड़ा हुआ है।  फिर उन्हें जेहाद का मंत्र दिया जाता है। ओवैसी और तोगड़िया जैसे नुमाइंदे अपने उत्तेजक भाषणों से एक तरह से ऐसे संगठनों को अपना बेस तैयार करने में मदद ही करते हैं। ऐसे नुमाइंदों के भाषणों से भड़के हुये युवा सहजता से कट्टरता की राह पर चल निकलते हैं। अब ऐसे नौजवानों की पहचान करना और उन पर नजर रखना एक मुश्किल काम है। यदि पूछताछ के लिहाज से किसी को पकड़ा भी जाता है तो मानवाधिकारवादी संगठन हंगामा मचाने लगते हैं, जिसका फायदा तमाम अतिवादी संगठनों को मिलता है।
पिछले एक दशक में भारत में कई आतंकी हमले हो चुके हैं। पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि हैदराबाद का ताजा हमला आखिरी हमला नहीं है। इस सिलसिला को खत्म करने के लिए मुल्क के लोगों को जेहनी और व्यावहारिक तौर पर तैयार होना होगा। व्यवस्था को कोसने से सूरत बदलने वाली नहीं है। इसके लिए सरकार को भी आम नागरिकों को सामूहिक रूप से प्रशिक्षिति करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ जंग को भारत में वैसे ही लेने की जरूरत है, जैसे इसे अमेरिका में लिया जा रहा है। आतंकवाद को लेकर राष्टÑीय स्तर पर एक तौर तरीका तो अपनाना ही होगा। भीड़ भी सुसंगठित हो सकती है, इसका सबसे बेहतर उदाहरण इस्राइल है। कुछ अरसे की सैनिक तर्बीयत तो मुल्क के हर व्यक्ति को दी जानी चाहिए, ताकि भीड़ से इतर एक मजबूत राष्टÑीय चरित्र उभर कर सामने आ सके।
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