दो दौरों की एक कहानी

संजय राय

संजय राय,  नई दिल्ली

दुनिया में छाई आर्थिक मंदी के बीच अमेरिका और समूचे यूरोप के देश मायूसी के माहौल से बाहर निकलकर बीते खुशगवार दिनों की वापसी के लिये जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। अमीर देशों का यह समूह अपनी उन्नत तकनीक के बल पर आर्थिक विकास के जिस चरम बिंदु पर पहुंचा था, आज उससे काफी नीचे गोता लगा चुका है। महामंदी के इस दौर में एशिया की बड़ी आबादी वाले दो देश चीन और भारत इन देशों की मंदी को दूर करने का एक स्वाभाविक आकर्षण केन्द्र बन चुके हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सैनिकों की अगले साल तक पूरी तरह से वापसी की पृष्ठभूमि मे अमीर देशों की नजर में चढ़ा यह इलाका भविष्य में महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा को जन्म देगा। इसका स्वरूप क्या होगा, यह अभी समय के गर्भ में छिपा है।

उक्त संदर्भ का जिक्र पिछले दिनों भारत के दौरे पर आये फ्रांस और ब्रिटेन के आला नेताओं को ध्यान में रखकर किया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रैंकोइस होलांडे के दौरे के तुरंत बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की भारत यात्रा ने उस शाश्वत सत्य को एक बार फिर से रेखांकित किया है कि वक्त सबका आता है और दुनिया के लिये मौजूदा वक्त भारत का है। वक्त का तकाजा यही है कि आज का भारत समूची दुनिया के लिये कई लिहाज से महत्वपूर्ण हो गया है। महामंदी के इस माहौल में भारत पर कभी शासन करने वाले फ्रांस और ब्रिटेन के आला नेताओं की इन यात्राओं के दौरान 12 बिलियन अमेरिकी डाॅलर यानि 651 खरब रूपये की कीमत का 126 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा चर्चा में रहा। फ्रंास के साथ इस सौदे को लेकर चल रही बातचीत पर कैमरन की यात्रा की जो छाया पड़ी उसकी चर्चा मीडिया में खूब रही। होलाण्डे की पेरिस से रवानगी से पहले ही ब्रिटेन, फ्रांस और भारत के मीडिया में बड़े जोर-शोर से बहस छिड़ी कि भारत सरकार फ्रांस के साथ इस सौदे को रद्द करके बिटेन के साथ कोई दूसरा सौदा करने के बारे सोच रही है। रक्षामंत्री एके एंटनी को इसका औपचारिक तौर पर खंडन करना पड़ा।

भारत के साथ फ्रांस और ब्रिटेन के बीच लंबे ऐतिहासिक सम्बंधों का दायरा काफी विस्तृत है, लेकिन इन दो यात्राओ  का पं्रमुख उद्देश्य यही रहा कि भारत के विशाल बाजार का हर तरह से फायदा उठाकर अपने-अपने देशों की आर्थिक मंदी को जल्द से जल्द दूर करना। इन यात्राओं के दौरान दोनों देशों के साथ हालांकि कई क्षेत्रों में समझौतों और करारों पर दस्तखत किये गये, लेकिन होलाण्डे और कैमरन की नजर विशेष रूप से  भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिये अपने- अपने हथियारों को बेचने पर टिकी थी। हथियारों के अलावा दोनों देश चाहते हैं कि भारत के उद्योगपति उनके यहां निवेश करें जिससे कि बेरोजगार जवानों को रोजगार मिल सके। फा्रंस की अर्थवस्था औसतन एक फीसदी की दर से बढ़ रही है तो ब्रिटेन के विकास की दर  साल 2012 की आखिरी तिमाही में -0.3 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर थी। इनके मुकाबले भारत की 5 फीसदी विकास दर कहीं ज्यादा बेहतर है। यहां पर इस बात का विशेष रूप से जिक्र करना जरूरी लग रहा है कि फ्रंास के अखबारों में ऐसी खबर छपी है कि जब मुंबई में भारत के उद्योगपतियों ने होलांडे से कहा कि कुछ ही समय में हमारी आर्थिक विकास दर 10 फीसदी तक हो जायेगी तो उन्हें लगा कि वह कोई सपना देख रहे हैं। हालांकि भारत के मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखकर उद्योगपतियों की ओर से किया गया आर्थिक विकास का यह दावा संदेह के घेरे में है, लेकिन इतिहास यही बताता है कि इसे हकीकत में बदलना कोई असम्भव बात नहीं है।

वहीं दूसरी ओर डेविड कैमरन ने भी होलांडे की तरह मुंबई का दौरा किया और भारतीय उद्योगपतियों को अपने यहां निवेश करने का न्यौता दिया। इस मौके पर जब भारत के व्यापारियों ने वीजा को लेकर होने वाली दिक्कतों का जिक्र किया तो कैमरन ने तुरंत घोषणा की कि अब उन्हें एक दिन में वीजा मिल जायेगा। कैमरन ने भारत को यह नसीहत भी दी कि वह अपने यहां विशाल परिवहन इंफ्रास्ट्क्चर के निर्माण का काम बगैर कोई देरी किये शुरू करे। कैमरन अपने चार्टड वर्जिन हवाई जहाज से 164 सदस्यों वाले प्रतिनिधिमंडल के साथ आये थे। गौर करने की बात यह है कि ब्रिटेन के अब तक के इतिहास में वहां के प्रधानमंत्री के साथ भारत में आया यह सबसे बड़ा प्रतिनिधिमंडल है। कैमरन का लक्ष्य है कि भारत और ब्रिटेन के बीच साल 2010 तक 96278 करोड़ रूपये का जो व्यापार था, साल 2015 तक वह दो गुना बढ़कर 192556 करोड़ रूपये तक पहुंच जाय। वीवीआईपी हेलीकाॅप्टर सौदे को लेकर घूसखोरी की खबरों ने कैमरन की यात्रा को थोड़ा फीका तो किया, लेकिन इन दोनों दौरों ने भारत के भविष्य की कहानी की जो झलक पेश की वह हर लिहाज से गर्व करने लायक है। भविष्य के अवसरों को अपने पक्ष में बनाये रखना हमारे नेताओं और रणनीतिकारों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। अगर हमें दुनिया की सबसे आर्थिक ताकत बनना है, तो इसके लिये अभी से ठोस रणनीति बनानी होगी।

इन दोनों देशों के आला नेताओं की यात्राओं के दौरान व्यापार और कारोबार के अलावा कई अहम क्षेत्रीय मसलों पर गम्भीर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद जारी साझा बयानों में जो बात समान दिखाई देती है वह है अफगानिस्तान को लेकर भारत की वाजिब चिंताओं से फ्रांस और ब्रिटेन सहमत हैं। लेकिन दोनों साझा बयानों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि आतंकवाद, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर भारत के पक्ष में फ्रांस की आवाज ब्रिटेन से कहीं ज्यादा मुखर है। इसे संयोग कहा जाय या कुछ और, कैमरन जिस समय हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर रहे थे, उसी समय कुछ ही दूरी पर भारत-अफगानिस्तान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच दूसरे दौर की त्रिपक्षीय बातचीत भी चल रही थी और अमेरिका की ओर से दक्षिण व मध्य एशियाई मामलों के विदेश राज्यमंत्री राॅबर्ट ओ ब्लेक इसमें हिस्सा ले रहे थे। पहली त्रिपक्षीय वार्ता 25 सितम्बर 2012 को न्यूयाॅर्क में हुई थी।

बहरहाल भारत के लिये यह सुकून की बात है कि फ्रांस और ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में भारत के रणनीतिक और सामरिक हितों को स्वीकार करके पाकिस्तान की कूटनीतिक धार को कमजोर किया है। इस बयान का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि भारत अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक हितों को सुनिश्चित करने लिये अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से सार्वजनिक तौर पर वचन ले रहा है और बदले में उनके साथ कारोबारी रिश्तों को इस तरह से मजबूत बना रहा है कि भविष्य में दोनों को इसका फायदा पहुंचे। इसे हमारी विदेश नीति की सफलता माना जायेगा।

पाकिस्तान चाहता है कि हर हाल में अफगानिस्तान की सरकार पर उसका वर्चस्व रहे, जबकि भारत ने वहां अपनी प्रभावी मौजूदगी बनाते हुये वहां की जनता के मन पर अच्छी छाप छोड़ी है। अफगानिस्तान में सरकारी मशीनरी को खड़ा करने और ढांचागत निर्माण में भारत का काफी योगदान रहा है और सबने इसका संज्ञान लिया है। पाकिस्तान को यह बात बुरी तरह अखर रही है। पर वक्त ने उसे अपने पैदा किये जिन्न से लड़ने को मजबूर कर दिया है। अगले साल यानि 2014 के बाद एक बार फिर से अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी का खतरा पूरी तरह बरकरार है और पाकिस्तान को छोड़कर यह पूरी दुनिया के लिये गम्भीर चिंता का विषय है। फ्रांस के साथ जारी साझा बयान में साफ कहा गया है कि अफगानिस्तान में आतंकी हिंसा के पीछे सीमापार पाकिस्तान में बैठी ताकतें जिम्मेदार हैं और उन्हें यह काम जल्द से जल्द बंद करना होगा।

इन दोनों यात्राओं से इतर जरा हम छह महीने पहले भारत में बने माहौल को याद करें।  सरकार की निर्णय क्षमता को लेकर ही तरह-तरह के सवाल उठने लगे थे। ऐसी चर्चाओं का बाजार गरमाने लगा था कि नीतिगत लकवे से ग्रस्त यूपीए-2 सरकार बस गिने-चुने दिनों की ही मेहमान है। पी चिदम्बरम द्वारा वित्त मंत्रालय की कमान संभालने के बाद आर्थिक सुधारों की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर आती दिख रही है। ऐसा लग रहा है कि अगले आम चुनाव में हार का जोखिम उठाकर भी सरकार आर्थिक मोर्चे पर मजबूती को बरकरार रखने के लिये वो सारे कदम उठायेगी जो उसकी नजर में जरूरी हैं। ममता बनर्जी द्वारा यूपीए सरकार से समर्थन वापसी की परवाह किये बगैर केंद्र सरकार ने संसद में एफडीआई के फैसले को मंजूरी दिलवाकर दुनिया को संदेश दिया है कि वह तमाम मुसीबतों के बावजूद आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर अपनी नीतियों को आगे बढ़ायेगी। होलाण्डे और कैमरन के दौरों अब यह साफ हो गया कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को आकर्षित करने के लिये डाक्टर मनमोहन सिंह ने कड़वी दवा का जो डोज दिया था, वह कारगर साबित हुआ है।

मंदी की मार से परेशान महाशक्ति अमेरिका सहित समूची दुनिया भारत के आर्थिक विकास की कहानी को बड़े गौर से देख-सुन रही है। होलांडे और कैमरन की भारत यात्रा इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कडी है। एक दौर वो था जब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत चला करती थी। फ्रांस ने भी भारत के कई हिस्सों को अपने शासन में शामिल कर रखा था। भारत को 1947 में आजादी मिली और महज 65 साल के छोटे से काल में वक्त का पहिया 180 डिग्री घूम चुका है। अब भारत का वक्त है। आइये फ्रैंकोइस होलांडे और डेविड कैमरन को हम अपनी पलकों पर बैठायें, इनकी जरूरतों को जरूर पूरा करें, लेकिन इससे पहले यह सुनिश्चित कर लें कि हम इसकी हर कीमत इनसे वसूलने में कोई कोर-कसर बाकी न रखें।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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