सूरज प्रकाश: अपनी बात (पार्ट – 1)

बहुत  सारे बिम्ब हैं। स्मृतियां हैं। दंश हैं। बहुत सारी खुशियां हैं।  बहुत कुछ ऐसा है जो अब तक किसी से बांटा नहीं है। न आमने सामने और न लेखन के ज़रिये ही। मुझे नहीं पता कि सब लिखने पढ़ने वालों के साथ ही ऐसा होता है कि लगातार लिखने के बावजूद बहुत कुछ ऐसा रह जाता है जो न कहा जाता है न लिखा ही जाता है।

एक बार वरिष्ठ कथाकार गोविन्द मित्र ने कहा था कि आम आदमी में और लेखक में यही फ़र्क होता है कि दोनों ही भरे हुए बादलों की तरह होते हैं। लेखक बरस कर खुद को हलका कर लेता है और आम आदमी बिना बरसे आगे गुजर जाता है। इसी बात को आगे बढ़ाऊं? तो लेखक भी खुद को पूरी तरह कहां खाली कर पाता है। हर पल कुछ न कुछ तो नया जुड़ता रहता है। अच्‍छा, बुरा, जो कहे जाने लायक होते हुए भी कहे जाने से हमेशा रह जाता है। उसी की टीस हमेशा सालती रहती है। यही टीस बीच बीच में जब ज्यादा घनी हो जाती है तो शब्द रूप में आकार ग्रहण करती है। टीस की यह खजाना न कभी खाली होता है न पूरी तरह से मुक्ति देता है। जिस दिन ये टीस नहीं रहेगी, लिखने – कहने के लिए ही कहां  कुछ रह जायेगा।

मेरे पास भी तो ऐसा बहुत कुछ अनकहा है। पता नहीं कभी कह पाऊंगा या नहीं। कभी सोचा भी नहीं था लेखन से जुड़ूंगा। जिस किस्म के माहौल में रहा और जिस किस्म की परवरिश हिस्से में आयी, उसमें इतने खूबसूरत, अपनेपन से लबरेज और बेहद विस्तृत संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। कभी सोच ही नहीं सकता था, शब्दों का इतना खूबसूरत संसार मेरे हिस्से में भी आयेगा।

यहां मैं बचपन के अभावों, तकलीफों और पढ़ाई को लेकर दूसरी दिक्कतों का बिल्कुल भी ज़िक्र किये बिना बचपन की एक ऐसी  घटना शेयर करना चाहूंगा जिसने मेरे बाद के जीवन की दिशा ही बदल डाली।

तब उम्र तेरह चौदह साल की रही होगी। उन दिनों हम अपने पिता जी के पास गर्मियों की छुट्टियों में मसूरी गये हुए थे। उन दिनों उनकी पोस्टिंग वहीं थी। मैं अपने बड़े भाइयों और दोस्तों के साथ जिंदगी में पहली बार (और आखिरी बार भी) अपने घर के पास वाले मैदान में क्रिकेट खेल रहा था। एक टूटा हुआ सा बैट था और हमारी खुद की बनायी हुई लकड़ी की गेंद थी। अचानक गेंद सीधे मेरे मुंह पर आ कर लगी और सामने को आधा दांत टूट गया। ये मेरे जीवन की पहली और आखिरी गेंद थी जो मैंने खेली थी। मैं रोता हुआ घर आ गया। दांत टूटने की पीड़ा तो दो एक घंटे में चली गयी होगी लेकिन जिस पीड़ा ने मेरा पीछा बहुत देर तक, पच्चीस तीस साल तक की उम्र तक नहीं छोड़ा, वह थी उस टूटे दांत की वज़ह से उस वक्त रख दिये गये नाम से चिढ़ाये जाने की पीड़ा। मेरे भाई और सब दोस्त मुझे दांत टूटा बकरा कह कर चिढ़ाने लगे थे। मेरा चेहरा वैसे भी लम्बोतरा है। मैं रोता, गुस्सा करता तो उन्हें और मज़ा आता। वे और चिढ़ाते। सामने भी और पीठ पीछे भी। मेरे लिए सबके पास अब यही संबोधन था। कोई भी मेरी पीड़ा को समझने को तैयार नहीं था। नतीजा यह हुआ कि मैंने उनके साथ खेलना बंद कर दिया। मैं अकेला होता चला गया और अपने अकेलेपन की एक अलग ही दुनिया में विचरने लगा। इस टूटे दांत की वजह से मैं किसी से बात करने में भी शरमाता। हीनता की ग्रंथि इतनी अधिक घर कर गयी कि मुंह पर हाथ रख कर बात करता। कहीं किसी को मेरा टूटा दांत नज़र न आ जाये। कोई बड़ा आदमी मुझसे बात करता तो मैं बात ही न कर पाता। मैं खुद अपनी तरफ से पहल न कर पाता। लड़कियों से बात करने लायक आत्मविश्वास तो मुझमें बहुत देर बाद तक नहीं आ पाया था। अभी भी शायद नहीं है। मन ही मन घुटता रहता। बेशक थोड़े बहुत दोस्त बाद में बने लेकिन मेरा खोया आत्मविश्वास वापिस नहीं मिला। घर में कभी किसी को सूझा ही नहीं कि सौ पचास रुपये खर्च करके मेरे इस आधे टूटे दांत का कोई इलाज ही करा देते। वहां पहले से ही कई समस्याएं थी। आर्थिक दबाव थे। जानकारी का अभाव था और ये काम प्राथमिकता में नहीं आता था।

शायद ऐसी ही मन:स्थिति में सातवीं आठवीं में पहली बार तुकबंदी की होगी। कविता की कोई समझ तो थी नहीं। बेशक पढ़ने का शौक था और हम भाई लोग देहरादून की इकलौती लाइब्रेरी, खुशी राम पब्लिक लाइब्रेरी में पढ़ने के लिए जाते थे, लेकिन तब यह पढ़ना चंदामामा, राजा भैया और बाल भारती तक ही सीमित था। बहुत हुआ तो प्रेम चंद की बाल कथाओं की कोई किताब ले ली। तो इसी तरह तुकबंदी करके अपने अकेलेपन को बांटता। पढ़ाई में हम पांचों भाई  और हमारी इकलौती बहन औसत ही थे।

बचपन में हमारे एक चाचा नौकरी के सिलसिले में हमारे घर में ही रहने के लिए आये। पिता जी तब 6 महीने मसूरी और 6 महीने टूर पर रहा करते।  डेढ़ कमरे का मकान। आर्थिक दबाव। उसी घर में दादा, दादी, बूआ और दो चाचा तथा हम छः भाई बहनों का बोझ अकेले ढोती मां जो अपनी तकलीफों का किसी से भी न कह पाने की पीड़ा को हम सबको पीट पीट कर गुस्से के रूप में हम पर उतारती। सारा बचपन ही मार और डांट खाते बीता। कुछ भी सहज नहीं, सुलभ नहीं। शायद यही वजह है कि अपने बच्चों पर मैंने आज तक हाथ भी नहीं उठाया है। हमें नियमित जेब खर्च नहीं मिलता था, इसी वजह से हम अपने छोटे छोटे खर्च पूरे करने के लिए घर का सामान लाने में बेईमानी करते, सामान कम तुलवा कर लाते, ज्यादा दाम बताते या दूसरी ओछी हरकतें करके दो चार आने बचा लेते।

घर की यह हालत थी कि उस घर में लैट्रिन का दरवाजा टूट गया तो बरसों तक लगवाया नहीं जा सकता। एक टाट का परदा लटकता रहा।  घर में लाइट नहीं थी। एक ही लैम्प होता और उसी के जरिये सारे काम निपटाये जाते। बाद में स्थानीय चुनावों में वोटों के चक्कर में एक उम्मीदवार ने हमारी गली में बिजली लगवायी तो शायद यह हम पर बहुत बड़ी मेहरबानी थी कि वह खम्बा हमारी ही दीवार पर लगवाया गया और हमारा घर रौशन हुआ। दसवीं और  बारहवीं की पढ़ाई उसी खम्बे के बल्ब तले पूरी की गयी। इससे पहले पड़ोस से एक बल्ब के लायक बिजली लेते और मुंह मांगे दाम देते, उनकी धौंस अलग से सहते।

उस डेढ़ कमरे के घर का यह आलम था कि बरसात में सारा घर चूता और कोई भी बरतन ऐसा न बचता जो टपकते पानी के नीचे न रखा हो। सारी सारी रात टपकते पानी से बचते बचाते बीतती।

आस पास का माहौल भी बहुत अच्‍छा नहीं था। मच्‍छी बाजार में घर, आस पास कच्ची शराब बिकती, जूआ चलता और सट्टे के लेनदेन होते। आये दिन चाकू चलते। ऐसे माहौल में अच्‍छे संस्कारों की उम्मीद ही कैसे होती। सारे लड़के हरामी और आवारागर्द। गरीब लोगों का इलाका।

ऐसे में पढ़ाने का चाचा का आतंकित करने वाला तरीका। वे आफिस से जल्दी आकर देखते कहीं हम आवारागर्दी तो नहीं कर रहे।  करते भी थे लेकिन डरते डरते। खूब पीटते वे। इसका और शायद आस पास के माहौल का भी नतीजा रहा कि हम में से किसी भाई  को आज तक न पतंग उड़ाना आता है न कंचे खेलना। हर खेल में हम डरते डरते हिस्सा लेते और कभी कोई तीर नहीं मार सके। अक्सर पिट कर आ जाते। इसी वजह से हम सब भाई हमेशा फिसड्डी रहे। सारे के सारे भाई दब्बू निकले। औसत ज़िंदगी जीते रहे। पतंग उड़ानी मैंने कुछ बरस पहले अहमदाबाद में उत्तरायण के मौके पर सीखी। और कोई खेल आज तक आता नहीं। न गाना और न ही नाचना या और तरह की धींगा मस्ती करना।

जब मैं ग्यारहवीं में था और दोनों बड़े भाई बारहवीं में तो हम सब के सब भाई बहन अपनी अपनी कक्षा में फेल हो गये। हम तीन बड़े भाइयों की पढ़ाई रुक गयी। सबसे बड़े भाई को जैसी भी छोटी मोटी नौकरी मिली, उसी में ठेल दिये गये। मेरी अपनी उम्र थी कुल जमा सत्रह बरस। तभी हर तरह के धंधे करने पर विवश होना पड़ा। कभी लॉटरी के टिकट बेचे तो कभी आवाज लगा कर कच्‍छे बनियान और रूमाल तक बेचे। ट्यूशनें पढ़ायीं, सेल्समैनी की। ये सब टटपूंजिये धंधे किये। शर्म भी आती। आस पास के साथी और परिचित लड़कियां क्या कहेंगी लेकिन कुछ तो करना ही था। हां, ये सब करते समय यह हमेशा दिमाग में रहा कि सिर्फ यही नहीं करते रहना है। और भी कुछ करना है। बेशक पढ़ाई नहीं थी लेकिन भीतर एक उम्मीद सी टिमटिमाती थी कि चीज़ें यूं ही नहीं रहेंगी।

संयोग ऐसा बना कि एक फटीचर नौकरी के साथ साथ प्राइवेट तौर पर इंटर की परीक्षा देने का मौका मिल गया। इंटर के बाद मार्निंग कॉलेज से बीए करना चाहता था लेकिन फीस वगैरह के लिए पांच सौ रुपये नहीं थे, सो एडमिशन नहीं करवा पाया। एक सेमिस्टर बेकार गया। अगले सेमेस्टर में भी यही हाल था। नौकरी करने के बावजूद पैसे नहीं थे। वेतन था शायद 120 रुपये महीना। उन्हीं दिनों पिता जी सरकारी कर्ज से मकान बनवा रहे थे। तय था घर में बहुत तंगी चल रही थी और जितने पैसे उनके हाथ में थे, उससे मकान  पूरा नहीं हो सकता था। वे सारे दोस्तों के कर्जदार हो चुके थे। बेशक अब तक  दोनों बड़े भाई पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने लगे थे लेकिन वे चाचा के पास दूसरे शहर में थे और ज्यादा मदद नहीं कर पा रहे थे।

आज भी मुझे वह तारीख अच्‍छी तरह याद है। 25 नवम्बर 1971 थी। दूसरे सेमेस्टर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी और घर में सिर्फ 400 रुपये थे जिससे उसी दिन सीमेंट लाया जाना था। पिताजी ने मेरा उदास चेहरा देखा और भरे मन से वे सारे रुपये मुझे थमा दिये – जा एडमिशन ले ले। घर बनता रहेगा।

यह मेरे प्रति उनका पहला त्याग था। मैं आज तक उनकी वे नम आंखें नहीं भूल पाया हूं। भूल सकता भी नहीं। भूलना भी नहीं चाहिये।

और इस तरह मेरा बीए पूरा हुआ था। तब तक मेरी भी पक्की नौकरी लग चुकी थी। नक्शा नवीस की। दो एक कविताएं भी स्थानीय अखबारों में छप गयी थीं लेकिन तब तक न किसी लेखक से परिचय था न कुछ ढंग की चीजें ही सिलसिलेवार पढ़ने का अवसर मिल पाया था। सुबह छः बजे से नौ बजे तक कॉलेज, दिन में नौकरी और शाम को एकाध ट्यूशन।

बीए करते ही मुझे घर से तीन हज़ार किमी दूर हैदराबाद में अनुवादक की नौकरी मिली। जिस वेतन मान में पिताजी नौकरी के 25 साल बाद पहुंचे थे, मैं उससे अपने कैरियर की शुरूआत कर रहा था। हैदराबाद में ही एमए के लिए इवनिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया। बाइस बरस की उम्र। पहली ही बार में घर से इतनी दूर। रहने खाने की तकलीफें भी। एक बार फिर से व्यस्त दिनचर्या।

एक अच्छी मित्र बनी। वह डे कालेज में थी और मैं इवनिंग में। अक्सर फोन करती। उसे फोन करने के लिए अपनी सहेली के घर जाना पड़ता। वहां से वे एक ऐसे तबेले में जा कर फोन करतीं जहां उस वक्त कोई न होता। इसमें उन्हें दो तीन घंटे और ढेर से रुपये लगते लेकिन उन्हें इसमें सुख मिलता और मुझे अच्छा लगता कि कोई है यहां। लेकिन बाद में उसकी शादी हो गयी, टूटी और वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर फिर से जीवन के संघर्षों से दो चार होती रही। ये अलग विषय है।

हैदराबाद में मेरे रूम पार्टनर मेरे ही संस्थान के थे और हद दर्जे के बिगड़े हुए थे। रात रात भर हमारे घर में ताशबाजी चलती। मुझे भी घसीट लिया जाता। मैं कालेज से थका हुआ आता, कुछ पढ़ना चाहता लेकिन घर पर खेल जमा होता। वे मेरा मज़ाक उड़ाते। लेकिन मैं अपने दब्बू स्वभाव के चलते उनसे लड़ भी न पाता। वे दोनों बाहर रंडीबाजी करते, आवारागर्दी करते, लेकिन मैं किसी तरह खुद पर काबू पाये रहता। कई बार अलग रहने की सोची भी, लेकिन नहीं हो पाया।

एमए फाइनल के पेपर चल रहे थे। अगले  दिन भाषा विज्ञान का पेपर था। दोनों पार्टनर अचानक एक सड़क छाप लड़की को ले कर आ गये। लड़की सुबह से उनके साथ थी और वे सारा दिन उसके साथ आवारागर्दी करते रहे थे। जब तक खाना पीना चलता रहा, मैं उनका साथ देता रहा, लेकिन संकट बाद में शुरू हुआ। मैंने लड़की शेयर करने का उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। हालांकि मेरा कमरा अलग था और उन दोनों का कमरा अलग, बीच में दरवाजा, वैसे उसे बंद किया जा सकता था, लेकिन उस हाल में सुबह पेपर देने के लिए पढ़ पाना मेरे लिये बहुत मुश्किल काम था। वैसे भी अपनी जिंदगी में सैक्स की शुरुआत इतने बाजारू ढंग से करने के बारे में मैं सोच भी नहीं  सकता था। हालांकि इस वजह से मुझे उन दोनों से नामर्द की गाली खानी पड़ी, जिसे मैं झेल गया।

मैं रात मैं लैम्प की रोशनी में छत पर पढ़ता रहा। रात में ही किसी वक्त लड़की को बाहर निकाल दिया गया था। इस घटना ने मुझे कई बरस तक व्यथित किये रखा। आखिर इस घटना के 16 साल बाद 1992 में मैंने इस पर अपनी विवादास्पद कहानी उर्फ चन्दरकला लिखी और हिन्दी के तमाम लेखकों का नाराजगी मोल ली।

एमए में विश्वविद्यालय में मेरा दूसरा स्थान रहा। मैं स्थानीय होता तो पहला रहता।

उस वक्त तक और बाद में भी 1977 में देहरादून लौटा तब भी, घर लौट कर भी छटपटाहट, बेचैनी और कुछ न कर पाने की जद्दोजहद मेरा पीछा न छोड़ती। अकेलापन फिर साथ में।

इस बीच दिल्ली में तीन महीने की एक ट्रेनिंग के लिए जाना हुआ और वहां एक लड़की से परिचय हुआ। वह उसी कार्यालय में काम करती थी जहां ट्रेनिंग थी। हम दोनों ने तीन महीने खूब अच्छे से गुजारे और खूब बदनामी मोल ली।

उसी के कहने पर मैंने उस कार्यालय में रिक्तियों के लिए आवदेन किया और चयन हो गया लेकिन जब मैं वहां उसके प्यार के चक्कर में घर बार छोड़ कर दिल्ली आ गया तो वह बात करने को ही राजी न हो। मेरा दिल टूट गया, एक तो मैं एक बार फिर घर छोड़ कर चला आया था और यहां अकेला गया था। न खुदा ही मिला न विसाले सनम।

दरअसल हुआ यह था कि जब मेरा चयन हुआ तो पिता जी को तभी प्रोमोशन मिला और उन्हें शिलांग का स्थानांतरण मिला। हम दोनों में से कोई एक ही जा सकता था। उनकी इच्छा थी कि वे ये प्रोमोशन लें ले और बाद में वापिस आ जायेंगे तब मैं बाहर निकलने के बारे में सोचूं। लेकिन हम तो प्रेम में पागल थे सो एक न सुनी। पिताजी ने एक बार फिर मेरे पक्ष में त्याग किया। उन्हें अपने जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पद खोना पड़ा और उनकी पेंशन आदि पर काफी फर्क पड़ा। रुतबे पर तो पड़ा ही।

और मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली जाकर नई नौकरी करने के दौरान बेशक लेखकों के बीच उठना बैठना होता रहा लेकिन कुछ भी  लिखा नहीं जाता था। बहुत घुटन होती थी लेकिन शब्द नहीं सूझते थे। इस बीच देहरादून, हैदराबाद और दिल्ली में हुए दो तीन प्रेम प्रसंग धराशायी हो चुके थे। हर बार की तरह मैं अकेला ही रहा।

इस बीच एक और नौकरी बदली। हमेशा मन पर दबाव रहता। ज़िंदगी निरर्थक सी लगने लगती। समझ में नहीं आता था कि क्या और कैसे किया जाये। ढेरों अनुभव थे लेकिन उन्हें सिलसिलेवार कह पाना या लिख पाना ही नहीं होता था। तभी अपनी पुरानी कलीग एक और अच्‍छी लड़की से मित्रता हुई। उसका बहुत स्नेह मिला। ज़िदंगी में रस आने लगा। नौकरी अलग अलग जगह होने के कारण हमारा रोजाना मिलना संभव नहीं हो पाता था। तभी एक जगह तमिल भाषा के  तीन महीने के कोर्स का विज्ञापन देखा। हफ्ते में दो बार शाम को। आइडिया अच्‍छा लगा। दोनों ने एडमिशन ले लिया। अगले 3 महीने तक हफ्ते में दो बार पूरी शाम एक साथ गुजारने का सिलसिला बन गया। दिल्ली प्रवास के दौरान का वह वक्त बहुत ही अच्‍छा गुजरा। जिंदगी के नये मायने मिले। तब तक पिता जी भी तबादला लेकर दिल्ली आ गये थे। भाई बहन भी। हालांकि इस बीच दो तीन नौकरियां बदल चुका था और अब तक ठीक ठाक नौकरी कर रहा था लेकिन फिर भी कहीं एक छटपटाहट थी जो हर वक्त बैचैन किये रहती थी। लिखने की शुरूआत अब तक नहीं हो पायी थी। फालतू के दुनियावी धंधों में दिन गुजर रहे थे। घर वालों की तरफ से शादी के दबाव पड़ने शुरू हो गये थे। उम्र 28 की हो चली थी। हम दोनों शादी करना तो चाहते थे लेकिन घर वालों की रज़ामंदी से। उसके घर वाले मुझे जानते ही थे और वह भी हमारे घर कई बार आ चुकी थी। मेरे परिवार को कोई खास एतराज नहीं था। मेरे माता पिता वगैरह जब लड़की वालों से मिलने गये तो लड़की की मां बिदक गयी। जहर खाने की धमकी दे डाली। पूरा मामला ही खटाई में पड़ गया।

इस बीच मुंबई से रिज़र्व बैंक से इस नौकरी का आफर आ चुका था। एक बार फिर मैंने परिवार और पिताजी को धोखा दिया और उनके दिल्ली आने के कुछ ही दिन बाद बंबई की राह पकड़ी। वे लोग मेरे ही कारण दिल्ली आये थे।

बंबई के शुरू के दिन बेहद तकलीफ भरे गुजरे। रहने का जो ठिकाना मिला उन्हीं चाचा के घर जो बीस बरस पहले कई साल तक हमारे डेढ़ कमरे के घर में हमारे साथ रह चुके थे। चाचा के घर रहना बेहद तकलीफ भरा रहा। चाची बिला वजह तनाव में खुद भी रहती और सबको रखती। हालांकि सिर्फ रात का खाना ही खाता था, वह भी भरपेट नसीब न होता। जब वे लोग मेरे भरोसे घर छोड़ कर गर्मियों की छुट्टी में महीने भर के लिए बाहर गये तो चाची टीवी और फ्रिज तक को ताला लगा कर गयी थी। यह बहुत बड़ा अपमान लगा मुझे। बेशक चाचा को भी बुरा लगा लेकिन उनका बस चलता तो ये नौबत ही क्यों आतीं।

उस दिन बार में पहली बार बैठ कर मैंने एक बार में शराब पी और वह शायद मेरी जिंदगी का सबसे उदास दिन था। सारे रिश्ते नातों से मेरा मोह भंग हो गया था। लेकिन ये ही तो जीवन है।

जिस दिन चाचा चाची वापिस लौटे, उनके पंहुचने से आधा घंटा पहले ही उनका घर छोड़ दिया और पूरा दिन सामान लिये लिये ठिकाने की तलाश में भटकता रहा। शाम के वक्त अपने अधिकारी के यहां दो दिन के लिए शरण मांगी।

बड़ी मुश्किल से एक गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम हो पाया था। वहां अकेलापन बहुत काटता। रूम पार्टनर एक दूसरे से बात ही नहीं करते थे। कहीं कोई कुछ मांग न ले। कोई यार दोस्त था नहीं और हर तरह से मैं अकेला था।

घर को ले कर ये सारे के सारे बिम्ब मेरी अलग अलग कहानियों में आये हैं और अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो घर के जरिये मुझे कहना है। हालांकि मेरी पिछली कई रचनाओं और उपन्यास में भी घर बहुत शिद्दत से उभर कर आया है। कई कहानियों के नाम भी घर से जुड़े हुए है और थीम भी घर से मोह ही है। घर बेघर, छूटे हुए घर, खो जाते हैं घर, देस बिराना, मर्द नहीं रोते, सही पते पर, फैसले, छोटे नवाब बड़े नवाब तथा मेरी लम्बी कहानी देश, आजादी की पचासवीं वर्षगांठ तथा एक मामूली सी प्रेम कहानी, इन सब में घर ही है जो बार बार हांट करता है और कुछ नये अर्थ दे जाता है।

खैर, तो बात हो रही थी। बंबई के शुरुआती दिनों की। ऑफिस का माहौल बेहद तनाव भरा था और वहां गुटबाजी थी। नये आदमी को वैसे भी एडजस्ट करने में कुछ समय तो लगता ही है। कई बार सब कुछ छोड़ छाड़ कर वापिस भाग जाने का दिल करता। एकाध बार इस्तीफा भी लिख कर दिया। यह नया शहर जहां सिर्फ अकेलापन और अकेलापन था, मुझे रास नहीं आया था। आखिर आप कितने दिन और कब तक मैरीन ड्राइव की मुंडेर पर बैठ कर वक्त गुजार सकते हैं। वह भी अकेले। बाद में धीरे धीरे शहर के कुछ लिखने पढ़ने वालों से थोड़ा बहुत परिचय हुआ, कुछ यार दोस्त बने तो हम लोग खाली वक्त में मुंबई युनिवर्सिटी के लॉन में बैठने लगे। वहीं मधु से परिचय हुआ, आगे बढ़ा और इस जिंदगी के अकेलेपन का हमेशा के लिए खात्मा हुआ। बंबई आने के ढाई साल बाद विवाह। प्रेम विवाह। हमने 1983 में एरेंज्ड लव मैरिज की। अब तक अच्‍छी तरह से निभ रही है।

शादी के बाद ही जाना कि शादी के दिन से जो आपकी आज़ादी छिनती है, पूरी ज़िंदगी वापिस नहीं मिलती। बेशक आप परिवार से दूर अकेले रह क्‍यों न रह रहे हों, आप कभी अकेले नहीं होते। शादी शुदा ही होते हैं। हमेशा के लिए।

इस बीच कुछ लिखने की कई बार कोशिश की लेकिन बात नहीं बन पाती थी। लिखता और फाड़ देता। कोई गाइड करने वाला था नहीं। एक बार एक रचना लिखी और दिल्ली में धीरेद्र अस्थाना, बलराम और सुरेश उनियाल को सुनाई। ये लोग मुझसे दस पद्रह बरस से परिचित थे और इतने ही अरसे से लिखते चले आ रहे थे। रचना सुन लेने के बाद किसी ने एक शब्द तक नहीं कहा कि रचना है भी  है या नहीं। अपनी पहली रचना पर उनके इस व्यवहार से बहुत तकलीफ हुई थी। तब बहुत मशक्कत करके एक और कहानी लिखी थी और जब सुरेश उनियाल मुंबई आये तो उन्हें सुनायी। फिर वहीं मुंह में दही रखने वाला मौन। मार्गदर्शन का एक शब्द भी नहीं। कहानी दिल्ली में अपने परिचित कथाकार सुरेंद्र अरोड़ा को दिखायी। अगले दिन उन्होंने कहा कि मैंने रात को कहानी पढ़ी तो थी लेकिन याद ही नहीं आ रही है कि क्या कहानी थी। इसके अलावा और कोई शब्द नहीं।

एक बार किसी गोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार जगदम्बा प्रसाद दीक्षित से मुलाकात हुई। उन्हें खूब पढ़ चुका था और वे भी मुझे नाम चेहरे से जानते ही थे। उनसे मैंने पूछा था लिखना चाहता हूं, लेकिन बात नहीं बनती, क्या करूं, कैसे लिखूं। उनकी भी प्रतिक्रिया ठंडी ही थी और मैं एक बार फिर खाली हाथ रह गया था।

1987 तक आते आते यानी 35 साल की उम्र तक प्रकाशित रचनाओं के नाम पर मेरी कुल जमापूंजी सारिका में दो तीन लघुकथाएं और एक आध अनुवाद ही था। यहां तक आते आते लिखने की चाह और न लिख न पाने की तकलीफ बहुत सालने लगी थी। तब तक एक बेटे का पिता बन चुका था और घर में भी कोई तकलीफ नहीं थी। बेचैनी थी कि कहीं चैन नहीं लेने देती थी। तभी किसी ने सुझाया 10 दिन के लिए विपश्यना शिविर में हो आओ। चित्त को शांति भी मिलेगी और राह भी सूझेगी। ईगतपुरी मे विपश्यना शिविर किया तो मानसिक द्वंद्व कुछ कम हुआ और चीजों की गहराई से देखने, समझने लायक बल मिला।

1988 में यानी 36 बरस की उम्र में पहली कहानी नवभारत टाइम्स में छपी और दूसरी कहानी वरिष्ठ रचनाकार सोहन शर्मा ने अपने कथा संकलन में शामिल की। इस वक्त तक मेरे सभी दोस्तों की कई कई किताबें आ चुकी थीं। खैर, देर से ही सही, शुरूआत तो हुई। हिम्मत बढ़ी और अपने जीवन की महत्वपूर्ण कहानी अधूरी तस्वीर (1988) लिखी जो धर्मयुग में छपी और बाद में कई भाषाओं में अनूदित हुई। तब तक सिलसिला चल निकला था और धीरे धीरे ही सही लिखना आने लगा था। डेढ़ दो साल की अवधि में तीन चार कहानियों के ड्राफ्ट लिखे। हालांकि कोई भी कहानी मुक्कमल तौर पर अच्‍छी नहीं बन पायी थी लेकिन बात कहने की शऊर आने लगा था। लिखने की मेज पर बैठने का संस्कार मिल रहा था और तनाव कम होने लगे थे।

1988 के मध्य के आते आते ऑफिस में माहौल फिर से मेरे खिलाफ होने लगा था। पिछले दो तीन बरसों में जो चीजें अपनी तरफ  की थीं फिर से खिलाफ होने लगी थीं। मेरे सभी कामों में नुक्स निकाले जाने लगे और सताया जाने लगा। हालत यहां तक पंहुच गयी कि मुझे सज़ा के तौर पर 1989 में जनवरी में 10 दिन के नोटिस पर मद्रास स्थानांतरित कर दिया गया। पहले से ही तैयार था इसके लिए। लेकिन पूर विभाग को जैसे सांप सूंघ गया हो। सब साथियों ने मुझसे बात तक करना बंद कर दिया कि कहीं उन्हें भी ऐसी ही सज़ा न मिल जाये। मुझसे मेरे विभाग के प्रभारी ने कहा कि अगर माफी मांग लो तो ट्रांसफर रुकवा सकते हैं। मैंने मना कर दिया जब कोई गलती ही नहीं की थी तो माफी किस बात की मांगूं। वैसे भी उनके हाथ में ट्रांसफर से तो बड़ी सज़ा थी ही नहीं। हां, जब मैंने किसी निकट के शहर में स्थानांतरण के लिए अनुरोध किया तो अहमदाबाद कर दिया गया लेकिन पीछा फिर भी नहीं छोड़ा गया। वहीं मेरे कामकाज को लेकर चिट्ठियां जाती रहीं।

यह बात अलग है कि जो कुछ मुझे सज़ा समझ कर दिया गया था, अंतत: मेरे लिए वरदान ही साबित हुआ। मैं अपने पीछे तीन साल के अपने बेटे और नौकरीशुदा पत्नी को छोड़ कर गया था। वे कभी अकेले नहीं रहे थे और मैं भी नये नये माहौल में खुद को एडजस्ट करने की कोशिश में लगा हुआ था। अहमदाबाद में मेरे पास खूब वक्त था। लोग अच्‍छे मिले। धीरे धीरे लिखने पढ़ने आचठर घूमने फिरने की तरफ ध्यान दिया। अपने वक्त का भरपूर इस्तेमाल किया। पूरा गुजरात घूमा, पहाड़ों की ट्रैकिंग पर तीन चार बार गया और खूब पढ़ा। गुजराती सीखी और गुजराती साहित्यकारों से परिचय होने का लाभ लिया और वहां पांच गुजराती किताबों के अनुवाद किये।

अहमदाबाद चले आने से मेरा बेटा अक्सर बीमार हो जाता जिसे लेकर मेरी पत्नी परेशान हो जाती। कभी उसे लिये लिये अहमदाबाद आती तो कभी मुझे भाग कर मुंबई आना पड़ता। लेकिन मधु ने लगातार हिम्मत बनाये रखी और दोनें मोर्चे संभाले रही। इस बीच कहानियां छपने लगीं थीं और नोटिस भी लिया जाने लगा था। पाठकों, साथी रचनाकारों के पत्र आने लगे थे जिससे हिम्मत और  बढ़ती।

इस बीच जूनागढ़ में कई बरसों से अध्यापन कर रहे शैलेश पंडित से परिचय हो चुका था। वे अक्सर आ जाते और हम दोनों खूब धमाल मचाते। दारू के जुगाड़ में लगे रहते। अहमदाबाद में दारू कैसे मिलती है इस पर मैंने  एक लेख भी हंस में लिखा था। शैलेश पंडित ने लिखना छोड़ दिया है। दूरदर्शन की एक टुच्ची सी अफसरी उनके भीतर के बेहतरीन लेखक को हमेशा के लिए खा गयी और मैंने एक बेहतरीन दोस्त खोया। हालांकि शैलेश की आखिरी कहानी पढ़े हुए मुझे कई बरस हो गये हैं, फिर भी उसके फिर से सक्रिय होने का मुझे हमेशा इंतजार रहेगा।

गोविंद मिश्र भी उन दिनों वहीं थे अक्सर मुलाकात होती। इस बीच श्रीप्रकाश मिश्र भी वहीं आ गये थे। हम खूब हंगामें करते। रात रात भर गोष्ठियां करते। लम्बी ड्राइव पर निकल जाते। अहमदाबाद में जो भी रचनाकार आता, उसको लेकर एक गोष्ठी तो मेरे घर पर होती ही। कई अच्‍छे लेखकों से वहीं परिचय हुआ। राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, गोविन्द मिश्र, राजी सेठ, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंगलेश डबराल, पंकज बिष्ट , शैलेश मटियानी, निदा फाजली,  विभूति नारायण राय सरीखे कई वरिष्ठ रचनाकार घर आये। ऐसी गोष्ठियों में आचमन का जुगाड़ हो जाये तो और क्या कहने। अहमदाबाद रहते हुए ही मेरा पहला कहानी संग्रह अधूरी तस्वीर आया। उन्हीं दिनों गुजरात हिन्दी अकादमी का गठन हुआ था सो मेरी किताब को पहला पुरस्कार दे दिया गया। उस पुरस्कार को लेना ही अपने अपने आप में एक दुखद प्रसंग है। इसलिए उसका जिक्र नहीं।

एक लिहाज से अहमदाबाद ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। इसी दौरान खूब पढ़ा, घूमा, लिखा, यारबाशी की, अच्‍दा संगीत सुना, मौन का सही अर्थ समझा और कई कई बार पूरा दिन मौन रह कर गुजारा। खूब दारू पी  लेकिन चारित्रिक आवारागर्दी फिर भी नहीं  की।

अहमदाबाद में 6 साल गुज़ारने के बाद जब 1995 में मुंबई लौटा तो लगभग 20 कहानियों की पूंजी, बीस के करीब ही व्यंग्य रचनाएं, एनिमल फार्म का अनुवाद, एक उपन्यास का ड्राफ्ट और सैकड़ों दोस्त ले कर आया था। ये ही मेरी पूंजी थी जो मेरे गुजरात प्रवास ने मुझे दी थी। मैं पहले की तुलना में मैच्योर और समृद्ध हो कर लौटा था। और वापिस आ कर भी मैं चैन से कहां बैठा हूं। कितना तो काम किया है। दो उपन्यास, एक और कहानी संग्रह, गुजराती तथा अंग्रेजी से अनूदित पुस्तकें और महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का पुरस्कार।

लगातार काम करता ही रहा हूं और अब भटकन भी इतनी नहीं रही है।

शायद उम्र का तकाजा हो लेकिन एक बात है मन के कई कोने अभी भी खाली हैं। अकेलापन अभी भी है और दोस्तों के नाम पर शायद अभी भी एक आध ही।

मन में संतोष तो होता ही है कि कितना कुछ मिला है। कभी सोच भी नहीं सकता था। कई अच्छी कहानियां और महत्वाकांक्षी उपन्यास देसा बिराना जो पिछले साल छपा। इन दिनों चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद कर रहा हूं। महत्वपूर्ण काम है।

दो उपन्यास अगर ज्यादा नहीं तो कम नहीं हैं। ये कम भी हों  तो उन सैकड़ों हजारों दोस्तों का प्यार तो है ही जो हर कहानी के बाद मुझे और समृद्ध कर जाता है। लेखन का एक मतलब यह भी तो होता है कि हमने कुल मिला कर कितने दोस्त बनाये, जो हमें जानते नहीं, लेकिन फिर भी हमारी अगली कहानी का बेसब्री से इंतजार करते हों।

अलग अलग वक्त पर अलग कहानियां धूम मचाती रही हैं। 1989 में हंस में यह जादू नहीं टूटना चाहिये अब भी 14 बरस बाद भी पढ़ी और पसंद की जाती है। कई पाठक मुझे अभी भी उसी कहानी से जानते हैं, इस कहानी ने हिन्दी और गुजराती में एक तरह से धूम मचा दी थी। फिर 1991 में वर्तमान साहित्य मे छपी चंदरकला ने जो कहर ढाया वह अलग ही किस्सा है। तरह तरह की प्रतिक्रियाएं, वर्तमान साहित्य के अंकों में बरस भर तक प्रतिक्रियाएं  और कई सदस्यों का अपना वार्षिक चंदा वापिस मांग लेना, बिहार से तीखी प्रतिक्रियाएं,  संपादकीय और सार्वजनिक संभाएं गोष्ठियां कितना कुछ हुआ उसके साथ।

फिर उसके बाद भी कई कहानियां अलग अलग पाठकों का ध्यान खींचती रही हैं। कहानियां के नाट्य रूपांतरण, मंचन और दूरदर्शन पर प्रदर्शन।

लेखन भी अजीब तरह का गोरख धंधा है। हर कहानी लिख लेने के बाद हम पूरी तरह से खाली हो जाते हैं। लगता है जो कुछ कहना था, इस कहानी के माध्यम से कहा जा चुका है। अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया लेकिन जहां नयी कहानी के बीज पड़ने, अंकुरित होने शुरू होते हैं तो एक बार नयी दूनिया सामने झिलमिलाने लगती है, नये इंद्रधनुष बनने लगते हैं और आकार लेने लगती है एक और रचना। पहले से भी खूबसूरत रचना।

रचने से बेहतर सुख और कुछ नहीं है। हम कई कई दिन तक उसी के नशे में होते हैं। उसी को जीते, ओढ़ते बिछाते और जीते हैं। कई बार डर लगता है कि अगर लेखन न होता तो क्या होता या जिन लोगों के पास लिख कर अपने आपको अभिव्यक्त करने का माध्यम नहीं होता तो वे कैसे जीते हैं। खैर, लेखन ने जीने का माध्यम, पहचान, सम्मान और जीने के प्रति एक  नया नजरिया दिया है और भरपूर सुख दिया है।

बेशक लिखते हुए पंद्रह बरस हो गये हैं और काफी काम भी किया है लेकिन अभी भी है जो इन सब लिखे हुए शब्दों से बेहतर होगा। मुझे उसी दिन का इंतजार है और अपने आप पर भरोसा भी है।

चाहता हूं दो तीन और अच्छे उपन्यास हों और लम्बी कहानियां भी। हालांकि इस बरस की चारों कहानियां लम्बी ही हैं। कथादेश में छपी बाबू भाई पंड्या, घर बेघर, मर्द नहीं रोते और ताजा कहानी खो जाते हैं घर।

पिछले कुछ वर्ष मेरे लिए बहुत अच्छे रहे हैं, इस बीच छः तक पांच किताबें  आ चुकी हैं और अभी तो काफी काम करना बाकी है। दो अनुवाद प्रेस में हैं और एक पर काम चल रहा है।

देखें वक्त की पोटली में मेरे लिए और क्या क्या है।

आमीन।

सूरज प्रकाश ,अक्‍तूबर 2004.

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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