भूख खबर मवाद

भरत तिवारी ‘शजर’,

खबर
भूख की
भूखों की
भूख बेचने वालों की
नंगों की
नंगे होतों की
नंगे करे जातों की
जंगल की
जंगलियों की
जंगलराज की
जंगल बचाने की
… डिमांड में है
जंगलियों की भूख बढ़ रही है
डिमांड की नियति – बदलते रहना

खबर
बेचने की
बिकने की
बिक गए की
देश की
विदेश की
देशप्रेम की
विदेश प्रेम की
… डिमांड में है
प्रेम बिक रहा है
प्रेम की नियति – बदल रही है

अन्दर झाँकना बंद कर दिया
बाहर देखना मना है
मैल –
चमड़ी का पोर पार कर गयी
रंग खून का और रंगत मवाद की
मवाद से चले खबरी-मसाला-मशीन
खबरों के प्रेमी -
सब …

***

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to भूख खबर मवाद

  1. Neeta says:

    विलक्षण !!!!!!

    अद्भुत !!!!!!!!!

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