बाइट्स, प्लीज (उपन्यास, भाग-15 )

30.

दफ्तर के अंदर 23 तारीख की सुबह को जब लोगों को पता चला कि रत्नेश्वर सिंह आ रहे हैं, खुसफुसाहट शुरु हो गई। विमल मिश्रा तो खासा उत्साह में था, भुजंग के चेहरे पर भी रौनक थी, तमाम कैमरामैन और रिपोटर भी खुश नजर आ रहे थे।

तीन बजे के करीब रत्नेश्वर सिंह की पजोरे कैंपस में दाखिल हुई। कुछ देर बाद लोगों को संदेश दिया गया कि आज वे सभी के साथ एक मीटिंग करना चाहते हैं। सभी लोगों को गेस्ट रूम में एकत्र किया गया। सफेद पोशाक में जब रत्नेश्वर सिंह कमरे में दाखिल हुये तो एक साथ खड़े होकर सभी लोगों ने उनका इस्तकबाल किया। सबको बैठने का इशारा करते हुये रत्नेश्वर सिंह खुद एक कुर्सी पर जम गये।

“मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं। बहुत दिन से मैं इस बात को महसूस कर रहा हूं कि हमारे चैनल पर कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं चल रहा है जिसे लोग चाव से देखें। आप लोग एक ऐसा कार्यक्रम बनाइये जिसमें लोगों की छुपी हुई प्रतिभाओं को दिखाया जा सके, या फिर कोई ऐसी अदभुत चीज के बारे में बताई जाये जो कुछ अजीब और रोचक हो….कभी-कभी हम किसी चीज को देखकर कह उठते हैं …ये तो गजब है,” धीमे स्वर में रत्नेश्रर सिंह वहां मौजूद लोगों से मुखातिब हुये।

“एक लंगड़ा लड़का है सर, जो गोलघर की सीढ़ियों पर चढ़ जाता है। इस तरह के और भी कई लोग है, जो चौंकाने वाले कारनामें करते हैं, ” धनंजय ने कहा।

“कभी-कभी गांव देहात में भी इस तरह की चीजें देखने को मिल जाती है, जो रोचक होती हैं। इसका एक नाम तय कर लीजिये और इस पर काम शुरु कीजिये, ” रत्नेश्वर सिंह ने कहा।

“ इस प्रोग्राम का नाम ही रख देतें हैं -गजबे है ?”,  भुजंग ने उत्साह से कहा।

“इसके अलावा हमलोग एक टैलेंट हंट भी कराने जा रहे हैं। इसका आयोजन जिला स्तर पर होगा, जिले के स्कूलों से प्रतिभाओं को हम चुनकर सामने लाएंगे, उन्हें मैडल देंगे और कुछ पुरस्कार भी। कुछ अच्छे लोगों को इसमें जज बना देंगे।”

“ये बेस्ट रहेगा,” रत्नेश्वर सिंह के ठीक सामने बैठी तृष्णा ने ताली बजाते हुये कहा। उसकी ताली की वजह से सब लोगों की नजरें उसकी तरफ चली गई।

“आप लोग जो कर रहे हैं करते रहिये, मैं तो बस यूं ही आप लोगों के साथ आज बैठ गया, कोई प्राब्लम हो तो मुझसे कह सकते हैं ”, रत्नेश्वर सिंह न  कहा।

जब से चैनल की शुरुआत हुई थी, साप्ताहिक अवकाश किसी को नहीं मिला था, हालांकि भुजंग ने अपनी ओर से सभी को साप्ताहिक अवकाश लेने के लिए कर दिया था। यहां तक कि सभी लोगों के छुट्टी के दिन भी मुकर्रर हो गये थे, लेकिन विमल मिश्रा ने यह कहते हुये सभी को छुट्टी लेने से मना कर दिया था कि जब तक चेयममैन की तरह से आदेश नहीं आ जाता किसी की छुट्टी मंजूर नहीं की जाएगी। रंजन ने बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि भुजंग द्वारा घोषित किया साप्ताहिक छुट्टी का कोई मतलब नहीं है। साप्ताहिक छुट्टी को लेकर रत्नेश्वर सिंह की हरी झंडी मिलनी चाहिये। कुल मिलाकर साप्ताहिक छुट्टी से कंट्री लाइव के लोग वंचित थे और इसे लेकर रोष भी था, लेकिन छुट्टी लेने की पहल कोई नहीं कर रहा था। हर किसी कि यही कोशिश होती थी बंदूक दूसरे के कांधे पर रख कर चलाई जाये। उन्हें लगता था कि खुलेआम साप्ताहिक छुट्टी की मांग करना कहीं संस्थान के खिलाफ न मान लिया जाये। इसलिये इस मामले पर अमूमन सभी लोग चुप रहते हुये तमाम बड़े ओहदेदारों पर साप्ताहिक छुट्टी निर्धारित करने के लिए दबाव बनाये हुये थे।

“ सर, हमलोग काम तो करते हैं लेकिन सप्ताह में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती है। हमलोग को एक दिन का साप्ताहिक अवकाश चाहिये, ” चंदन ने कहा।

“ मैं कभी छुट्टी लेता ही नहीं हूं तो आप लोग छुट्टी क्या लिजीएगा। काम किजीये, छुट्टी देखा जाएगा,” यह कहते हुये रत्नेश्वर सिंह खड़े हो गये। “आदमी को हमेशा काम करते रहने चाहिये।”

रत्नेश्वर सिंह के अपने चैंबेर में दाखिल होने के बाद विमल मिश्रा ने ऐलान किया कि एक-एक करके सभी लोग अपना वेतन ले लें।

“यह तो बहुत बुरी बात है कि हमें साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलेगा,” नीलेश ने भुंजग की तरफ देखते हुये कहा, जो अपने दरबे की तरफ जा रहा था।

“ अभी किसी तरह से बैट लेना था, बाकी बात बाद में देखा जाएगा, ” भुजंग ने हंसते हुये कहा।

“मतलब”

“बचपन में आपने क्रिकेट खेला है? जिसका बैट होता था हमलोग उसे पहले बैटिंग करा कर जल्द आउट कर देते थे। अभी तो वेतन फंसा हुआ था, वो मिल जाये फिर साप्ताहिक अवकाश की बात की जाएगी।” भुंजग की बात को सुनकर नीलेश के होठों पर भी मुस्कराटह दौड़ गई। वहां मौजूद दूसरे लोग भी हंस पड़े।

“सब जल्दी से अपने-अपने पैसे ले लो, पता नहीं कब बैग खाली हो जाये,” रंजन ने चुटकी ली। इसके बाद सभी लोग हंसते हुये विमल मिश्रा के दरबे के पास पहुंचने लगे और देखते ही देखते वहां धक्का मुक्की की स्थिति बनने लगी। विमल मिश्रा को कहना पड़ा, “आपलोग एक-एक करके लाइन में आइये, काम छोड़कर के यहां भीड़ मचाने की जरूरत नहीं है। आप लोग पत्रकार हैं, पत्रकारों की तरह पेश आइये।”

“यहां कोई पत्रकार रहने दे तब ना, यहां काम करते हुये खबर करने की अदा ही भूलते जा रहे हैं ” किसी ने ऊंची आवाज में कहा।

30.

खबरों के मामले में महेश सिंह भी काफी कमजोर साबित हो रहा था। क्राइम की खबरों पर तो उसकी नजर होती थी, लेकिन दूसरी खबरों की तरफ उसका ध्यान नहीं जाता था। या यूं कहा जाये कि उसे खबरों की सही समझ ही नहीं थी। दूसरे चैनलों को देखकर वह अपने चैनल पर खबर चलाता था। यदि कोई दूसरा चैनल किसी खबर को प्रमुखता से चला रहा होता था तो वह भी उसी खबर के पीछे पील पड़ जाता था। इस तरह से वह मौलिक खबरों से पूरी तरह से दूर था। कोई रिपोटर जब कोई बेहतर खबर लेकर आता तो वह बस इतना ही कहता कि इसे काट कर रांची भेज दो। खबर को पीट कर खींचने की उसे कभी नहीं सूझती थी। जिले के रिपोटरों की खबरों की तरफ भी वह ध्यान नहीं देता था। जब कभी भुजंग रिपोटिंग को लेकर सवाल उठाता तो वह चीख चिल्ला कर उसे चुप करने की कोशिश करता था। रिपोटिंग के नाम पर उसने संस्थान के दोनों गाड़ियों पर कब्जा कर रखा था। एक गाड़ी को तो उसने पूरी तरह से अपने निजी सेवा में लगा रखा था और दूसरी गाड़ी को पटना के रिपोटरों के हवाले कर दिया था। हालांकि इसके साथ ही उसने रिपोटरों को यह भी आदेश दे रखा था कि उससे पूछे बिना कोई भी गाड़ी का इस्तेमाल न करे।

वाहन की सुविधा न होने की वजह से प्रोग्रामिंग टीम कुछ भी कर पाने में अक्षम साबित हो रही थी। जब भी प्रोग्रामिंग टीम शूट पर जाने के लिए गाड़ी की मांग करती उसे किसी न किसी बहाने टाल दिया जाता था। प्रोग्राम बनाने के लिए प्रत्येक दिन रंजन रिपोटरों के फीड को उठाकर उसे नीलेश के हवाले कर देता और कहता कि किसी तरह से इस पर बीस-बाइस मिनट का स्क्रिप्ट खींच दे। कभी-कभी तो फीड के नाम पर कुछ भी नहीं होता था। इस संबंध में नीलेश कई बार भुजंग से भी बात कर चुका था, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ था। भुजंग यही कहता कि आपको जो फीड चाहिये उसे मुझे या महेश सिंह को मेल कर दिजीये। इस तरह के मेल कर- करके भी नीलेश थक चुका था और अब उसने भी धीरे-धीरे किसी काम में रुचि लेना छोड़ दिया था। रंजन जो कुछ करने को कहता उसे कर के वह नेट पर बैठकर दुनियाभर की खबरें पढ़ता रहता था। सुकेश भी काम को लेकर पूरी तरह से उदासीन था। उसकी कोशिश किसी तरह से आठ घंटे की ड्यूटी बजाने की होती थी।

नरेंद्र श्रीवास्तव अपनी ही दुनिया में तल्लीन रहते थे। अपने मन मुताबिक दफ्तर में आते थे और कुछ देर बैठने के बाद चले जाते थे। उधर माहुल वीर एक साथ कई स्तर पर जोड़-तोड़ करने में लगा हुआ था। रत्नेश्वर सिंह के सामने उसकी मजबूत छवि बन चुकी थी और उसे इस बात का पूरी तरह से अहसास हो गया था कि नरेंद्र श्रीवास्तव के रहते उसके आगे का रास्ता साफ नहीं हो सकता है। इसके अलावा महेश और भुंजग पर भी उसकी गहरी नजर थी। अपने तरीके से इन दोनों के बीच चल रहे अघोषित जंग को तो वह हवा दे ही रहा था, साथ ही पटना में चैनल के अंदर चल रही गतिविधियों की जानकारी के लिए सुकेश से भी लगातार संपर्क बनाये हुये था। इधर रत्नेश्वर सिंह भी यह सोचने लगे थे कि अच्छी खासी रकम खर्च करने के बावजूद अभी तक चैनल के इस नये धंधे से उन्हें कमाई होना तो दूर, और पैसे ही लगाने पड़ रहे हैं। नरेंद्र श्रीवास्तव पर उन्होंने चैनल को लाभकारी बनाने के लिए दबाव डालना शुरु कर दिया था, लेकिन नरेंद्र श्रीवास्तव को खुद ही यह नहीं सूझ रहा था कि पैसे कहां से आएंगे। रांची में तो माहुल वीर ने मार्केटिंग की एक टीम बना ली थी, लेकिन पटना में इस ओर कुछ खास ध्यान नहीं दिया गया था। खबरों की तरफ से पूरी तरह से लापरवाह महेश सिंह अब अपने रिपोटरों से एड लाने की बात करने लगा था और भोला इस संदेश को रत्नेश्रर सिंह के पास पहुंचा रहा था कि दूसरे चैनलों में रिपोटर ही एड लाते हैं और यहां पर भी महेश सिंह रिपोटरों से यही करवाना चाहता है और ऐसा करना चैनल के हक में होगा, कम से कम पैसे तो आने लगेंगे। इस तरह की बातें सुनकर पत्रकारों को लेकर रत्नेश्रर सिंह के नजरिया में तब्दीली होने लगी थी। उन्हें भी लगने लगा था रिपोटरों को वेतन तो दे ही रहे हैं,यदि वे विज्ञापन लाते हैं तो अच्छा ही होगा। अप्रत्यक्ष तरीके भोला के माध्यमस से महेश सिंह लगातार उनके दिमाग में यह भरता जा रहा था कि चैनल के लिए विज्ञापन लाना रिपोटरों का ही काम है तथा बिहार में अमूमन हर चैनल के रिपोटरों के ऊपर विज्ञापन लाने की जिम्मदारी होती है।

31.

“पटना में डेस्क तुड़ दिया जाये, इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। प्रोग्राम बनना होगा तो रांची से बनेगा,” डेस्क पर बैठे हुये महेश सिंह ने कहा। “यहां लोग दिनभर बैठकर पता नहीं क्या-क्या करते रहते हैं, एक प्रोग्राम भी ठीक से नहीं बना पाते हैं। आज क्या बना रहे हैं? ”

“ उल्लू उपासना, ” रंजन ने उसे छेड़ते हुये कहा।

“और कुछ नहीं था बनाने के लिए?”

“बीस दिन पहले ही प्रोग्रामिंग के दस स्टोरी का कंसेप्ट आपको मेल कर चुका हूं और कई बार बोल भी चुका हूं, अब फीड ही नहीं होगा तो बनेगा क्या? , ” नीलेश ने थोड़े तीखे अंदाज में कहा। अक्सर महेश सिंह दरबे के उस हिस्से में घुस आता था जहां पर बैठकर सभी लोग काम करते थे और फिर चीखने चिल्लाने के अंदाज में प्रोग्रामिंट टीम से उलझने की कोशिश करता था।

“यह इलेक्ट्रानिक मीडिया है, इसमें सांस लेने के लिए भी पैसे लगते हैं, रत्नेश्वर बाबू कब तक वेतन देंगे?,” महेश सिंह ने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा।

“पहले खबरों को दुरुस्त किजीये, यहां एक सप्ताह पुरानी खबर चलती है और किसी को पता भी नहीं चलता, अब तक आपके चैनल के खाते में कोई ऐसी खबर दर्ज हुई है जिसने लोगों को ठिठका दिया हो, एक भी नहीं। प्रेस कांफ्रेंस में माइक लेकर बाइट लाना सबसे आसान काम है, एक बच्चे को भेज दिजीये, लेकर चला आएगा। और वैसे भी जब से नीतीश कुमार की दोबारा सरकार बनी है, बिहार में प्रेस कांफ्रेंस का दौर कुछ ज्यादा ही चल रहा है,” नीलेश ने कहा, उसकी नजरें सामने कंप्यूटर पर थी।

“खबरों के बारे में आपको बोलने का कोई हक नहीं है। आप सिर्फ प्रोग्रामिंग की बात किजीये,” महेश सिंह ने कहा।

“तो प्रोग्रामिंग के बारे में भी आपको बोलने का कोई हक नहीं है, आप सिर्फ खबरों की बात किजीये,” नीलेश ने उसी के लहजे में जबाव दिया।

“मैं यहां से डेस्क ही तुड़वा दूंगा, जिनको प्रोग्राम बनना है रांची जाये,” महेश सिंह की आवाज थोड़ी और ऊंची हो गई, उसके स्वर में चिड़चिड़ाहट थी।

“अभी आप लोग यहां जो हल्ला गुल्ला कर रहे हैं, उसका असर काम पर पड़ रहा है, बेहतर होगा इस पर आप लोग काम के बाद बहस करें,” रंजन ने दोनों को शांत करने के लिहाज से कहा।

“रंजन जी हम सब चैनल की भलाई ही चाहते हैं, इसलिए इतनी बहस कर रहे हैं। मैं प्रोग्रामिंग पर सवाल उठा रहा हूं और नीलेश जी रिपोर्टिंग पर। लेकिन मैं जो कह रहा हूं उस पर गौर किजीये। नहीं तो मैं इसे मुद्दा बनाऊंगा,” टेबल पर मुट्ठी मारते हुये महेश ने कहा।

“आपके जो मन में आये जाकर किजीये, बेहतर होगा सरकार की कमियों को पकड़िये और उसे अपने चैनल पर मुद्दा बनाइये। इससे चैनल का भी भला होगा और सूबे के लोगों का भी, ”, नीलेश ने कहा।

नीलेश की बात सुनकर महेश सिंह तिलमिला कर बाहर निकल गया। रंजन से मुखातिब होते हुये नीलेश ने कहा, “मूड आफ हो गया, आता हूं एक सिगरेट पीकर.”

“प्रोग्राम को टाइम पर भेज दो, उसके बाद अपनी जिम्मेदारी खत्म,” रंजन ने कहा।

“यहां जितना टाइम प्रोग्राम को बनाने में नहीं लगता है उससे ज्यादा टाइम भेजने में लगता है, कभी लीज लाइन खराब रहता है तो कभी एफटीपी बंद रहता है और ऊपर से इसकी बकवास”, नीलेश ने कहा और अपने काम में जुट गया। “ इस आदमी को न तो खबरों की तमीज है और न ही प्रोग्रामिंग की, इसे सिर्फ गाड़ी हांकने से मतलब है। अरे, यदि गाड़ी हांकने का इतना ही शौक है तो बस स्टैंड में काम पकड़ लो, वहां से रोज सैकड़ों गाड़ियां खुलती है। पत्रकारिता में आकर कूड़ा-करकट ठेलने की क्या जरूरत है? ”

“एक काम करो, तुम सिगरेट पी ही लो, नहीं तो यूं ही भड़कते रहोगे,” रंजन ने उसके मूड को भांपते हुये कहा।

“ यहां पर अपने विचारों को सिगरेट के धुयें में उड़ाना ही बेहतर है,” यह कहते हुये नीलेश अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

32.

31 दिसंबर की शाम को भुंजग के दफ्तर में आने के बाद महेश सीधे उसके दरबे में गया। कुछ देर तक दोनों में बातचीत होती रही है। फिर दोनों एक साथ नरेंद्र श्रीवास्व के पास पहुंचे जो रत्नेश्वर सिंह के चेंबर में बैठकर चना फांक रहे थे ।

“सर मामला गंभीर है,” महेश ने कहा।

“क्या हुआ ? ”

“ कल रात को प्रोग्राम टाइम पर रांची नहीं पहुंचा है, वहां से माहुल वीर का फोन आया था, ” महेश ने कहा।

“तो?”

“उन्होंने कहा है कि यदि यही स्थिति यही रही तो संस्थान में अराजकता फैल जाएगी। इस मामले में जो लोग दोषी है उन्हें दंडित किया जाना चाहिये। चूंकि चैनल हेड खुद पटना में बैठते हैं इसलिये यह और भी जरूरी है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाये, ” महेश ने चैनल हेड शब्द पर जोर देते हुये कहा।

“प्रोग्राम की जिम्मेदारी किन लोगों पर है? ”, नरेंद्र श्रीवास्तव ने पूछा।

“सुकेश और नीलेश देख रहे हैं। अंतिम जिम्मेदारी रंजन की है, ” महेश ने जवाब दिया।

“आप क्या कहते हैं?”, भुजंग की तरफ देखते हुये नरेंद्र श्रीवास्तव ने पूछा।

“लोग लापरवाही बरत रहे हैं तो कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। वैसे मैं भी बहुत दिनों से देख रहा हूं कि ये लोग ठीक से काम नहीं करते हैं। तीनों एक साथ बाहर चाय की दुकान पर जाते हैं और वहीं घंटों बैठे रहते हैं, खूब राजनीति कर रहे हैं ये लोग ”, भुजंग ने कहा।

“लगता है आप दोनों ने इनके खिलाफ मोर्चाबंदी कर ली है। आपलोग क्या चाहते हैं? एक बार रंजन से भी पूछ लेते हैं, क्यों?  बुलाइये उसे। ” नरेंद्र श्रीवास्त ने रंजन को बुलाने का हुक्म दिया।

थोड़ी देर बाद रंजन भी नरेंद्र श्रीवास्तव के सामने बैठा हुआ था।

“कल टाइम पर प्रोग्राम नहीं गया, बताइये क्या किया जाये। महेश और भुंजग का कहना है कि इससे संबंधित लोगों को दंडित किया जाये, दंडित होने वालों में आप भी शामिल है,” रंजन की तरफ देखते हुये नरेंद्र श्रीवास्तव ने कहा।

“अब मैं क्या कहूं सर, थोड़ा देर हुआ तो क्या हो गया, पहले से ही हमने कई प्रोग्राम भेज रखे हैं। कोई और प्रोग्राम चला लेते वे,” रंजन बात को संभालने की कोशिश की।

“सवाल ये नहीं है कि वे लोग कौन सा प्रोग्राम चलाते और कौन सा नहीं, सवाल यह है कि यहां से कल का प्रोग्राम समय पर क्यों नहीं भेजा गया,” महेश ने कहा।

“और समय पर प्रोग्राम न भेज पाने के लिए किसे दंडित किया जाये,” दूसरी तरफ से भुजंग ने भी हमला किया।

“आप कहना क्या चाहते हैं?”, रंजन ने पूछा

“आप खुद समझदार हैं। यहां की कार्य-संस्कृति पूरी तरह से बिगड़ती जा रही है। एक मेल मुझे कीजिये जिसमें यह लिखा हो कि देर से प्रोग्राम जाने के लिए नीलेश और सुकेश पर कार्रवाई की जाये, उसके बाद हमलोग देख लेंगे ” भुजंग ने  कहा।

“सर नीलेश तो बहुत अच्छा काम कर रहा है, हां सुकेश के बारे में मैं कह सकता हूं कि….. ”

“मुझे लगता है कि ये लोग चैनल को बेहतर करने के बारे में ही सोच रहे हैं। रंजन! जैसा ये लोग कह रहे हैं कर दो ”, नरेंद्र श्रीवास्तव पूरी तरह से उनकी बातों में आ गये थे।

चैंबर के बाहर निकलने के बाद रंजन के चेहरे पर तनाव था। अपनी कुर्सी पर बैठते हुये वह बुदबुदा रहा था, “समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं। सब मिले हुये हैं। बड़का जोंकवा को भी कांफिडेंस में ले लिया है,” रंजन चिड़चिड़ाहट में नरेंद्र श्रीवास्तव को बड़का जोंक और भुंजग और महेश को छोटका जोंक कहा करता था।

“क्या हुआ, ये किससे बात कर रहे हो? ” रंजन को बड़बड़ाते हुये देखकर नीलेश ने पूछा।

“ ये लोग बोल रहे हैं कि मैं लिख कर दूं कि तुम दोनों की वजह से कल प्रोग्राम रांची देर से पहुंचा। ये लोग कार्रवाई करेंगे तुम दोनों के खिलाफ, ” रंजन ने कहा।

“लिख कर दे दो, प्राब्लम क्या है ? वैसे भी यह जगह मेरे लायक नहीं है। अब तक की पत्रकारिता के मेरे कैरियर में मेरे खिलाफ किसी भी संस्थान में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मैं देखना चाहूंगा कि ये लोग क्या कार्रवाई करते हैं। अब मुझको लगने लगने लगा है कि बिहार में पत्रकारिता करना कठिन है। यहां लोग बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी कर एक दूसरे पर गुर्रा रहे हैं, और इसी में अपनी तारीफी समझ रहे हैं। तुम्हें भी अपनी नौकरी बचानी है, इसी माहौल में काम करना है। फिर लिख कर दे दो, हां, सुकेश से पूछ लो। वैसे पहले हम दोनों से यह नियमत पूछा जाना चाहिये कि आखिर प्रोग्राम भेजने में देरी क्यों हुई, ताकि देरी के लिए जिम्मेदार कारणों को दूर किया जा सके, शायद तुम लिख कर दो तो उसके बाद नरेंद्र श्रीवास्तव हमलोगों से इस मामले में पूछताछ करें, ” नीलेश ने कहा।

“मुझे तो कंप्यूटर पर हिंदी में लिखना भी नहीं आता, ” रंजन ने कहा।

“मैं लिख देता हूं, तुम मेल कर दो, ” नीलेश ने उसकी परेशानी को समझते हुये कहा। नीलेश की दायीं तरफ बैठा सुकेश उनकी बात सुन रहा था। सुकेश की तरफ मुंह करते हुये नीलेश ने पूछा, “क्या कहते हो तुम?”

“ तुम लोग किस संबंध में बात कर रहे हो मुझे नहीं पता,” सुकेश ने कहा।

“हम दोनों पर कार्रवाई हो रही है। कल यहां से प्रोग्राम भेजने में दस मिनट लेट हुआ था,” नीलेश ने कहा।

“ऐसे कैसे कार्रवाई करेंगे ?”, सुकेश ने विरोध जताया।

“रंजन से बोला गया है हम दोनों के खिलाफ लिख कर देने के लिए, मैं टाइप कर देता हूं, बाकि आप लोग समझिये,” इतना कहते हुये नीलेश ने टाइप कर दिया कि सुकेश और नीलेश की वजह से कल प्रोग्राम भेजने में दस मिनट की देरी हुई। इस संदर्भ में कार्रवाई की जाये। बिना समय गवांये रंजन उसे अपने मेल आईडी से भुजंग को मेल कर दिया, सुकेश से इस मामले में एक बार बात करने की भी जरूरत उसने नहीं समझी।

करीब आधे घंटे बाद सुकेश और नीलेश को विमल मिश्रा ने अपने दरबे में बुलाया।

“सर, आपलोगों को सात दिन काम करने से रोका जा रहा है। यह चैनल हेड का आदेश है,” विमल मिश्रा ने अपने हाथ में पड़े हुये लेटर को देखते हुये कहा।

“इसका कारण है क्या है?,” सुकेश ने पूछा।

“लेटर में तो यही लिखा हुआ है कि आपने समय पर यहां से प्रोग्राम की डेलिवरी नहीं की। बाकी इस मामले में आपको कुछ भी कहना-सुनना है तो चैनल हेड से बात कर सकते हैं। सात दिन बाद ड्यूटी पर आने से पहले आप को एक बार चैनल हेड से बात करना होगा।”

“फिलहाल तो किसी से बात करने की जरूरत नहीं है। सात दिन बाद देखा जाएगा, ” सुकेश ने कहा। “बस आपका एक फेवर चाहिए। इस बीच यदि पिछले महीन का वेतन आ जाये तो मुझे फोन कर दें।”

“जरूर, इतना तो मैं कर ही सकता हूं.”

कुछ देर बाद सुकेश और नीलेश आफिस के दफ्तर के सामने वाली चाय की दुकान पर साथ-साथ चाय पी रहे थे, रंजन दफ्तर के अंदर व्यस्त था।

“तुम गधे हो, तुमने क्यों टाइप किया,” चाय पीते हुये सुकेश ने कहा।

“रंजन की जान निकली जा रही थी, मैंने सोचा कि इसको मैं तनाव मुक्त कर देता हूं। और फिर मुझे लगा था कि इस लेटर के बाद हमें बुलाया जाएगा, और इस मामले में पूछताछ की जाएगी, लेकिन यहां तो सारा मामला एक तरफा हो गया, ” नीलेश ने कहा।

“सब कुछ पहले से ही निर्धारित था, हमलोग इनकी राजनीति के शिकार हो गये। इस चीज को लेकर इन लोगों की लंबी मीटिंग कल से ही चल रही थी। ”

“ इन लोगों का डिसिजन कितना इनह्यूमैन है। आज रात 12 बजे से नये साल की शुरुआत हो रही है और इनलोगों ने हमलोगों के खिलाफ यह कार्रवाई कर दी। टाप मैनजमेंट कभी इनह्यूमैन डिसिजन नहीं लेता है, इन लोगों को मैनेजमेंट की एबीसीडी भी नहीं पता, संस्थान क्या खाक चलाएंगे। वैसे हमलोगों को नववर्ष का तोहफा मिल गया। ”

“इस मामले में रंजन का स्टेप भी गलत रहा, उसे रिवोल्ट करना चाहिये था। लेकिन यह उसके बास की बात नहीं थी। वैसे भी उसके नेचर में हार्डनेस नहीं है। हर किसी को संतुष्ट करना चाहता है, जिसका नतीजा यह निकलता है कि उससे कोई भी संतुष्ट नहीं है। इस संस्थान में उसे हमलोगों का करीबी माना जाता था, लेकिन खुद को बचाने के लिए हमलोगों को ही साफ कर दिया, ” सुकेश ने कहा।

“क्या माहुल वीर को इन सब बातों की जानकारी है?”, नीलेश ने पूछा।

“मुझे नहीं पता, मेरी अभी तक उससे कोई बात नहीं हुई है। वैसे मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसे भी अंधेरे में रखा गया है। अब जो हो, एक सप्ताह की छुट्टी तो हो ही गई है। ”

“ मैं तो चला नये साल का जश्न मनाने।”

“मैं तो अभी काम करुंगा। आदेश कल से लागू हो रहा है, तो इस पर अमल भी कल से ही करूंगा,” सुकेश ने मुस्कराते हुये कहा। चाय पीने के दौरान दोनों रंजन का इंतजार करते रहे, लेकिन वह नहीं आया।

“अब तक मैंने फील किया है, पत्रकारिता में सबसे अच्छी अनुभूति होती है काम का छोड़ना। नौकरी छोड़ते ही लगता है जैसे फ्री हो गये हैं, ” नीलेश ने मुस्कराते हुये कहा।

“ मैं इतनी आसानी से चीजों को छोड़ने वाला नहीं हूं, इसकी कीमत कोई लोगों को चुकानी होगी, मुझे अफसोस सिर्फ रंजन को लेकर है। मजे की बात है कि उन दोनों ने रंजन का भी इस्तेमाल कर लिया और वह खुद को इस्तेमाल होने से बचा नहीं पाया। कुछ करने से पहले उसे एक बार डिस्कस कर लेना चाहिये था।”

जारी…………

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