चल मां के दरबार में (कविता)

राजेश वर्मा,

चल रे साथी..हाथ जोड़ ले
मां के दर्शन कर ले
धुल जाएंगे पाप तेरे
क्यूं मोह-माया में भटके
चल रे साथी…ओ साथी……
जय जगदम्बे… जय मां जय जगदम्बे…
जीवन उसका तर जाता है
जो कोई शरण में आया
चल रे साथी…ओ साथी……
जय जगदम्बे… जय मां जय जगदम्बे…
पल भर में झोली भर दे
महिमा उसकी कोई समझ न पाया
ये तेरे कर्मों का फल है
पैसा कमाकर भी रोया
जिसने तुझको जीवन दिया
उसे ही तूने भुलाया
चल रे साथी…ओ साथी……
जय जगदम्बे… जय मां जय जगदम्बे…
घमंड अपना छोड़ दे
मां ने तुझे बुलाया
पीछे मुड़कर देख ले
क्या खोया क्या पाया
चल रे साथी…ओ साथी……
जय जगदम्बे… जय मां जय जगदम्बे…
लौंग कपूर की आरती करके चुनरी तुम चढ़ाओ
हर डाली से फूल तोड़कर माला उसे पहनाओ
माथे पर तिलक लगाकर अखंड ज्योति जलाओ
मां के गुणगान में ही ध्यान अपना ध्यान लगाओ
शीश झुका दे चरणों में उसके
शीश झुका दे चरणों में उसके….
हो जाएंगे तेरे वारे न्यारे
चल रे साथी…ओ साथी……
जय जगदम्बे… जय मां जय जगदम्बे…
चल रे साथी…ओ साथी….

-राजेश वर्मा, कानपुर

साभार : — http://muhkhole.blogspot.in/

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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