चीन के प्रति ठोस नीति की जरूरत

पूर्वी लद्दाख में चीनी फौज जिस तरह से वास्तविक नियंत्रण रेखा से 10 किलोमीटर आगे निकल आयी है, उससे चीन और भारत के बीच सैनिक झड़प की आशंका बढ़ गई है। हालांकि दोनों मुल्कों के नीति निर्धारक यही कह रहे हैं कि हालात बहुत जल्द ही सामान्य हो जाएंगे क्योंकि सैनिक  अधिकारियों के बीच बातचीत चल रही है। माओत्से तुंग की फिलॉसफी ‘शक्ति बंदूक की नली से निकलती है’ पर चलने वाला चीन लंबे समय से भारत में अपनी विस्तारवादी नीतियों को जारी रखे हुये है। चीन की नजर न सिर्फ भारत की सीमाओं पर है बल्कि  वह यहां के व्यापक बाजार को भी अपनी गिरफ्त में लेने की भरपूर कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि भारत के बाजार चीन निर्मित सामानों से पटे हुये हैं। लद्दाख में चीन की फौजी गतिविधि भारत में उसकी विस्तारवादी नीति का ही अहम हिस्सा है। इतिहास गवाह है कि चीन इस इलाके में विगत में भी फौजी जोर-आजमाइश करता रहा है। इसके बावजूद भारत आज तक चीन को अच्छी तरह से समझ कर उसके प्रति एक स्पष्ट और मजबूत विदेश नीति अख्तियार करने में नाकामयाब रहा है।
विगत में चीन की शानदार सांस्कृतिक विरासत और सिल्क रूट की वजह से भारत के साथ उसके व्यापारिक संबंधों को लेकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू चीन के प्रति रूमानियत अहसास से लबरेज थे। इसका खामियाजा नेहरू को 1962 में भुगतना पड़ा था। ‘पंचशील’ के तमाम सिद्धांतों को ताक पर रखकर चीन ने लद्दाख में फौजी कार्रवाई करते हुये भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया था। उस वक्त चीनी फौज के मुंह पर   ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ के बोल थे, जबकि उनकी बंदूकों का रुख भारत की ओर था। उस वक्त पंचशील की भावना से ओत-प्रोत होकर भारतीय फौज को यह हिदायत दी गई थी कि चाहे कुछ भी हो जाये पहली गोली भारत की ओर से नहीं चलनी चाहिए। लद्दाख में तैनात भारतीय फौज कसमसाती रही और चीनी सैनिक आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे। लाख कोशिश के बावजूद पंडित नेहरू चीन को लेकर अपनी गलत समझ की वजह से 1962 का युद्ध नहीं टाल सके। पंचशील में कही गई सारी बड़ी-बड़ी बातें धरी की धरी रह गई। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत पर चीन के आक्रमण की वजह से पंडित नेहरू को जोरदार सदमा लगा था और इसी सदमे की वजह से बाद में उनकी मौत भी हो गई। पंडित नेहरू इस सदमे से निकल नहीं सके। 1962 के युद्ध के बाद से चीन का मनोबल लगातार बढ़ता ही गया। बाद में भारतीय फौज ने जबरदस्त जवाबी कार्रकाई करते हुये चीन के बढ़ते हुये कदम को तो रोक दिया लेकिन उस वक्त चीन द्वारा दबाये गये एक बहुत बड़े भू-भाग को वह चीन से आजाद नहीं करा सकी। यह चीन के बढ़े हुये मनोबल का ही सबूत है कि चीन की फौज एक बार फिर भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने पर आमादा है।
सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन में अब तक तीन बार सैनिक संघर्ष हो चुके हैं। 1962 के युद्ध के बाद 1967 और 1987 में भी दोनों देशों की फौजें दो-दो हाथ कर चुकी हैं। हालांकि 1980 के बाद दोनों देशों के बीच कूटनयिक और आर्थिक संबंधों को बहाल करने की भरपूर कोशिशें की जाती रहीं। इसके बावजूद सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच तल्खी बनी रही। चीनी फौज बार-बार वास्तविक सीमा रेखा का उल्लंघन करने की अपनी नीति पर आज तक कायम है। भारत पर चौतरफा दबाव बनाने के उद्देश्य से चीन पाकिस्तान को भी उकसाता रहा है। भारत और चीन की सीमा अरुणाचल प्रदेश और दक्षिणी तिब्बत से मिलती है। पाक नियंत्रित कश्मीर का कुछ हिस्सा भी दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। हिमालय की पहाड़ी शृंखला भारत और चीन को विभाजित करती हैं। विगत में हिमालय की वजह से भारत खुद को चीन से महफूज समझता था। वैसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से शुरू से ही एक दूसरे के काफी करीब रहे हैं। बौद्ध धर्म का विस्तार भारत से ज्यादा चीन में ही हुआ। सिल्क रूट के माध्यम से दोनों के देशों के बीच लंबे समय तक व्यापारिक संबंध भी बने रहे। यहां तक कि माओत्से तुंग की सरकार को मान्ययता देने वालों में भारत सबसे आगे था। इसके बावजूद चीन भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपनाये हुये है।
चीन का कहना है कि भारत तिब्बत में साम्राज्यवादी नीति पर अमल कर रहा है। चीन 104,000 वर्ग किलोमीटर भू-भाग पर दावा करता है, जो भारत के नक्शे में भारत के भूभाग के रूप में दर्ज है। चीन लंबे समय से भारत से लगती चीन के सीमा के पुनर्निर्धारण की मांग कर रहा है। अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए चीन ने 1965 में भारत-पाक युद्ध के समय पाकिस्तान का खुला समर्थन किया था। इसके ऐवज में चीन को पाकिस्तान की ओर से पाक शासित कश्मीर का कुछ हिस्सा भी दिया गया था। इतना ही नहीं उत्तर भारत के कुछ राज्यों में पृथकतावादी आंदोलनकारियों को भी चीन की ओर से हर तरह की मदद की जाती रही है। यहां तक कि भारत में चलने वाले नक्सल और माओवादी आंदोलनकारियों को भी चीन की कम्युनिस्ट सरकार की हर तरह मदद मिलती रही है। मतलब साफ है कि चीन भारत को कमजोर बनाने का एक भी मौका नहीं चूकता है।
चीन पर नजर रखने वाले जानकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि चीन एक विश्वसनीय मुल्क नहीं है। उसकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। इस तरह की फितरत वाले मुल्क से निपटने के लिए भारत को अंतत: खुद की शक्ति पर ही यकीन करना होगा। पाकिस्तान भारत के साथ खुले तौर पर एक दुश्मन देश की तरह पेश आता है, जबकि चीन भारत के लिए एक छुपा हुआ दुश्मन देश है। भारत के रक्षामंत्री रह चुके जार्ज फर्नांडिस ने भी चीन को दुश्मन नंबर एक की संज्ञा दी थी, जिसे लेकर काफी हंगामा हुआ था। मजे की बात है कि चीन अवैध तरीके से अपने यहां निर्मित सामानों को बड़े पैमाने पर भारत में धकेल कर यहां की अर्थव्यवस्था को भी पूरी तरह से अपने प्रभाव में लेने में लगा हुआ है। समय रहते भारत को चीन के प्रति एक स्पष्ट अंतरराष्टÑीय नीति बनाकर उस पर ठोस तरीके से अमल करने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो दिन प्रति दिन ड्रैगन का प्रभाव भारत पर बढ़ता ही जाएगा। कभी नेपोलियन बोनापार्ट ने चान के संबंध में भविष्यवाणी करते हुये कहा था कि यह एक सोया हुआ दैत्य है, जो जागने के बाद सारी दुनिया को निगलने की कोशिश करेगा। यदि नेपोलियन बोनापार्ट की भविष्यवाणी पर यकीन करें तो भारत को और अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चीन भारत का पड़ोसी मुल्क है और अब तक अपनी हरकतों से सिद्ध कर चुका है कि उसे सिर्फ अपने हित के अलावा और कुछ नहीं दिखाई देता।
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