पारिवारिक रिश्तों को सहेजने, समेटने और जीने का नाम है ‘संयुक्त परिवार’

आज के व्यवासीकरण में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वह है संयुक्त परिवार का टूटना। जहां पहले संयुक्त परिवार के नाम पर हमें एक साथ दो या तीन या उससे भी ज्यादा पीढि़यों का प्यार और अपनापन मिलता था वहीं इसके बिखरने से अब हर जगह एकल परिवार के नाम पर रिश्ते बस स्वार्थ का पर्याय भर रह गये हैं। संयुक्त परिवार के नाम पर जब एक साथ सभी एक छत के नीचे निवास करते थे तो सबसे अनुकूल प्रभाव बच्चों पर पड़ता था। बात चाहे उनकी सुरक्षा की हो या संस्कारों को समझने की सभी एक छत के नीचे कभी दादी की कहानियों में तो कभी दादा जी के अनुभवों में समाहित होते थे। इस प्रकार कह सकते कि तीनों पीढि़यों के संस्कार एक दूसरे में बिना किसी संचार के अंतरित होते रहते थे। इस तरह परिवार में बुजुर्गो के महत्व को समझना मुश्किल नहीं है। आज इस एकल परिवार की परिपाटी में संबंधों में जो बिखराव आया है उसकी मुख्य वजह हमारे आचार, व्यवहार, अपनी जरूरतों को ज्यादा महत्व एवं जीवन पद्धति में आने वाला बदलाव है। हालांकि कुछ लोग इसके टूटने को स्वाभाविक मानते हैं। इस वक्तव्य के साथ कि कृषि प्रधान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संयुक्त परिवार एक स्वाभाविक जरूरत थी, पर वर्तमान परिवेश में जहां हर किसी की जरूरतें बढ़ गई हैं और किसी एक की कमाई से यह पूरी नहीं की जा सकती, फिर परिवार तो टूटेंगे ही। बहुत से लोगों की अपनी दलील होती इस संदंर्भ में कि संयुक्‍त परिवार के कुछ नुकसान भी थे, मसलन अपने बच्‍चों के व्‍यक्‍तित्‍व को मनचाहा रूप नहीं दे पाना, गोपनीयता, निजता और स्‍वयं पर निर्भरता का पाठ नहीं मिल पाना, इस तरह की बातें संयुक्त परिवार के टूटने के लिए जिम्मेवार बताई जाती हैं।

आज के परिवेश की सबसे बड़ी खामी किसी का किसी स्तर पर समझौता न करना और समर्पण तो जैसे इतिहास की बात हो। सबके साथ रहने और अपने लोगों को सुनने, गुनने और समझने के लिए संयुक्त परिवार की व्यवस्था ने इतने रिश्ते दिये हैं जो शायद दुनिया के नक्शे पर कहीं नहीं मिले। रिश्तों को जीने की कला से आज की युवा पीढ़ी का पलायन सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। निजी स्वतंत्रता के नाम पर बुजुर्गों का अपमान एवं सिर्फ और सिर्फ आर्थिक उन्नति को ही सर्वांगिण विकास समझना यह आधुनिकता की परिभाषा बन गई है। संयुक्त और एकल परिवार के फायदे नुकसान पर बहस की गुंजाइस भले हो, इसकी खामियों- खूबियों पर चर्चा कराने की संभावनायें भी हो सकती हैं, इस पर वाद-विवाद भी हो सकता, फिर भी संयुक्त रूप से परिवार में रहने का सीधा और स्पष्ट फायदा यह दिखता कि हम जिन लोगों के बीच रहने की बात करते वो हमारे अपने हैं। कहते हैं कि खून कितना भी पतला हो जाये कभी पानी नहीं बन सकता यानि हमेशा पानी से गाढ़ा ही रहता है। सिर्फ इसकी जरूरतें और पारिवारिक जनों के महत्व को समझने की आवश्यकता है। पारिवारिक रिश्तों को सहेजने, समेटने और उन्हें जीने का नाम है संयुक्त परिवार

बहरहाल संयुक्त परिवार की मजबूत व्यवस्था कभी हमारी पहचान होती थी, पर आज भारतीय समाज भी छोटे-छोटे एकल परिवारों का समाज बनता जा रहा है। इस परिवर्तन के लिए जिम्मेवार दूसरी वजह भले अस्पष्ट हो पर स्वतंत्र निर्णय लेने, बुजुर्गों की जिम्मेदारी से भागने, धन संपदा की अत्यधिक चाहत, और परंपरागत मूल्यों-मान्यताओं से दूर होने का दूसरा नाम एकल परिवार है।

This entry was posted in रूट लेवल. Bookmark the permalink.

One Response to पारिवारिक रिश्तों को सहेजने, समेटने और जीने का नाम है ‘संयुक्त परिवार’

  1. madhukar says:

    badhiya likha hae. sanykt pariwar ka mahtw akal pariwar me musibat parne par pata chalta hae. pase ki duni me log pagal ho rahe haen. single unit hoga to jo chahen kharidenge. privecy rahegi. ye pri vec kya hae?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>