तुर्की में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़

कुछ दिन पहले इस्तांंबुल में एक पार्क के नवीनीकरण की योजना के खिलाफ जब लोग सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे थे, उस वक्त तुर्की के प्रधानमंत्री रेसेप तेईप एरडोगन सरकार के नीति निर्धारकों को इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि तुर्की के करीब 67 शहर इस विरोध की चपेट में आने वाले हैं। फिलहाल तुर्की के मुख्तलफ शहरों में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। जगह-जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हो रही हैं और इस पर काबू पाने के लिए रेसेप तेईप एरडोगन की हुकूमत को एड़ी चोटी का जोड़ लगानी पड़ रही है। जानकारी के मुताबिक अब तक 1500 लोगों को हिरासत में लिया गया है और आंसू गैस की चपेट में आने की वजह से दर्जनों लोग अपनी आंखें गंवा चुके हैं। इसके बावजूद विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री एरडोगन यही कह रहे हैं कि इस विरोध प्रदर्शन के पीछे विपक्षी दल नेशनल मूवमेंट पार्टी का हाथ है। ये लोग एक चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की साजिश कर रहे हैं और इस साजिश को किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मतलब साफ है कि प्रधानमंत्री एरडोगन प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का मन बना चुके हैं। जिस तरह से व्यापक पैमाने पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया जा रहा है, उससे अमेरिका सहित तमाम मगरबी देशों के नुमाइंदों के माथे पर शिकन है। मानवाधिकार संगठनों ने भी प्रधानमंत्री एरडोगन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, लेकिन एरडोगन पर इसका कुछ खास असर होता नहीं दिख रहा है। पुलिस प्रदर्शनकारियों के दमन में बदस्तूर लगी हुई है। तुर्की के इस्तांबुल में तकसीम चौक के पुनर्विकास को लेकर सरकार अडिग है। यहां पर सैनिकों के लिए एक बैरक बनाने की योजना है। हालांकि लोग यही कह रहे हैं कि इस बैरक के साथ-साथ यहां पर मॉल बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है। लोग इस पार्क के साथ छेड़छाड़ को लेकर आक्रोशित थे। इस पार्क में होने वाले निर्माण कार्य के खिलाफ लोगों ने तकसीम चौक  पर धरना पर बैठ गये। देखते-देखते लोगों की संख्या में इजाफा होता गया और अंतत: उन लोगों को वहां से हटाने के लिए पुलिस दल बल के साथ मैदान में उतर आई। जैसे ही पुलिस ने वहां से लोगों को हटाने की कोशिश की, वे भड़क उठे और फिर आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो गई। शुरुआती दौर में लोगों की उग्रता को देखते हुये पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। फिर पुलिस ने पूरी तैयारी के साथ लोगों पर हमला बोल दिया और इसके साथ ही इस्तांबुल का तकसीम चौक जंग के मैदान में तब्दील हो गया। इस बीच प्रधानमंत्री एरडोगन बार-बार यही दोहराते रहे कि पार्क और तकसीम चौक के पुनर्निर्माण कार्य को किसी भी कीमत पर नहीं रोका जाएगा और न ही अतिवादियों को तकसीम चौक पर खुलेआम घूमने की इजाजत दी जाएगी।

जानकारों का मानना है कि महज एक पार्क और तकसीम चौक के साथ छेड़छाड़ को लेकर तुर्की के मुख्तलफ शहरों में इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर नहीं उतर सकते हैं। वर्तमान घटना ने सिर्फ चिंगारी का काम किया है। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार हो रही थी। दरअसल प्रधानमंत्री एरडोगन तुर्की में गुप्त रूप से इस्लामिक एजेंडे को लागू कर रहे हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने तुर्की में रात दस बजे से लेकर सुबह छह बजे तक शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया था कि शराबखोरी की वजह से तुर्की के युवाओं का मुस्तकबिल खराब हो रहा है। लेकिन तुर्की में एक तबका प्रधानमंत्री एरडोगन के इस कदम को इस्लाम के साथ जोड़ कर देख रहा है। इस तबके का कहना है कि तुर्की एक खुला देश है। यहां पर कट्ठरपंथियों के लिए कोई स्थान नहीं है। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री एरडोगन गुप्त रूप से इस्लामिक एजेंडों को लागू करने की कोशिश करेंगे तो ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। वह पिछले एक दशक से सत्ता में बने हुये हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उन्हें तुर्की में कुछ भी करने का अधिकार हासिल हो गया है। लोगों का गुस्सा स्वाभाविक तौर पर फूटा है। पिछले कुछ वर्षों से अरब जगत में चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों का असर यहां स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
प्रधानमंत्री एरडोगन चाह रहे हैं कि सड़कों पर उतरे लोगों को शांत करने के लिए उनसे बातचीत प्रक्रिया भी शुरू की जाये, लेकिन इन प्रदर्शनकारियों की ओर से अभी तक कोई भी नेता उभर कर सामने नहीं आया है। इससे पता चलता है कि लोगों के मन में प्रधानमंत्री एरडोगन की नीतियों को लेकर गुस्सा तो है लेकिन उनके पास नेतृत्व का अभाव है। तुर्की में इस वक्त जो कुछ भी हो रहा है, वह स्वत:स्फूर्त रूप से हो रहा है। मानसिकतौर पर लोग तथाकथित इस्लामिक कानून को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। यही वजह है कि अंकारा में लोग प्रधानमंत्री एरडोगन हुकूमत की शराब नीति के मुखालफत करने के लिए प्रदर्शन के दौरान जमकर शराबखोरी करते हुये स्वतंत्रता के पक्ष में नारा बुलंद कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों में धर्मनिरपेक्षवादियों की संख्या अधिक थी, जो लगातार प्रधानमंत्री एरडोगन की तथाकथित इस्लाम परस्त नीतियों की मुखालफत कर रहे हैं।
कहा जाता है कि किसी भी मुल्क पर उसके इतिहास का असर जरूर पड़ता है। तुर्की भी इसका अपवाद नहीं है। कभी तुर्की के आधुनिकीकरण के लिए मुस्तफा कमाल पाशा ने वहां जबरदस्त अभियान छेड़ा था। तुर्की को कठमुल्लाओं के चंगुल से निकालने के लिए उसने कालेजों में लड़कियों के बीच आधुनिक कपड़े बंटवाये थे। इसके अलावा तुर्की में वैज्ञानिक शिक्षा की नींव रखने के साथ-साथ लोगों के चाल-चलन और मानसिकता को बदलने में उसने अहम भूमिका निभाई थी। कई तरह के सामाजिक सुधारों की भी उसने शुरुआत की थी।  मुस्तफा कमाल पाशा के शानदार काम की वजह से ही उसे ‘अतातुर्क’ अर्थात तुर्की का पिता कहा जाने लगा था। आज भी तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा को सम्मान की नजर से देखा जाता है। एक वर्ग तुर्की को नवउदारवादी नीतियों पर ही आगे ले जाने का हामी है। इस वर्ग का मानना है कि प्रधानमंत्री एरडोगन तुर्की को गुप्त रूप से कट्टरतावाद के रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, जो तेजी से बदल रही विश्व व्यवस्था को देखते हुये किसी भी मायने में सही नहीं है। इस वर्ग को प्रधानमंत्री एरडोगन की तथाकथित कट्टरवादिता रास नहीं आ रही है। ये लोग आज भी तुर्की को मुस्तफा कमाल पाशा की राह पर ही आगे बढ़ाने के हिमायती हैं।
तुर्की में जारी हिंसा को लेकर तमाम तरह के मानवाधिकारवादी संगठन भी चिंतित है। एमनेस्टी इंटरनेशन ने प्रधानमंत्री एरडोगन को प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए इस्तेमाल किये जा रहे हिंसा के तौर तरीकों को लेकर आगाह किया है। तुर्की ह्यूमैन राइट्स एसोसिएशन प्रमुख ओजतुर्क तुर्कदोगन ने भी तुर्की में जारी हिंसा को लेकर चिंता जताते हुये कहा है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ व्यापक पैमाने आंसू गैस का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है। यह लोक स्वास्थ्य के लिए खतरा है और निस्संदेह यह अपराध की श्रेणी में आता है। लोग प्रधानमंत्री एरडोगन की जन विरोधी नीतियों का विरोध कर रहे हैं और विरोध के उनके अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि प्रधानमंत्री एरडोगन इस तरह के तमाम तर्कों को खारिज करते हुये कह रहे हैं कि वह यह दावा नहीं करते कि चुनी हुई बहुमत की सरकार को कुछ भी करने का हक है। जिस तरह से बहुसंख्यक अपनी इच्छा अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकते, वैसे ही अल्पसंख्यक भी अपनी बात जबरन नहीं मनवा सकते। बहरहाल सत्ता पक्ष और नेतृत्वविहीन प्रदर्शनकारियों के बीच जारी हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच तुकी के मुख्तलफ शहरों में प्रधानमंत्री एरडोगन के इस्तीफे जोर शोर से हो रही है। अभी जिस तरह के हालत तुर्की में बने हुये उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि अभी वहां पर हिंसा का दौर थमने वाला नहीं है।
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