आरटीआई पर सियासी दलों की एकता

अवाम की लगाम थामने की होड़ करने वाले राजनीतिक दल जनता को हिसाब-किताब देने के लिए तैयार नहीं है। सभी दलों के नेता एक स्वर में यही कह रहे हैं कि इससे जनतंत्र को खतरा है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि चुनाव में पैसे पानी की तरह बहाये जाते हैं। यहां तक कि डेमोक्रेसी की छोटी-छोटी संस्थाओं में भी चुनाव के दौरान जमकर पैसे उड़ाये जाते हैं। कहने के लिए प्रत्याशियों द्वारा खर्चे का लेखा-जोखा नियमित रूप से चुनाव आयोग के पास भेजा जाता है लेकिन सभी को पता है कि चुनाव में जीत हासिल करने के लिए किस तरह से शराब और गोस्त की पार्टियां बदस्तूर चलती रहती हैं। इसके इतर विभिन्न पार्टियों द्वारा रैलियों और सम्मेलनों के आयोजन में जमकर पैसा खर्च किया जाता है और इस खर्चे का कोई ब्योरा नहीं रखा जाता है। इसके अलावा भी और तमाम तरह के खर्चे होते हैं। सहजता से अंदाज लगाया जा सकता है कि किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को लगातार चलाते रहने के लिए अथाह धन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में  सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर धन आता कहां से है? विभिन्न पॉलिटिकल पार्टी को धन देने वाले लोग इसके एवज में क्या हासिल करते हैं? जिस तरह से राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने के फैसले के खिलाफ सभी राजनीतिक दल गोलबंद हो गये हैं, उसे देखकर यही लगता है कि इस फैसले को किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने दिया जाएगा। केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले को सीधे-सीधे लोकतंत्र पर चोट करार दिया जा रहा है।
सियासी दलों पर धनकुबरों की कृपा
एक अदना सा आदमी को भी पता है कि भारत में धनकुबरों की टोली बड़ी सियासी दलों के आगे-पीछे घूमती रहती है। दल के छोटे-बड़े कामों के साथ-साथ सियासतदानों के निजी खर्चों के लिए भी इनकी थैलियां हमेशा खुली रहती हंै। सियासी दलों को धन देने के मामले में ये पूरी तरह से उदार हैं। लगभग सभी दलों को उनके रसूख के मुताबिक धन कुबेरों की ओर से चंदे के तौर पर बड़ी-बड़ी रकमें अंदर खाते दी जाती है। वैसे नियम यही है कि 20 हजार से अधिक की राशि हासिल करने पर सियासी दलों को इसका हिसाब रखना पड़ता है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इस नियम की धड़ल्ले से धज्जियां उड़ाई जाती हैं। सियासी दलों को सांचे में ढालने के लिए ‘लामबंदी’ के नाम पर मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा तो विधिवत फंड मुहैया कराई जाती है और इस फंड का वितरण सभी दलों के बीच में होता है। अब यदि सियासी दलों पर आरटीआई का शिकंजा कसता है तो निस्संदेह उन्हें चंदे के रूप में हासिल होने वाली हर छोटी-बड़ी रकम का हिसाब रखना होगा। साथ ही लोगों को यह जानकारी भी हासिल करने में सहूलियत होगी कि किस दल को कहां से पैसा मिल रहा है और वह दल इस पैसे का इस्तेमाल कैसे कर रहा है। इस तल्ख सचाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में दी जाने वाली रकम के एवज में राष्टÑीय व अंतरराष्टÑीय औद्योगिक संगठन अपने हित में न सिर्फ सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर वे सत्ताधारी दल पर अपने धंधे की राह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए संसद व विधानसभाओं में मनोनुकूल कानून बनाने का भी दबाव डालते हैं। यह सब कुछ अघोषित रूप से बड़ी मजबूती के साथ होता है।
कॉरपोरेट कल्चर में ढलते दल
मुख्तलफ राष्टÑीय मसलों पर एक दूसरे के खिलाफ तलवारबाजी करने वाले राजनीतिक दलों की एकता जनता के सामने खाताबही न खोलने के मसले पर देखते ही बन रही है। ऐसी एकता यदि राष्टÑ के उत्थान को लेकर होती तो अब तक मुल्क की तस्वीर ही बदल गई होती। इस  तल्ख सचाई से सभी वाकिफ हैं कि देश की संपत्ति की बंदरबांट में सभी दलों का रवैया पूरी तरह से ‘समाजवादी’ है। अब कोई अदना सा आदमी इनसे हिसाब मांगेगा तो भला ये कैसे बर्दाश्त करेंगे? कहा यही जा रहा है कि आजादी के बाद एक लंबी प्रक्रिया के तहत तमाम राजनीतिक दल इंडस्ट्री के रूप में तब्दील हो गये हैं, कुछ अंदर खाते कॉरपोरेट कल्चर को अख्तियार किये हुये हैं तो कुछ विशुद्ध रूप से ‘फैमिली इंडस्ट्री’ के रूप में फल-फूल रहे हैं। सैद्धांतिक रूप से सभी अवाम की नि:स्वार्थ सेवा करने का दावा करते हैं। लेकिन व्यवहार में इनका एक मात्र उद्देश्य सत्ता में काबिज होना होता है और इसके लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए इन्हें व्यापक पैमाने पर धन की जरूरत होती है। अब जब केंद्रीय सूचना आयोग इन्हें आरटीआई के दायरे में लाने की बात कर रही है तो यह खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। पारदर्शिता का यह रास्ता इन्हें नहीं सुहा रहा है। अपने तमाम मतभेदों को दरकिनार करके केंद्रीय सूचना आयोग से इस अहम मसले पर दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। फिलहाल केंद्रीय सूचना आयोग ने देश की छह बड़ी राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने का फैसला आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल और अनिल बैरवाल की अलग-अलग शिकायतों पर एक साथ कार्रवाई करते हुए दिया, जिससे इनकी नींदें उड़ी हुई हैं।
राजनीतिक दलों की एकता
कांग्रेस पार्टी आरटीआई के खिलाफ काफी मुखर होकर सामने आई है। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने तो इस फैसले का जोरदार विरोध करते हुए यहां तक कहा है कि यह लोकतंत्र पर आघात है। कांग्रेस इस फैसले का विरोध करती है और उसे यह मंजूर नहीं है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट करने की जहमत नहीं उठाई है कि यह लोकतंत्र पर आघात कैसे है? क्या देश की अवाम को यह जानने का हक नहीं है कि उन पर शासन करने की मंशा रखने वाली पार्टियों को फंड कहां से आता है और वे इसका इस्तेमाल कैसे करती हैं? इस मसले पर भाजपा भी कांग्रेस के साथ सुर मिला रही है। भाजपा के प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने  कहा है कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग के प्रति जिम्मेदार हैं न कि केंद्रीय सूचना आयोग के प्रति। सीआईसी का यह फैसला लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। इसी तरह जेडी(यू), एनसीपी और सीपीआई (एम) ने भी इस फैसले का विरोध किया है। सीपीआई की ओर से जबाव देते हुए जहां एबी वर्धन ने अनिल बैरवाल को भेजे जबाव में सीपीआई को लोक प्राधिकरण करार दिया था, वहीं सुधाकर रेड्डी ने अपने जबाव में कहा है कि राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे में नहीं आती हैं। भारतीय मार्क्सवादी पार्टी ने भी सूचना के अधिकार को राजनीतिक दलों पर लागू करने पर विरोध जताया है।
अवाम के पक्ष में आम आदमी पार्टी
इस मसले को लेकर आम आदमी पार्टी पूरी तरह से अवाम के पक्ष में खड़ी हैं। चूंकि आम आदमी पार्टी से बहुत सारे आरटीआई कार्यकर्ता जुड़े हैं। इसलिए सियासी दलों को आरटीआई के दायरे में लाने को लेकर उसका रुख पूरी तरह से साफ है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि सत्ता में रहने वाली पार्टी फंड के दम पर काकॅपोरेट घरानों को जमकर फायदा पहुंचाती है। ‘आप’ के नेता संजय सिंह जोर देते हुये कहते हैं कि जिन कॉरपोरेट घरानों को सस्ते में कोल ब्लॉक आवंटित किए गए, उनसे कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों को चंदा के नाम पर मोटी रकम मिलती रही है। आरटीआई के माध्यम से कई टेढ़े सवाल पूछे जा सकते हैं, जिनका जवाब देने में राजनीतिक पार्टियों को पसीने छूट जाएंगे। किस आधार पर कौन पार्टी टिकट बांट रही है और पैसे लेकर टिकट बेचने समेत कई सवालों से राजनीतिक पार्टियों को दो-चार होना पड़ सकता है।
आरटीआई की आड़ में ब्लैकमेलिंग
वैसे विगत कुछ वर्षों में आरटीआई का स्याह पहलू भी सामने आया है। आरटीआई कार्यकर्ताओं पर अधिकारियों को ब्लैकमेल करने का आरोप भी लगता रहा है। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर ने तो एसेंबली में यहां तक कहा था कि कुछ आरटीआई कार्यकर्ता आरटीआई एक्ट का दुरुपयोग कर रहे हैं। इसका इस्तेमाल वह ब्लैकमेलिंग के लिए कर रहे हैं। महाराष्टÑ में तो पुलिस अधिकारियों को आरटीआई के माध्यम से ब्लैकमेलिंग करने का मामला सामना आ चुका है। इस तरह की शिकायतें देश के अन्य हिस्सों से भी आ रही हैं। जानकारी के मुताबिक राजधानी दिल्ली में कुछ आरटीआई कार्यकर्ता व्यापक पैमाने पर ब्लैकमेलिंग के धंधे में लगे हुये हैं। देश के मुख्तलफ हिस्सों में भी संगठित रूप से आरटीआई के माध्यम से लोगों को ब्लैकमेल करने का धंधा फल-फूल रहा है। ऐसे में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि अब इस तरह के आरटीआई कार्यकर्ता अवैध वसूली के लिए सियासी लोगों पर भी हाथ डाल सकते हैं। आरटीआई के नाम पर बढ़ रही ब्लैकमेलिंग की इस प्रवृति को भी रोकना एक अहम चुनौती है।
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