बिहार में ‘एईएस’ बीमारी से बच्चों की मौत!

बबलु कुमार प्रकाश,

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बीमारी, 25 मासूम बच्चों की जान ले चुका हैं, सरकार चिरनिंद्रा में सोई हुई हैंलगता हैं मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं अन्य इन नौनिहाल बच्चों के मौत का कब्रगाह बन गया हैं, पिछले वर्ष भी बिहार के मुजफ्फरपुर और गया जिलों में 19 दिन के दौरान 87 बच्चों की अज्ञात बीमारी से मौतें हुई हैं। ये सरकारी आंकड़ा है जिनमें वो बच्चे शामिल हैं जो सरकारी अस्पताल तक पहुँच पाए। अगर गैर सरकारी आंकड़ों को देखा जाए तो इससे सिर्फ बिहार ही नहीं पूरा देश शर्मिंदा होगा।

2012 में निदेशक प्रमुख स्वास्थ्य मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, गया सिबिल सर्जन को एईएस में हुई शिशु के मोंत के बाद उनके निकटतम अभिभावक को मुख्य मंत्री राहत कोष से पचास हज़ार रुपया देने का निर्देश जारी किया गया था, क्या बच्चों के जीबन की कीमत सिर्फ पचास हजार रुपया मात्र हैं, उन माँ बाप का क्या जो अपने दिल के टुकड़े को सरकारी मिशनरी की उदासीनता के वजह से खो दिया।

मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड के सफल किसान श्री मनोज कुमार ने बताया कि इस बीमारी के कारण उनके गांव में 1993-94 से चार पांच छोटे बच्चो का मोंत हो गयी थी, ये बीमारी लगातार बीस बर्षों से लगातार अपना कहर बरपा रही हैं, श्री कुमार ने बताया यह बीमारी लीची के सीजन में ही ज्यादा सामने आई हैं, मुख्य कारण सड़े लीची जो पेड़ से गिर जाते हैं उनको खाने से बच्चे बीमार पड़ रहे हैं, या इस सीजन में मिलने वाले फल के कारण भी हो सकता हैं जिसमें भारी मात्रा में कीटनाशक छिड़का जाता हैं…..!

देश के हुक्ममरान नेता, मंत्री को छींक आ जाती हैं तो सरकारी खर्च पर अमेरिका, इंग्लेंड के बड़े अस्पताल में इलाज कराने चले जाते हैं। क्या राज्य या केंद्र की सरकार का ये दायित्व नहीं बनता है कि इस अज्ञात जानलेवा बीमारी से लड़ने के लिये दुनियां के सभी बड़े डाक्टर से राय ले या बुलाकर इस पर रिसर्च करवाये।
तीन चार बर्ष में एईएस से हज़ार से ज्यादा बच्चों की असमय मौत हो गयी इसका जिमेदार कोन हैं?

पिछले साल जब अक्टुबर माह में बच्चों की ताबड-तोड़ मौतें होने लगी तो विश्व स्वास्थय संगठन, नेशनल इंस्टीट्युट आफ वायरोलाजी और केंद्र सरकार की एक भारी-भरकम टीम ने प्रभावित इलाकों में जाकर जबरदस्त जांच-अनुसंधान किया, लेकिन वो रिपोर्ट को अब तक अंतिम रूप नहीं दे पायी। एनआईवी ने जो प्रारंभिक रिपोर्ट भेजी है, उसमें साफ लिखा है, अज्ञात बीमारी की चपेट में आनेवाले ज्यादातर वह बच्चे थे, जिन्होंने जैपनीज इंसेफ्लाइटिस (जेइ) का टीका लिया था। टीम ने 116 बच्चों की जांच के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। इस बार भी पीड़ित होने वाले कई बच्चे जेई का टीका ले चुके हैं।
हालांकि बीमारी के कारणों का पता नहीं चल सका है। टीम ने भी इस बाबत शोध की आवश्यकता जताई है। टीम ने अपने अध्ययन रिपोर्ट में कहा है, अज्ञात बीमारी दरअसल एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम है। गंदगी वाले इलाके में इस बीमारी का प्रकोप ज्यादा है, लेकिन यह इंसेफ्लाइटिस नहीं है। जांच में इंसेफ्लाइटिस के वायरस बेस्टनाइल, नीपा व चांदपुरा वायरस नहीं मिले हैं। टीम ने यह भी कहा कि यह सेलिब्रल मलेरिया नहीं है। जिन बच्चों की जांच की गयी, उनमें ज्यादातर दो से छह साल के बीच के है। इसके अलावा इनमें जो कॉमन बातें पायी गयीं, उनमें 70 फीसदी बच्चों का घर गांव के किनारे है। इनके घर के पास खेत या बगीचा है। यह सुबह चार से आठ बजे के बीच पीड़ित हुये। टीम को एक प्रश्न का संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया कि पीड़ित बच्चों के बीमारी होने के कितने समय पहले लीची खायी थी ?
(कहीं कीटनाशक के कुप्रभाव, या सड़ा लीची तो कारण नहीं) ये एक वैज्ञानिक जाँच के विषय हैं।)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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