दूर तक फैली है नक्सलवाद की जड़ें

नक्सली समस्या पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में लगभग सभी दल इस बात पर सहमत थे कि नक्सलियों को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाने का वक्त आ गया है, क्योंकि नक्सली अब सीधे तौर पर राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को निशाना बना रहे हैं। अगर उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा। बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर पोस्ट में यहां तक कहा कि यह कहना गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ में हुआ हमला हमारे राष्टÑ के लोकतंत्र के बुनियाद पर सीधा प्रहार है। सवाल उठता है कि क्या जब सियासी नुमाइंदों पर हमला होता है, तभी लोकतंत्र खतरे में पड़ता है?
चार दशक से सक्रिय हैं नक्सली
नक्सली पिछले चार दशक से देश के सियासी माहौल को भांपते हुये अपनी स्ट्रेटेजी में बदलाव करते हुये अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने में लगे हुये हैं। इस दौरान नक्सलियों द्वारा असंख्य लोगों की हत्याएं की गई हैं। जहां-तहां जन अदालतें लगा कर समानांतर न्यायिक व्यवस्था को स्थापित करते हुये नक्सलियों द्वारा घोषित अपराधियों को सार्वजनिक रूप से क्रूरतम सजाएं दी गई हैं। नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले उद्योगपतियों और मजदूरों से एक साथ लेवी के रूप में मोटी रकमें वसूली जाती रही हैं। तो क्या अब तक नक्सलियों द्वारा भारत सरकार के समानांतर अपनी खुद की व्यवस्था स्थापित करने की प्रक्रिया लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला नहीं था? अब जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने एक झटके में कांग्रेस के शीर्ष नुमाइंदों का सफाया कर दिया है, इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है कि नक्सलियों की यह कार्रवाई लोकतंत्र पर प्रहार है। क्या नक्सल समस्या को लेकर यह सतही सोच का नतीजा नहीं है?
सिर्फ आतंकवादी समस्या नहीं
केद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे नक्सल समस्या को आंतकवाद से जोड़कर देख रहे हैं। नक्सलियों द्वारा छत्तीसगढ़ में की गई अब तक की सबसे हिंसक कार्रवाई को वह आतंकवादी घटना करार देते हुये नक्सलियों का जड़मूल से सफाया की बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे अभी भी इस हकीकत को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि नक्सल समस्या सिर्फ आतंकवाद से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में कहीं गहरी धंसी हुई हैं। यदि हम इतिहास को कुरेदें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि नक्सली भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों का फायदा उठाते हुये अपने आंदोलन को लंबे समय से एक निश्चित दिशा में चलाने की कोशिश कर रहे हैं और देश का एक बहुत बड़ा तबका सीधे तौर पर इस आंदोलन से जुड़ा हुआ है। साथ ही एक बहुत बड़े तबके की सहानुभूति इस आंदोलन के प्रति है। हालांकि शहरी आबादी अभी इससे दूर है। नक्सली नस्ल दर नस्ल अपने वैज्ञानिक समाजवादी फार्मूले को संशोधित करते हुये अपने आंदोलन को विस्तार देने में लगे  हुये हैं। नक्सलियों को आतंकवादी कह कर खारिज करने या फिर जंगलों में घुसकर पुलिस या अर्द्ध सैनिक बलों द्वारा उन्हें हलाक् करवाने मात्र से इस ससस्या का कोई ठोस समाधान निकलने वाला नहीं हैं। इस समस्या के समाधान के लिए इतिहास की धारा को समझना जरूरी है।
आयातित विचारधारा
देश में नक्सली विचारधारा एक आयातित विचारधारा है। रूस और चीन में घटी घटनाओं का प्रभाव यहां के नक्सलियों पर स्पष्टरूप से देखा जा सकता है। विचारधारा और संगठन के स्तर पर इसकी जड़ें रूस की बोलशेविक पार्टी से जुड़ी हैं, जिसका नेतृत्व लेनिन के हाथों में था। रूस में 1903 में संगठन के उद्देश्य और इसे प्राप्त करने के तौर-तरीकों को लेकर मार्क्सवादी रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी के दूसरे अधिवेशन में बोलशेविक अस्तित्व में आये थे। स्पष्टत: मार्क्सवादी पार्टी दो-फाड़ हुआ था। बोलशेविक रूस की स्थापित तमाम सार्वजनिक और प्रशासनिक संस्थाओं को हथियारों के बल खत्म करने के पक्षधर थे। वर्तमान चुनाव प्रक्रिया को ये लोग खारिज कर रहे थे। जबकि मेंशेविक चुनावी प्रक्रिया के समर्थक थे और चुनाव के माध्यम से बदलाव की दलील दे रहे थे। आखिरकार 1905 मेंं बोलशेविकों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ा और बुरी तरह से मात खाने के बाद बोलशेविक पार्टी के तमाम नेता विदेश भाग गये और वहीं से सशस्त्र क्रांति की तैयारी करते रहे। अपनी तैयारी पूरी करने के बाद 1917 में बोलशेविकों ने फिर संघर्ष छेड़ दिया और इस बार अपने मकसद में ये लोग कामयाब रहे। लेनिन के नेतृत्व में इनका रूस पर पूरी तरह से कब्जा हो गया। संघर्ष की इसी शैली को चीन में माओत्से तुंग ने अपनाया, फर्क सिर्फ इतना था कि तुंग ने अपने हरावल दस्ते में मजदूरों के बजाय किसानों की अहम भूमिका पर जोर दिया। उसने किसानों को हथियारबंद करके अपनी लड़ाई छेड़ी और कामयाब रहा। वह कहा करता था, ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’ विचारधारा, लक्ष्य और कार्यशैली को लेकर भारत का नक्सलवाद बोलशेविकों और माओवादियों के बिल्कुल करीब हैं। नक्सली भी हथियार के बल पर भारत की डेमोक्रेसी को उलटने पर आमादा हैं।
भारत में नक्सलवादी धारा की शुरुआत
भारत में नक्सलवादी धारा की शुरुआत 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में बिखराव के साथ शुरू हुआ है, जैसा कि रूस में बोलशेविकों और मेंशेविकों के बंटवारे के साथ शुरू हुआ था।  कुछ मसलों पर मतभेदों को लेकर यह पार्टी दो भागों में बंटा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी -लेनिनवादी) अस्तित्व में आई। शुरुआती दौर में इसका केंद्र पश्चिम बंगाल रहा लेकिन धीरे-धीरे छत्तीसगढ़, ओड़िसा और आंध्र प्रदेश में इसने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। इस दौरान भूमिगत संगठन के तौर पर कम्युस्टि पार्टी आॅफ इंडिया (माओवोदी) सक्रिय हुई, जिसका नेतृत्व कानू सान्याल के हाथ में था। कानू सान्याल मुख्य रूप से स्थानीय अधिकारियों और भारतीय कॉरपोरेट के शोषण के खिलाफ जनजातीय लोगों और  छोटे किसानों को संगठित करता रहा। उसकी नीयत बंदूक के बल पर सत्ता पलट की थी। चारू मजूमदार नक्सलवादी धारा को जंगल और ग्रामीण हलकों से निकाल कर कॉलेजों और हाई सोसाइटी के लोगों के बीच एक फैशन के रूप में पहुंचाने में कामयाब रहा। यहां तक कि कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज और दिल्ली का सेंट स्टीफेंस कालेज भी नक्सलवादी छात्रों के गढ़ के रूप में तब्दील हो गये। बाद में मजूमदार की गिरफ्तारी और संगठन के अंदर आंतरिक मतभेद की  वजह से नक्सली मुख्तलफ संगठन बनाकर एक-दूसरे को ही शिकार बनाने लगे। इसके बावजूद यह तल्ख सच्चाई है कि नक्सली अपने मकसद को लेकर लगातार सक्रिय रहे।
लिबरेटेड जोन की व्यवस्था
कभी बम और देसी कट्टों के सहारे अपने आंदोलन को चलाने वाले नक्सली आज एके 47 जैसे अति आधुनिक हथियारों से लैस हैं। इसके अलावा इन्हें गुरिल्ला युद्ध पद्धति का प्रशक्षिण भी दिया जा रहा है। बड़ी संख्या में महिलाएं भी यह प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं। कई राज्यों के बहुत बड़े भू-भाग में इन लोगों ने ‘लिबरेटेड जोन’ की स्थापना कर ली है और इनका मकसद 2050 तक भारत में लाल झंडा लहराने का है। फिलहाल नक्सलियों ने अपने ‘लिबरेटेड जोन’ में पूरी तरह से अपनी व्यवस्था स्थापित कर ली है। लोग अपनी समस्याओं को लेकर कोर्ट-कचहरी में जाने के बजाय नक्सलियों के पास जाना ज्यादा बेहतर समझते हैं, क्योंकि नक्सली किसी भी मसले को लेकर त्वरित गति से कार्रवाई करते हैं। ऐसे में नक्सलियों को महज आतंकी करार देकर उनका सफाया नहीं किया जा सकता है। जानकारी के मुताबिक नक्सलियों की बढ़ती ताकत को देखते हुये कई सूबों के मुख्यमंत्री भी सीधे तौर पर नक्सलियों से उलझने की हिम्मत नहीं जुटा  पा रहे हैं। इतना ही नहीं, डेमोक्रेसी का दम भरने वाले कई बड़े नेता भी संसद या विधानसभा में जाने के लिए नक्सलियों की मदद लेने से नहीं हिचकते हैं। इसके एवज में नक्सली क्या लाभ उठाते हैं, इसे सहजता से समझा जा सकता है। केंद्र सरकार अभी तक मुख्य रूप से नक्सलियों को उन इलाकों से खदेड़ने की कोशिश करती रही है, जहां पर प्राकृतिक संसांधनों की भरमार है ताकि मल्टीनेशनल कंपनियां इन प्राकृतिक संसाधनों का खुलकर दोहन कर सके। नक्सलवाद पर गंभीर चिंता जताने के बावजूद व्यावहारिक तौर पर फिलहाल इस समस्या के निदान का कोई ठोस रास्ता सरकार के पास नहीं दिख रहा है। जब नक्सली कोई बड़ा हमला करते हैं तो खूब हो-हल्ला मचता है लेकिन जल्द ही सबकुछ भुला दिया जाता है।
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