मिड डे मिल: भूख से मौत का निवाला बन गये मासूम

अनिता गौतम,

धर्मासती गंडामन गांव के तकरीबन दो दर्जन बच्चों की अकाल मौत और उनके परिजनों की चीत्कार आम इंसान के रूह को कंपा दे रही है। इसी में राजनेताओं की बयान बाजी और अपना दामन बचाने के तरीके से हतप्रभ है वहां के स्थानीय नागरिक। सबका कलेजा मुंह को आ रहा कि आखिर कौन है इस तरह की घटना के लिए जिम्मेवार। क्या चंद रोटी के टुकड़ों के लिए उनके बच्चे काल के गाल में समा गये। शिक्षा और रोटी तो एक दूसरे का पर्याय है पर क्या रोटी इतनी बड़ी त्रासदी भी बन सकती है। न बीमारी, न कोई महामारी और न ही किसी तरह की प्राकृतिक आपदा फिर इतने मौतों का जिम्मेवार कौन?

ज्ञातव्य हो कि विगत मंगलवार यानि 16 जुलाई को छपरा, बिहार के सारन जिले में एक प्राइमरी स्कूल में मिड-डे मील खाने से आधिकारिक रूप से 22 बच्चों की मौत हो गई। तकरीबन 80 से ज्यादा बच्चे स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराये गये थे जिनमें से 31 बच्चों को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रेफर किया गया। जिनमें से बहुतों की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।

जर्जर भवन में चलने वाले विद्यालय जहां ठीक से बच्चों के बैठने के लिए स्थान नहीं है, फिर इसे समझना मुश्किल नहीं कि मिड डे मिल के लिए जो जगह निर्धारित होगी वह कितनी साफ सुथरी और रखरखाव भरी होगी। जाहिर है कहीं खुले आसमान तो कहीं तंग गलियों में मध्याह्न भोजन तैयार होता है। मिड डे मील में छिपकिली, काकरोच और बरसाती कीड़ें का बहाना बना कर पहले भी स्कूल प्रशासन इस तरह की घटनाओं में बीमार बच्चों की जिम्मेवारी से अपना पल्ला झाड़ता आया है। मिड डे मील के नाम पर घटिया भोजन परोसे जाने की शिकायतें बार बार और लागातार आती रहती हैं ,पर दुर्भाग्य वश उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता जब तक कि कोई बहुत बड़ी घटना न हो जाये।

मिड डे मिल के नाम पर जिस तरह से बच्चें जमा हो जाते वह भी शक के दायरे में आता है कि आखिर स्कूल रजिस्टर से ज्यादा बच्चे खाने के समय कैसे और क्यों पहुंच जाते।

प्रशासनिक अधिकारियों की माने तो सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए मध्याह्न भोजन का एक मेन्यू निर्धारित है पर न तो स्कूल प्रशासन को और न ही स्थानीय प्रशासन को इसकी फिक्र है कि स्कूलों में दिया जाने वाला भोजन कितना सही है। मिड डे मिल केंद्र सरकार की योजना है जिसे अमलीजामा पहनाने की जिम्मेवारी रारज्य सरकार की है पर रेटिंग में बिहार दूसरे राज्यों से हमेशा नीचे ही रहा है। कांग्रेस के एक राजनेता की बातों पर अगर यकीन करें तो केंद्र को समय समय पर इसकी मॉनिटरिंग कर के आगे की रणनीति तय करनी है, पर यदि इस तरह के दबाव का बिहार सरकार या फिर वैसे राज्य जहां कांग्रेस की सरकार नहीं है, इसका विरोध सिर्फ विरोध जताने के लिए करते हैं।

पर क्या सिर्फ इस भय से कि केंद्र और राज्य के बीच सामंजस्य बना रहे इस तरह भयाक्रांत करने वाली घटना को नजर अंदाज किया जा सकता है। साथ ही क्या इतने मासूमों की मौत की सफाई के तौर पर ग्राह्य है।

इस योजना की तह तक जायें तो इसमें कोई खामियां नहीं है, क्योंकि इसे बनाने के पीछे अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल तक लाना एवं साथ साथ रहने और खाने के नाम पर सामाजिक न्याय को कायम करना भी है। साथ ही खाने की गुणवत्ता भी निर्धारित है, जिसमें प्राथमिक कक्षा तक के बच्चों को खाद्य में पोषण भी उपलब्ध करवाना। इतने सुंदर और तरीके की योजना को महज राजनीति और घोटालों के लिए बर्बाद किया जा रहा है। सिर्फ अपनी जेबे भरने के लिए इसे बिना किसी जांच और सुधार रिपोर्ट के महज खाना पूर्ति के रूप में चलाया जा रहा है। न तो पोषण के नाम पर सही खाना दिया जाता और न ही कभी किसी जांच की जरूरत पर बल दिया जाता। पुरानी खबरों का हवाला दिया जाये तो बच्चों के भोजन में गड़बड़ी की शिकायतें कोई नई नहीं हैं अलबत्ता इसपर कभी कोई कार्रवाई की बात किसी ने नहीं सुनी।

स्थानीय नागरिकों एवं विद्यालय के शिक्षकों की बातों पर गौर किया जाये तो जिन पर इस योजना को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेवारी हैं उन्हों ने अपना पल्ला इसे ठेकेदारों के हवाले कर के झाड़ लिया है। और ठेकेदार अधिक से अधिक बचाने और कमीशन खोरी से त्रस्त होकर बच्चों को केवल चावल परोसते हैं। आलम यह रहा कि मध्याह्न भोजन में कीडे़ और छिपकिली मिलने की शिकायतें आम हो गई। छात्रों की मानें तो स्कूलों में मेन्यू के अनुसार भोजन कभी नहीं दिया जाता। ज्यादातर तो खिचड़ी ही दी जाती। इसे सीधे समझा जा सकता कि सिर्फ खिचड़ी बच्चों को कुपोषण से कैसे बचा सकता। इसकी शिकायत करने पर बच्चों को डाट-डपट कर मामले को दबाने की कोशिश की जाती है। भयभीत बच्चे चुपचाप खाना ग्रहण करते और इस लापरवाही का आलम यह है कि आज एक ही इलाके के 22 से भी ज्यादा मासूम स्वयं मौत का निवाला बन गये।

कई स्कूलों में तो मिड डे मील के नाम पर बस औपचारिकता हो रही। इस पूरी योजना को केन्द्र और राज्य सरकार के माध्यम से अपनी जेबे भरने का जरिया बताया जा रहा। बात सही भी लगती क्योंकि अकसर स्कूल मेन्यू के हिसाब से भोजन नहीं मिलने के बावजूद बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए घटिया भोजन खाने को विवश हैं।

शिक्षा के बहाने बच्चों का पेट भर जाये इस उम्मीद में स्थानीय जनता अपने बच्चों को विद्यालय की राह दिखा रहे हैं, पर दुर्भाग्य वश इस योजना की सफलता का जिम्मा लेने वालों की कतार खड़ी है पर मासूमों की मौत पर जिम्मेवारी लेने की बजाय अनावश्यक बयानवाजी कर ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने की कवायद चल रही है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश तो दे दिए हैं पर घटना स्थल पर जाने की जरूरत नहीं समझी। जबकि पिछले सप्ताह बोध गया ब्लास्ट के बाद आनन फानन में उन्हों ने घटना स्थल का दौरा किया था। राजद नेताओं सहित दूसरे पक्ष विपक्ष के नेताओं की बयानबाजी ने पीड़ितों की तकलीफ को ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश सहित देश को चौंका दिया है। घटना से सैकड़ों लोगों की नाराजगी जायज है पर राजनेताओं की गंदी राजनीति उनकी उटपटांग बयानबाजी लोगों के गले नहीं उतर रही है।

बहरहाल हर हाल में बच्चों को पौष्टिक भोजन देने, घटिया भोजन परोसे जाने की शिकायत पर कार्रवाई करने, पूरे प्लान की रूपरेखा तय करने एवं बच्चों को खिलाए जाने वाले भोजन पर विद्यालय शिक्षा समिति की नजर रखने की बात पूरी तरह बेमानी साबित हो चुकी है। स्तरहीन और घटिया भोजन वैसे भी बच्चों के लिए जहर साबित हो रहा था पर इस मर्माहत करने वाली घटना ने तो सारी हंदे पार कर मासूमों को ही अपना निवाला बना लिया।

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4 Responses to मिड डे मिल: भूख से मौत का निवाला बन गये मासूम

  1. Chand Ahmad says:

    Yeh sab dekhke, padhke ek baat to tay ho gayi hai ki paise ki hawas ne zindagi ko leel liya hai, jo bhi zimmedaar hai, wo itna neeche gir chuka hai ki kewal aur kewal zameen men dhans sakta hai lekin kuchh bhi karke ooper nahin uth sakta. Dil ko dukha denewaali bahut hi hridayavidaarak ghatna.

  2. Baidynath says:

    http://naukarshahi.in/archives/7671
    same reoprt ,
    chori karne ka pura pryas

  3. Anita Gautam says:

    बैद्यनाथ जी, अगर आप इतने उतावले न होते कमेंट करने को तो फिर एक बार लेखक का नाम पढ़ लिया होता। दोनों जगह की रिपोर्ट मेरी (अनिता गौतम) ही है। फिर कहां की चोरी और कैसी चोरी ?
    वैसे आपने रिपोर्ट को इतनी तल्लीनता से पढ़ा इसके लिए आभारी हैं ।

  4. neha says:

    Bhut hi dukhad ghatnaa hai ye.
    Kyaa bit rhii hogii unn ma- baap pe jinke bachho ko mid day meal ne leel liya…..
    Is ghatna k baad desh k hr jagah se hi aesi gahtna sunne ko mill rhi hai… khi khane me chipkali , to insects mil rhe h…

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