‘पोर्न’ के सामने बेबस सरकार

एक ओर केंद्र सरकार सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के लिए कमर कस रही है, वहीं दूसरी ओर पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाने में खुद को अक्षम मान रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि तकनीकी और कानूनी पेचीदगियों की वजह से भारत में पोर्न साइट्स पर रोक लगाना संभव नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार के पास पोर्न साइट्स को लेकर कोई ठोस साइबर पॉलिसी नहीं है, जबकि मुल्क में बहुत बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चे पोर्न साइट्स की चपेट में आ रहे हैं। दुनिया के मुख्तलफ मुल्कों में पोर्न साइट्स को लेकर न सिर्फ वहां की सरकारें बल्कि आम जनता भी काफी संजीदगी दिखा रही है। तकनीकी क्रांति के साथ ही आधुनिक समाज के सामने पोर्न साइट एक बहुत बड़ा खतरा बन कर उभरा है। बच्चों के मानसिक विकास को अवरुद्ध करते हुये पोर्न साइट के संचालक करोड़ों की कमाई करने में लगे हुये हैं। ऐसे में केंद्र सरकार पोर्न साइट्स पर रोकथाम को लेकर जिस तरह से हाथ खड़े कर रही है, वह निस्संदेह चिंता का विषय है।
संतुष्ट नहीं मुख्य न्यायाधीश कबीर
एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अगुआई में गठित एक बेंच के समक्ष केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुये कहा है कि ज्यादातर पोर्न साइट्स का संचालन विदेशों से होता है और सरकार के पास उनके सर्वर की जानकारी नहीं होती है। दूसरे मुल्कों से संचालित होने की वजह से वह भारतीय कानून के दायरे से भी बाहर हैं, इसलिए उन पर रोक लगाना मुमकिन नहीं है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर इंदिरा जयसिंह की इस दलील से मुतमइन नहीं दिखे। उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि इस मसले को गंभीरता से ले। संबंधित विभागों से बात करें और पोर्न साइट्स को रोकने के लिए कोई कारगर मैकेनिज्म ईजाद करें। इस संबंध में केंद्र सरकार को सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस मसले को कितनी गंभीरता से लेती है।
विकृत होती बच्चों की मानसिकता
जनहित याचिका में यह कहा गया था कि पोर्न वीडियो को लेकर कोई ठोस कानून न होने की वजह से इसका कारोबार भारत में धड़ल्ले से चल रहा है। तकरीबन 20 करोड़ पोर्न वीडियो और क्लीपिंग बाजार में मौजूद है और हर रोज इसमें इजाफा हो रहा है। जिस तरह सहजता से सेक्सुअल कंटेंट्स तक बच्चों की पहुंच हो चुकी है, वह पहले नहीं थी। कम उम्र में उनके सामने सेक्स को विकृत रूप में परोसा जा रहा है, जिसकी वजह से उनका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा है। लगातार पोर्न देखने वाले बच्चों की सेक्सुअल अपराध में संलग्नता बढ़ती जा रही है। इस तरह के बच्चे समाज और व्यवस्था के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। इस भयावह तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि पोर्न फिल्मों की चपेट में न सिर्फ उच्च व मध्यम वर्ग के बच्चे आ रहे हैं बल्कि मुल्क के मुख्तलफ शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में पोर्न वीडियो ने अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। इसकी वजह से कम उम्र में ये बच्चे कई तरह की सेक्सुअल मनोविकृतियों के शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि रेप जैसे घृणित वारदातों को भी अंजाम देने से नहीं हिचक रहे हैं। स्वस्थ समाज के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बच्चों का निर्माण जरूरी है। पोर्न की दुनिया स्वस्थ समाज का निर्माण करने में बहुत बड़ी बाधा साबित हो रही है।
संवेगी विकास पर असर
भारतीय मनीषियों ने सेक्स को संपूर्णता के साथ काफी कलात्मक तरीके से लिया है। यहां पर काम कला पर गंभीर चिंतन करते हुये उसे व्यावहारिक रूप में ढाला गया है। पोर्न की दुनिया इस धारा को पूरी तरह से तहस-नहस कर रही है। तकनीकी क्रांति की वजह से मोबाइल और इंटरनेट सहजता से लोगों तक पहुंच गये हैं और इसके साथ ही पोर्न कारोबार का विस्तार भी हो रहा है। स्कूलों और कालेजों में भी बच्चे धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल करते हुये पोर्न साइट्स पर दस्तक दे रहे हैं। सेक्स की कलात्मकता से महरूम ये बच्चे फैंटेसी की उस दुनिया में सैर करने लगे हैं, जहां सेक्स का एक मात्र मतलब वीभत्स तरीके से शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करना होता है। रूमानियत के अहसास से दूर इन बच्चों का संवेगी विकास भी बुरी तरह से अवरुद्ध हो रहा है। हाल में किये गये एक सर्वे से इस बात खुलासा हुआ है। बड़ी संख्या में होस्टलों में रहने वाली लड़कियां सामूहिक रूप से इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुये पोर्न फिल्में देख रही हैं।  इससे न सिर्फ उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि जेहनी तौर पर भी वे ‘प्री मैच्योर’ सेक्सुअल गतिविधियों की ओर प्रवृत भी हो रही हैं, जिसकी वजह से उनकी और उनके परिवार वालों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। पिछले कुछ अरसे से कम उम्र की लड़कियों के एबॉर्शन के मामलों में भी इजाफा हुआ है।
चैट बॉक्स का इस्तेमाल
सेक्सुअल संतुष्टि के लिए बहुत बड़ी संख्या में कम उम्र के बच्चे सोशल साइट्स पर चैट बॉक्स का भी इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं। फर्जी एकाउंड बना कर अपनी पहचान छुपाते हुये अजनबियों के साथ बिना किसी डर भय के ये पूरी तरह से खुलकर पेश आ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों की नजर में ऐसे बच्चे भी जेहनी तौर पर बीमार होते जा रहे हैं। लगातार सेक्स चैट करने की वजह से कम उम्र में ये ‘इनसोमेनिया’ के शिकार हो रहे हैं। इनकी सामाजिक गतिविधियां भी खत्म सी होती जा रही है। नेट की आभासी दुनिया को ही हकीकत समझने की लत इनमें बढ़ती जा रही है।
जिम्मेदारी से भाग रही सरकार
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड ने मानव मस्तिष्क को तीन भागों में विभाजित किया था, चेतन, अचेतन और अर्द्ध चेतन। उसका कहना था कि व्यक्ति के दिमाग का नब्बे फीसदी हिस्सा अचेतन में होता है, जिसमें सिर्फ और सिर्फ सेक्स भरा होता है। व्यक्ति के चेतन और अर्द्ध चेतन में किये गये तमाम कार्य नब्बे फीसदी अचेतन से ही प्रभावित होते हैं। दुनिया के तमाम धर्म और कानून का उद्देश्य इसी नब्बे फीसदी हिस्से को नियंत्रित और निर्देशित करना है ताकि समाज के स्थापित मूल्यों की रक्षा की जा सके। यदि फ्रायड की इस थ्योरी पर यकीन किया जाये तो कहा जा सकता है कि वर्तमान पोर्न की दुनिया दिमाग के इस नब्बे फीसदी हिस्से को और भी अधिक उद्वेलित कर रही है। यह समय से पहले ही बच्चों को जवान करने की मशीन साबित हो रही है। अब पूरी दुनिया इस मशीन के खिलाफ लामबंद हो रही है। यूरोपीय देशों में तो बच्चों को इंटरनेट पोर्न से बचाने के लिए विधिवत आंदोलन चलाया जा रहा है। अभिभावकों की भी इसके लिए आगाह किया जा रहा है और तकनीकी स्तर पर भी ऐसे साइट्स को जाम करने की लिए नित्य नए शोध करते हुये सॉफ्टवेयर तैयार किये जा रहे हैं। यहां तक की वहां की सरकारें भी इस नये खतरे को अच्छी तरह से महसूस कर रही है और खासकर बच्चों को पोर्न दुनिया से दूर रखने के लिए कुछ ठोस कदमें उठाने की कवायद कर रही हैं। ऐसे में भारत सरकार जिस तरह से अपनी जिम्मेदारियों भाग रही है, उसकी हर हाल में सिर्फ और सिर्फ आलोचना ही की जा सकती है। वैसे दिल्ली हाई कोर्ट ने फेसबुक से अपनी साइट के मुख्य पेज पर यह चेतावनी जारी करने के लिए कहा कि 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे यहां अपना खाता नहीं खोल सकते। फेसबुक इसके लिए सहमत भी हो गया है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह बच्चों फेसबुक अकाउंट खोलने से शायद ही रोक पाये क्योंकि बच्चे सेक्सुअल गतिविधियों के लिए फर्जी एकाउंट का इस्तेमाल करते हैं और उमसें उम्र सीमा भी अधिक बताते हैं।
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