दीवानगी की हद बन कर न रह जाये यह ‘फैशन’

अनिता गौतम,

जमाने के बदलते दौर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, पर इस बदलते दौर में एक चीज और बदली है, वह है फैशन। आज समय और परिस्थितियां इतनी परिवर्तित हुई हैं कि इन बदलाव का सीधा और साफ असर युवाओं पर नजर आ रहा है। अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर यह कहा जाये कि न सिर्फ युवा बल्कि बच्चे भी इस फैशन से अछूते नहीं हैं। सीधे शब्दों में कहा जाय तो बच्चों का सामाजीकरण बाद में होता फैशन पहले अपनी जगह बना लेता है इनके जीवन में।

आज बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में फैशन के प्रति सजगता देखी और सिरे से महसूस की जा सकती। जिस तरह से संस्कार और सामाजीकरण के विस्तार पर जोर दिया जा रहा उसके अनुरूप परिणाम नहीं दिखते पर बढ़ते फैशन के क्रेज पर जितनी रोक लगाने की कोशिश होती वह उतना ही विस्तार पा रहा है। जिस तीव्रता से फैशन के प्रति लोगों में आकर्षण बढ़ा है और हर बात को फैशन के नाम पर सहजता से लेने का प्रयास होता वह निश्चित रूप से शुभ संकेत नहीं है।

फैशन अगर सिर्फ आकर्षक दिखना और सजना संवरना तक सुनिश्चित किया जाता तो यह कोई नई बात नहीं होती। खूबसूरत और सबों की नजर में आकर्षक दिखने का अधिकार हर किसी को है। साथ ही अगर हम पौराणिक कहानियों में भी जायें तो श्री कृष्ण से लेकर श्रीराम तक के व्यक्तित्व को सुंदर बनाने के लिये उनके वर्णन में परिधान से लेकर मोर मुकुट तक को काफी सहजता से लिया गया है। मतलब सीधा और बिल्कुल साफ है कि हर व्यक्ति के व्यक्तित्व के निखार का एक साधन फैशन भी है।

परन्तु फैशन के नाम पर, नये नये प्रयोग में आकर्षक दिखने की जुगत में युवा पीढ़ी बुरी तरह प्रभावित हुई है। हर तरफ इस अंधी दौड़ में आगे निकल जाने की होड़ लगी हुई है। फैशन के नाम पर गुमराह बच्चे आकर्षक कम हास्यास्पद ज्यादा बने दिखते। वैसे इन सबके पीछे युवाओं का आत्मविश्वास अवश्य चरम पर दिखता। क्योंकि हर बात को फैशन का जामा पहना देना और सामाजिक स्तर पर जायज करार देने की तकनीक इन युवाओं की सबसे बड़ी पूंजी है।
फैशन के प्रति लोगों में इतने बड़े स्तर पर दिखने वाले आकर्षण का मुख्य कारण टी.वी. चैनल के विज्ञापन, मनोरंजन चैनेलों पर प्रसारित होते धारावाहिक और फिल्मों में कहानी से ज्यादा फैशन को प्रमुखता से दिखाया जाना है। एक तरफ जहां महिलाओं में धारावाहिकों के पात्रों के परिधान और डिजाइनर के कपड़े चर्चा का केन्द्र बनते तो दूसरी तरफ युवाओं के बीच हर उस नई आने वाली फिल्मों में इस्तेमाल किये गये फैशनेबल कपड़ें से लेकर जूते या फिर कोई नई तकनीक के इलेक्ट्रोनिक आइटम चर्चा का केन्द्र बनते।

फैशन में वस्त्रों की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता, विज्ञापनों की तरह वस्त्रों की ओर भी ध्यान आकर्षित करने के लिये उनका बेजा इस्तेमाल ही होता। यूज एंड थ्रो के तर्ज पर वस्त्र डिजाइन किये जाते। शादी व्याह में दूल्हे की शेरवाणी से लेकर दुल्हन के लहंगे तक की ब्रांडिंग वह भी सिर्फ एक सीजन को ध्यान में रखकर। इस तरह मैचिंग और ब्रांडिंग के नाम पर एक लूट ही नजर आती है। फैशनेबल लुक में बालों का भी महत्वपूर्ण स्थान है पर इस पर भी अगर नजर डाली जाये तो सजे संवरे बाल अब कहीं नहीं दिखते और लंबी चोटी एवं खूबसूरत जूड़े तो जैसे इतिहास की बात हो गये हैं।

भारत जैसे गरीब देश में जहां गृहस्थी की प्राथमिकता न तय कर लोग अपनी आय का सर्वाधिक हिस्सा फैशन की चीजों और वस्त्रों की खरीद पर व्यय करते हैं। खास तौर से मध्यम वर्ग में इस फैशन की प्रवृति अधिक दिखती। यूं तो बदलाव औऱ फैशन शुरुआत से ही समय की मांग रही है, पर फैशन के नाम पर अनुसरण की प्रवृति घातक है। फैशन की जरूरतों और उसके वास्तविक अर्थ को समझने और समझाने की आवश्यकता है। आकर्षक दिखने की जरूरत पर बल दिये जाने चाहिये न कि अंधी दौड़ में सिर्फ देखा-देखी की आपाधापी में शामिल।

बहरहाल दूसरों का ध्यान और प्रशंसा आकर्षित करने की जुगत का ही दूसरा नाम अब फैशन बन गया है। अपनी योग्यता को छुपाने और सम्मान पाने का निर्रथक प्रयास भी है यह फैशन, पर कभी कभी लोग फैशन के नाम पर नकल करने के इस प्रयास में अपनी असली पहचान भी भुला बैठते हैं। ध्यान रहे कि सामाजिक स्तर पर तीन पीढ़ियां साथ-साथ चलती हैं, अत: फैशन के जूनून में इन तीन पीढ़ियों का मिश्रण अगर न दिखे तो फिर आलोचना तय है। समागम से निकला हुआ परिधान और श्रृंगार ही असली फैशन हो सकता है। यदि आज भी गांधी टोपी और जवाहर कट शेरवानी की याद लोगों के जेहन में है और समय के साथ यह उतनी ही मजबूती से खड़ा है तो निश्चित रूप से उच्च आदर्श भी एक फैशन है, और उसकी जरूरतों पर भी बल दिया जाना चाहिए। जाहिर है किसी को अपने समय की झलक दिखे वही वास्तविक फैशन है। अंधानुकरण की दौड़ में आत्मसम्मान पाने और आत्मविश्वास बढ़ाने की ललक भर न बन कर रह जाये यह फैशन

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