अंधविश्वास के खिलाफ जेहाद से मिली शहादत!

लंबे समय से अंधविश्वास के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर को पुणे में जिस तरह से सिर में चार गोलियां उतार कर खामोश किया गया है, वह सभ्य समाज के लिए चौंकाने वाला है। एक ओर दुनिया मंगल ग्रह पर बसेरा करने की तैयारी कर रही है तो दूसरी ओर अंधविश्वास को भी कायम रखने का जुनून उस पर हावी है। नरेंद्र दाभोलकर काला जादू और ताबीज के आधार पर लोगों को सहूलियत देने वाले तांत्रिकों के खिलाफ हल्ला बोले हुये थे। हर चीज को वैज्ञानिक नजरिये से टटोलने की वजह से समाज में अंधविश्वास को फैला कर अपना उल्लू सीधा करने वाले लोगों की ओर से उन्हें लगातार जान से मार देने की धमकियां मिल रही थीं। उनके शुभचिंतकों ने कई बार उन्हें पुलिस प्रोटेक्शन लेने की सलाह दी थी लेकिन पूरी तरह से गांधीवाद में यकीन करने वाले नरेंद्र दाभोलकर इसके लिए तैयार नहीं हुये। उनका मानना था कि पुलिस प्रोटेक्शन की वजह से लोगों से सीधे संवाद स्थापित करने में मुश्किलें पेश आएंगी। शायद उन्हें भी इस बात का अनुमान नहीं था कि अंधविश्वास के खिलाफ बिगुल फूंकने की कीमत उन्हें अपनी जान से चुकानी पड़ेगी। हालांकि अभी तक इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि उनकी हत्या किस मकसद से की गई है और हत्यारे कौन हैं, लेकिन उनकी जीनव शैली को देखते हुये यही अनुमान लगाया जा रहा है कि अंधविश्वाास के खिलाफ तीक्ष्ण तर्कों की वजह से ही उन्हें हलाक किया गया है।
हरफनमौला थे डॉ. नरेंद्र दाभोलकर
डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का जन्म एक नवंबर, 1945 को एक महाराष्टिÑयन परिवार में हुआ था। वह दस भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई स्वर्गीय देवदत्ता दाभोलकर एक शिक्षाविद और गांधीवादी थे। डॉ नरेंद्र दाभोलकर की प्रारंभिक शिक्षा न्यू इंग्लिश स्कूल सतारा में हुई थी। आगे की पढ़ाई के लिए विलियम कॉलेज सांगली में दाखिला लिया था। बाद में उन्होंने मिर्जा मेडिकल कॉलेज से विधिवत एमबीबीएस करने के बाद एक डाक्टर बन गये थे। खेल के मैदान में उनका कोई सानी नहीं था। वह शिवाजी यूनिवर्सिटी की कबड्डी टीम के कप्तान भी रह चुके थे। कबड्डी टूर्नामेंट में उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था। उन्हें कबड्डी के लिए महाराष्टÑ का शिव छत्रपति राज्य क्रीड़ा जीवन गौरव पुरस्कार से भी नवाजा गया था। करीब एक दशक तक डाक्टर के रूप में लोगों का इलाज करने के बाद वह 1980 में  सामाजिक कार्यकर्ता बन गये। इसके साथ ही उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ लोगों में जागृति फैलाना शुरू किया।  वह विधिवत अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सदस्य भी बन गये। वर्ष 1989 में उन्होंने महाराष्टÑ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना करके अंधविश्वास के खिलाफ जंग छेड़ दी। अंधविश्वास पर चौतरफा हमला बोलने के लिए उन्होंने एक साप्ताहिक पत्रिका साधना का भी प्रकाशन शुरूकिया और इसके संपादन की जिम्मेदारी खुद संभाली। इनके तीखे आलेखों से अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले ढोंगी बाबाओं और तांत्रिकों के साथ -साथ कुछ अतिवादी हिन्दू सगंठनों में भी खलबली मच गई। ये लोग इनकीजान के दुश्मन बन गये।
अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून को लेकर संघर्ष
डॉ. नरेंद्र दाभोलकर को पता था कि अंधविश्वास से लड़ने के लिए सिर्फ जन जागृति अभियान ही काफी नहीं है। वह विधिवत इसके लिए कानून चाहते थे ताकि अंधविश्वास फैलाकर लोगों को मूर्ख बनाने वाले लोगों को सलाखों के पीछे ढकेला जाये। दाभोलकर पिछले 40 सालों से अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून बनवाने के लिए प्रयासरत थे। उनका यह विधेयक महाराष्ट्र विधान परिषद में पेश भी हुआ, लेकिन इसे पुनर्विचार समिति के पास भेज दिया गया। इस विधेयक का विरोध अतिवादी हिन्दू संगठनों के साथ-साथ वरकारी सेक्ट के लोग भी कर रहे थे। इसके अलावा भाजपा और शिव सेना जैसी राजनीतिक पार्टियां भी इस विधेयक के खिलाफ थीं। इनका मानना था कि इस विधेयक का बुरा असर हिन्दू संस्कृति, रिवाज और परंपराओं पर पड़ेगा। तमाम विरोध के बावजू डॉ नरेंद्र दाभोलकर बेखौफ अपने अभियान में लगे हुये थे। हालांकि इस बात को भी वे अच्छी तरह से समझ रहे थे कि अंधविश्वास के खिलाफ जारी उनके अभियान से कुछ लोग खासे नाराज हैं। कुछ लोग उन्हें महात्मा गांधी की मौत की नींद सुलाने की धमकियां लगातार दे रहे थे, लेकिन वह इसे गंभीरता से नहीं ले रहे थे। उनका कहना था कि वह अपनी लड़ाई अहिंसक तरीके से लड़ रहे हैं, किसी को यदि विरोध है तो उनसे खुलकर बात कर सकता है। संवाद के आधार पर किसी समस्या के तार्किक निराकरण में उन्हें पक्का यकीन था। लेकिन उन्हें इस बात का भान नहीं था कि धमकी देने वाले लोग वाकई में उनकी हत्या कर देंगे। 20 अगस्त, 2013 को मार्निंग वॉक के दौरान जिस तरह से दो अज्ञात बंदूकधारियों ने पुणे में ओंमकारेश्वर मंदिर के पास काफी नजदीक से उनके सिर और छाती में चार गोलियां उतारी हैं, उससे यही पता चलता है कि उनकी मौत को लेकर वह पूरी तरह से आश्वस्त हो जाना चाहते थे।
आसान नहीं हत्यारों तक पहुंचना
डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को लेकर महाराष्टÑ में तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। इसके साथ ही सियासी तामपान भी गरमा गया है। ह्त्यारों की तत्काल गिरफ्तारी के साथ-साथ उन लोगों को भी बेनकाब करने की मांग हो रही है, जिन्होंने इस हत्या की साजिश रची है। लेकिन जिस तरह से हत्यारे अभी पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं, उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि यह मामला इतना आसान नहीं है। हत्यारों के संबंध में सूचना देने वालों के लिए महाराष्टÑ के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने 10 लाख रुपये इनाम की घोषणा की है। महाराष्टÑ में कांग्रेस-एनसीपी की मिली-जुली सरकार है। इन सियासी दलों से जुड़े नेता डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के लिए हिन्दू सगंठनों पर उंगलियां उठा रहे हैं। जबकि दाभोलकर के साथ काम करने वाले लोगों का कहना है कि वह बहुत जल्द ही महाराष्ट्र के दो बड़े बाबाओं के बारे में कुछ सनसनीखेज खुलासा करने वाले थे। हो सकता है कि इनकी हत्या की साजिश इन्हीं बाबाओं ने रची है। फिलहाल पुलिस ने एक प्रत्यक्षदर्शी के आधार पर दोनों हत्यारों का स्केच जारी किया है। इसके साथ ही पुलिस इस बात को स्वीकार कर रही है कि अभी तक हत्यारों तक पहुंचने की दिशा में कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लगा है।
बेकार नहीं जाएगी शहादत
देश के अन्य सूबों की तरह महाराष्टÑ में भी अंधविश्वास का बोलबाला है। लोग छोटी-छोटी समस्याओं के निराकरण के लिए बाबाओं और तांत्रिकों की शरण में जाना पसंद करते हैं। मुंबई और पुणे सहित महाराष्टÑ के मुखतलफ शहरों में किसी भी समस्या का शर्तिया समाधान करने वाले बाबाओं और तांत्रिकों के होर्डिंग चारों तरफ लगे हुये हैं। सरकार और पुलिस महकमा इन पोस्टरों की तरफ से पूरी तरह से आंख मूंदे हुये हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर इन्हीं बाबाओं और तांत्रिकों के खिलाफ जेहाद छेड़े हुये थे। उनकी हत्या के बाद से पूरे महाराष्टÑ में भूचाल आ गया है। अब लोग महाराष्टÑ में अंधविश्वास को पूरी तरह से दफनाने के लिए कमर कस रहे हैं। कहा जा रहा है कि डॉ नरेंद्र दाभोलकर की शहादत बेकार नहीं जाएगी, आने वाले दिनों में महाराष्टÑ में अंधविश्वास के खिलाफ जारी आंदोलन को और तेज किया जाएगा। इसके साथ ही डॉ नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर भी आंदोलन चलाने की योजना है। महाराष्टÑ बाबागीरी के चोखा धंधे के खिलाफ व्यापक लड़ाई की ओर कदम बढ़ा चुका है।
This entry was posted in पहला पन्ना. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>