वैश्विक आतंकवाद का कहर

केन्या की राजधानी नैरोबी में स्थित वेस्टगेट शॉपिंग मॉल की खौफनाक घटना से पूरी दुनिया सकते में है। भले ही इस घटना को अंजाम देने वाला सोमालिया का कट्टर इस्लामिक संगठन अल शबाब यह कह रहा है कि यह कार्रवाई सोमालिया में केन्या की फौज द्वारा उनके संगठन के लोगों की हलाकत में शिरकत करने की वजह से की गई है हो लेकिन हकीकत में यह वैश्विक हमला है। मॉल में मौजूद मुखतलफ देशों के धर्मावलंबियों को जिस तरह से चुन-चुनकर मारा गया है, उससे यह साफ हो जाता है कि हमलावरों का मकसद सिर्फ केन्या सरकार द्वारा सोमालिया में की जा रही फौजी कार्रवाई को लेकर उसे सबक सिखाना ही नहीं था। उनके टारगेट पर खासतौर से मगरबी मुल्कों के नागरिक थे। इस हमले में सात भारतीय लोगों के भी मारे जाने की खबर है। इन लोगों को मौत के घाट उतारने से पहले इस्लाम से संबंधित प्रश्न पूछे जा रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि इनका मकसद सिर्फ केन्या की सरकार सबक था सिखाना था तो फिर ये दूसरे मुल्कों को लोगों को खोज-खोज कर निशाना क्यों बना रहे थे? जो जानकारी नैरोबी से आ रही है, उससे यही लगता है कि हमलावरों में सिर्फ सोमालिया के  स्थानीय आतंकी ही नहीं शामिल थे, बल्कि 10-15 लोगों के इस ग्रुप में अमेरिका और अफगानिस्तान के प्रशिक्षित आतंकी भी थे। यह ग्रुप वैश्विक आतंकवादियों का था, जिसके निशाने पर पूरी दुनिया के नागरिक थे। इसलिए इस हमला को महज अफ्रीका की सरजमीन की समस्याओं से जोड़ कर देखना एक रणनीतिक भूल होगी। वैसे भी अल शबाब का संबंध अलकायदा से है, जो इस्लाम के नाम पर वैश्विक आतंकवाद का कारखाना है। वेस्टगेट शॉपिंग मॉल में एक ओर घातक हथियारों से लैस वैश्विक आतंकवादियों की टोली थी तो दूसरी ओर विभिन्न मुल्कों को निहत्थे लोग। चूंकि इस आॅपरेशन को नैरोबी में अंजाम दिया गया, इसलिए इसे सोमालिया में जारी रक्तपात से स्ट्रेटेजिकली जोड़ दिया गया।
अलकायदा का हाथ
नैरोबी स्थित वेस्टगेट शॉपिंग मॉल के साथ-साथ पाकिस्तान में पेशावर के चर्च को भी इस्लामिक आतंकियों द्वारा निशाना बनाया गया है। नैरोबी में जहां 68 लोग हलाक हुये, वहीं पेशावर में 75 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इन दोनों हमलों में गैर मुसलमानों को बड़ी क्रूरता के साथ मारा गया है। प्रारंभिक जानकारी से साफ पता चलता है कि इन दोनों वारदातों के तार अप्रत्यक्ष रूप से अलकायदा से जुड़े हुये हैं। वैश्विक आतंकवाद पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि इन हमलों की कमान अलकायदा के आला दर्जे के दहशतगर्दों के हाथ में थी। एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस्लामिक दहशतगर्दों ने एक साथ दुनिया के मुखतलफ हिस्सों में दो बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया है।  एक ओर अफगानिस्तान में तालिबानियों के खिलाफ नाटो के नेतृत्व में लंबी फौजी कार्रवाई चल रही है, वहीं दूसरी ओर सोमालिया में भी अल शबाब के खिलाफ जारी फौजी कार्रवाई को मगरबी देशों का समर्थन प्राप्त है। अलकायदा का नेटवर्क अफगानिस्तान के साथ-साथ केन्या में भी सक्रिय है। तालिबान के कई लड़ाके केन्या में भी अल शबाब की तरफ से लड़ रहे हैं। आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन की हलाकत के बाद अलकायदा ईसाइयों पर कहर बरपाने के लिए कमर कसे हुये है। पेशावर और नैरोबी की घटना को इसी रोशनी में देखा और समझा जा सकता है।
अल शबाब में विदेशी आतंकी
इन दिनों अल शबाब की कमान पूरी तरह से अलकायदा के हाथ में है। हालांकि अलकायदा से जुड़ाव को लेकर आरंभ में इस संगठन के अंदर विवाद भी हुये थे, लेकिन अंतत: अलकायदा इस पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहा। किसी समय इस संगठन के कब्जे में दक्षिणी सोमालिया का एक बहुत बड़ा भू-भाग था। इस संगठन में तकरीबन 14 हजार प्रशिक्षित आतंकी सक्रिय थे। सोमालिया की संघीय सरकार को यह संगठन गंभीर चुनौती दे रहा था। पश्चिमी देशों की सरकारें अल शबाब को एक आतंकी संगठन करार दे चुकी हैं और इसकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही है। अल शबाब में कई मुल्कों के आतंकी शामिल हैं, लेकिन इसका कमान खासतौर से अफगानिस्तान और इराक के प्रशिक्षित आतंकियों के हाथ में है। इस संगठन में लड़ने के लिए सोमालिया के स्थानीय नागरिकों को भी जबरदस्ती भर्ती किया जाता रहा है। सोमालिया में व्याप्त गरीबी और बेरोजगारी की वजह से भी लोग सहजता से इस संगठन की ओर आकर्षित होते रहे हैं। फिलहाल कई विदेशी इस आतंकी संगठन में अहम ओहदों पर काबिज है। स्थानीय सोमाली आतंकियों को आत्मघाती दस्तों में तब्दील करने का श्रेय इन्हीं आतंकियों को जाता है। यूएन ने अपनी रपट में इस बात की तस्दीक की थी कि ईरान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, यमन, लीबिया और मिस्र के कई खतरनाक आतंकी अल शबाब में अहम किरदार निभा रहे हैं। इतना ही नहीं, इस संगठन ने पश्चिमी देशों के आतंकियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। जेहाद के नारे से प्रेरित होकर बड़ी संख्या में पश्चिमी देश इस आतंकी संगठन से जुड़ गये हैं। यही वजह है कि अलकायदा के इस विंग को दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी विंग माना जा रहा है। नैरोबी की घटना इसका एक नजीर है। एक खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 में अल शबाब में तकरीबन 300 विदेशी आतंकी सक्रिय थे। खुद को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए अल शबाब ने सोमालिया के आपराधिक संगठनों पर भी नियंत्रण कर रखा है। यहां तक कि सोमालिया के समुद्री डकैतों से वसूली करने से भी ये बाज नहीं आते हैं। मनमाफिक रकम न देने पर ये लोग सोमालिाई समुद्री डकैतों के सरगनाओं का अपहरण भी करते रहे हैं। अमेरिका ने स्वीकार किया है कि अल शबाब और अलकायदा वैश्विक खतरा हैं। घन उगाही के लिए ये लोग अधिकारियों और अंतरराष्टÑीय संगठनों के लिए काम करने वाले राहतकर्मियों का भी अपहरण करते रहे हैं।
क्रूर होने की जरूरत
बहरहाल चार दिन के जद्दोजहद के बाद वेस्टगेट शॉपिंग मॉल को इस्लामिक आतंकियों से मुक्त करा लिया गया है। सुलक्षा बलों के हाथों पांच आतंकियों के मारे जाने की खबर है। इसके अलावा संदिग्ध 11 लोगों को हिरासत में लिया गया है। सवाल है क्या नैरोबी इस हादसे को भुला पाएगा और क्या इस तरह की घटना दुनिया के किसी अन्य कोने में नहीं घटेगी? जिस तरह से इस्लामिक आतंकवाद पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिए हुये है, उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि इस तरह के दावे कोई नहीं कर सकता। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आज भी आतंकवाद के कारखानों में मुस्लिम नौजवानों को जेहाद के सबक पढ़ाये जा रहे हैं। मगरबी मुल्कों के अलावा रूस और चीन में भी जेहादी मानसिकता से ओत-प्रोत संगठनों ने पैर पसार रखा है। अफ्रीकी मुल्कों में भी जेहाद को जारी रखने के लिए जी-तोड़ कोशिश में लगे हुये हैं। ऐसे में यह निहायत ही जरूरी है कि कट्टरवादियों पर चौतरफा हमला किया जाये और साथ में उन परिस्थितियों को भी दूर करने की ईमानदार कोशिश की जाये, जो आतंकवाद का पोषण करती हैं। आतंकवाद के खिलाफ जारी जंग और व्यवस्थित करने की जरूरत है, ताकि इसका खात्मा किया जा सके। इतना तो तय है कि आतंकी कार्रवाइयों पर रोक शांतिगान से नहीं लगेगी। जेहादी मानसिकता वाले आतंकी आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं, चाहे मुंबई पर हमला हो या लंदन पर, या फिर नैरोबी पर, हर जगह आतंकी आम नागरिकों के साथ बड़ी बेरहमी से पेश आ रहे हैं। ऐसे में इनके खिलाफ भी पूरी क्रूरता बरतने की जरूरत है। नहीं तो आतंकी बेखौफ खून की होली खेलते रहेंगे।
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