बहुत ही भयावह है लोकतंत्र की असली तस्वीर

-39 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे

-नेता और वीआईपी सालाना 50 से 60 करोड़ रुपया मिनरल वाटर पर खर्च करते हैं

 

आशुतोष कुमार पांडे, तेवरआनलाइन

राजनीति ने नेताओं को आम लोगों से कितना दूर कर दिया है। इसकी बानगी है नेताओं की संपति में हो रही  बृद्दि। आर्थिक असमानता का जहर समाज में इस कदर बढ़ गया है कि इंसान भी कई कटेगरी में बंट गया है। हाल में एक गैरसरकारी संगठन की आई रिपोर्ट इस बात को स्पष्ट दर्शा रही है।

आंकड़ों के मुताबीक भारत प्रति व्यक्ति आय 38,084 रुपये है। जबकि देश में सात करोड़ आबादी औसतन बीस रुपये में अपना जीवन बसर करती है।

पिछली लोकसभा में चुनकर गये सांसदों की संपति में गत पांच सालों में 100 से 227 परसेंट की बृद्दि हुई। जबकि आम लोगों को मंहगाई ने मार डाला। देश में आज भी 39 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन बसर करते हैं। जबकि साठ करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। देश के नेता और वीआईपी सालाना 50 से 60 करोड़ रुपया मिनरल वाटर पर खर्च करते हैं वहीं साठ करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। बुंदेलखंड देश का एक ऐसा इलाका है जहां मिट्टी के गागर की कीमत खसम से ज्यादा होती है..क्योंकि वहां पानी की किल्लत है…और जो मिल गया वह अमृत से कम नहीं।

गैर सरकारी संस्था द्वारा कुछ ही दिन पहले आए इस

आंकड़े ने यह साफ बता दिया है कि देश की 60 परसेंट से ज्यादा आबादी अपना जीवन अभाव में बीता रही है। देश में शिक्षा को बढ़ावा देने वाली योजनाओं पर अरबों रुपये खर्च होते हैं लेकिन आज भी 35 करोड़ आबादी प्राथमिक शिक्षा से वंचित है । जबकि बारह करोड़ लोग जिसमें नेता अधिकारी और वीआईपी शामिल हैं शिक्षा पर सलाना औसतन 12 लाख रुपये खर्च करते हैं। एक तरफ जहां 62 करोड़ लोगों के पास अपना घर नहीं है वहीं सात करोड़ लोगों के पास एक से ज्यादा घर है। शहरों की रंगीन रौशनियों को विकास का पैमान मानने वाले नेताओं को पता नहीं कि 20 करोड़ लोग शहरों में फुटपाथ पर सोते हैं। जबकि 1.25 करोड़ लोग होटल में रहना पसंद करते हैं। आज भी 15 करोड़ लोगों की जिंदगी मुआवजों पर टिकी है। यहां 30 करोड़ लोगों की सलाना आय 1.75 लाख रुपये है। देश में अरबपतियों की संख्या 24 है। जबकि 15 करोड़ लोग करोड़पति हैं। लोकतंत्र के पहरुओं को शायद लाल बती और हरे भरे लान के बाद कुछ नहीं दिखता..यदि दिखता तो यह आंकड़ा नहीं दिखता। क्योंकि किसी राज्य में विशेष मंत्री पद पाने और विभागों के आवंटन को लेकर कई दिनों तक विवाद होते रहता है..कि आखिर मलाईदार विभाग किसके हिस्से में जाएगा। राजनीति सेवा भाव और समाज,राज्य देश के विकास के लिए नहीं बल्कि पूरी तरह धंधे के रुप में इसे नेता ले रहे हैं। अपना बेटा अपनी बहु टिकट को लेकर मारामारी आखिर यह क्या है। आंकड़ों की सच्चाई तो यह कह रही है कि लोकतंत्र की असली तस्वीर बहुत ही भयावह है।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to बहुत ही भयावह है लोकतंत्र की असली तस्वीर

  1. Aman Soni says:

    isse khatte hai asli Ptrkaritta…..loktantra ki asli tasvir kafi darwni hai..lekhak aur editor ko badhi

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