क्या फिर साथ चल पाएंगे अन्ना-केजरीवाल ?

लोकसभा से लोकपाल बिल पास होने के बाद अनशन पर बैठे अन्ना हजारे की बांछे खिल गईं…..रालेगांव सिद्धि में मंच से अन्ना ने दोनों सदनों से लोकपाल बिल पास कराने के लिए सभी लोगों की बधाई दी ,लेकिन अरविंद केजरीवाल का नाम तक लेना मुनासिब नहीं समझा….इतना ही नहीं एक कदम आगे बढ़ कर अन्ना ने अरविंद केजरीवाल और आप पर हमला बोलते हुये कहा,लोगों को देश की सेवा करने के लिए कैमरे से दूर रहना चाहिए।

पिछले कई दिनों से अरविंद केजरीवाल लगातार खबरों में हैं….खासकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ी सफलता हासिल करने के बाद तो उनका कद और भी बढ़ गया है….अरविंद केजरीवाल लगातार देश सेवा की बात कर रहे हैं…और लोगों के साथ हर स्तर पर जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं…देश सेवा के लिए मीडिया से दूर रहने का बयान देकर अन्ना ने साफतौर पर अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा है…अरविंद केजरीवाल के तौर तरीकों को लेकर अन्ना की नाराजगी साफ झलक रही है…दोनों के बीच कोल्ड वार तो बहुत पहले से चल रहा था, लेकिन लोकपाल के मसले को लेकर दोनों अब खुलकर आमने सामने आते दिख रहे हैं…हालांकि अभी तक अरविंद केजरीवाल अन्ना को साफतौर पर कुछ भी कहने से बचते रहे हैं…लेकिन इसके साथ ही लोकपाल को जोकपाल करार देने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।

लोकपाल बिल को लोकसभा से पास होने और इस खबर को सुनकर अन्ना द्वारा खुशी जाहिर करने के कुछ देर बाद ही आम आदमी पार्टी ने भी हल्ला बोल दिया…हालांकि अन्ना का नाम साफतौर पर लेने से आम आदमी पार्टी भी बचती रही, लेकिन इस बिल को प्रभावहीन करार देकर आम आदमी पार्टी ने अन्ना के रंग में भंग डालने की पूरी कोशिश की।

प्रशांत भूषण ने तो यहां तक कहा कि  आम आदमी पार्टी की राजनीति में एंट्री के बाद से कांग्रेस और भाजपा में घबराहट थी । उनके सामने इमरजेंसी जैसे हालात थे, इसलिए उन्‍होंने प्रभावहीन लोकपाल बिल पास कर दिया।

एक तरफ अन्ना लोकपाल बिल के पास होने का जश्न मना रहे हैं तो दूसरी और अरविंद केजरीवाल की टीम उनके जश्न पर पानी फेरने की हर संभव कोशिश में है। कल मीडिया के सामने अरविंद केजरीवाल भले ही अन्ना को एक बार फिर अपना गुरु बताकर उन्हें ऊंच आसन पर बैठाने की कोशिश करते हुये नजर आये लेकिन जिस तरह से आम आदमी पार्टी लोकपाल बिल को प्रभावहीन करार दे रही है उससे यह स्पष्ट संदेश जा रहा है कि अब आम आदमी पार्टी अन्ना को भी प्रभावहीन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है । चूंकि अरविंद केजरीवाल अभी आम आदमी पार्टी के आर्बिट बने हुये हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि जो कुछ भी हो रहा है उसमें उनकी भी मर्जी शामिल है।

अन्ना और अरविंद केजरीवाल एक दूसरे पर जमकर शब्दों के वाण चलाते रहे हैं। लोकपाल को लेकर तो दोनों के बीच जमकर भिंड़त हो चुकी है। भले ही लोकपाल दोनों सदनों से पास हो गया हो लेकिन इस बिल के कारगर होने की संभवना पर दोनों के विचार जुदा हैं।

जब जनलोकपाल के नाम पर आंदोलन खड़ा करने वाले अन्ना हजारे लोकपाल बिल राजी हो गये थे तभी से अरविंद केजरीवाल को लगने लगा था कि अन्ना ने अपना पाला बदल लिया है। अरविंद केजरीवाल आज भी जन लोकपाल बिल को लेकर अड़े हुये हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ वो एक मजबूत कानून चाहते हैं ताकि ऊंचे से ऊंचे ओहदों पर बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति गलत तरीके से कमाई करने से डरे,जबकि लगता है कि लगातार आंदोलनों और धरना प्रदर्शनों से कोई नतीजा न  निकलने के बाद अन्ना हजारे का धैर्य जवाब देने लगा था।यही वजह है कि अन्ना हजारे सरकारी लोकपाल के पक्ष में झुकते चले गये। सरकारी लोकपाल बिल की मुखालफत करते हुये अरविंद केजरीवाल ने साफ तौर पर कहा था, इससे शेर तो छोड़िए चूहे तक जेल नहीं भेजे जा सकेंगे इस बिल पर हमला करके केजरीवाल ने अप्रत्यक्ष रूप से अन्ना पर भी हमला बोला था। चूंकि अन्ना तब तक सरकारी लोकपाल बिल के पक्ष में खड़े होते हुये नजर आ रहे थे। अन्ना के बदलते हुये तेवरों की हवा अरविंद केजरीवाल को पहले से ही लग गई थी। इसलिए अन्ना को लेकर अरविंद केजरीवाल अपनी रणनीति बना चुके थे। उन्होंने तय कर लिया था कि अन्ना पर खुलकर हमला करने के बजाय उस बिल पर हमला करना बेहतर होगा जिसका अन्ना समर्थन कर रहे हैं। हालांकि वो साफ तौर यह भी कह सकते थे कि अन्ना अपने पुराने रास्ते से भटक गये हैं …और जनलोकपाल आंदोलन के साथ गद्दारी कर रहे हैं….लेकिन उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुये महज इतना कहा कि लोकपाल से चूहा भी अंदर नहीं जा सकेगा।

अपने चेले की मंशा को समझते हुये अन्ना ने भी जवाब देने में देरी नहीं की। लोकपाल बिल पर हमला करने के बहाने केजरीवाल ने उनके सिद्धांतों और वजूद पर हमला किया था…इसका जवाब देते हुये अन्ना ने कहा था कि लोकपाल बिल काफी अच्छा है। चूहों को तो छोड़िए इस बिल से बड़े-बड़े शेर भी जेल के अंदर होंगे अब इस बिल का चूहों और शेर क्या असर होगा यहर तो भविष्य में ही पता चलेगा….फिलहाल केजरीवाल और अन्ना के बीच इस बिल के बहाने जारी जंग आगे भी रूप बदल कर जारी रहेगी…कम से कम अन्ना और केजरीवाल इस वक्त एक दूसरे को लेकर जो आक्रामक मुद्रा अख्तियार किये हुये हैं उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है।

अन्ना और अरविंद केजरीवाल के बीच टकराव की नींव उस दिन पड़ गई थी जब केजरीवाल ने केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाने की घोषणा की थी…उस वक्त भले ही दोनों ने एक दूसरे को इज्जत बख्शी हो, लेकिन एक दूसरे के खिलाफ दोनों ही धधकते रहे…समय के साथ तल्खियां और बढ़ती चली गई।

अन्ना आंदोलन की शुरुआत जन लोकपाल बिल को लेकर हुई थी…अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन के सूत्रधार बने हुये थे….जनलोकपाल आंदोलन कई चरणों में चला लेकिन केंद्र सरकार अन्ना के जनलोकपाल को लेकर पूरी तरह से नकारात्मक रवैया अख्तियार किये हुये थी…आंदोलन के दौरान ही कुछ कांग्रेसी नेताओं ने अन्ना आंदोलन से जुड़े नेताओं का मजाक उड़ाते हुये कहा था कि कानून संसंद में बनते हैं न कि सड़कों पर….यदि वाकई में जो लोग जनलोकपाल चाहते हैं तो उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए और संसद में आकर कानून बनाना चाहिए…इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने पार्टी बनाने की घोषणा कर दी…उस वक्त इस पार्टी का एक मात्र उद्देश्य था जनलोक पाल बिल को लेकर जनता के बीच अलख जगाना और राजनीति में दस्तक देना। जैसे ही अरविंद केजरीवाल ने राजनीति पार्टी बनाने की घोषणा की अन्ना बिदक गये….उन्होंने साफ कर दिया कि वो राजनीति में प्रवेश करने के मूड में नहीं है…यह उनका क्षेत्र नहीं है…..वो एक समाज सेवक है और समाज सेवा करते रहेंगे…यहां तक कि अरविंद केजरीवाल को भी उन्होंने अपने नाम का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टी में करने से साफ तौर पर मना कर दिया….इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल के सिर पर हमेशा रहने वाली मैं अन्ना हूं की टोपी बदल गई…अपने सिर पर आम आदमी की टोपी पहने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अगल राह पकड़ ली। अरविंद केजरीवाल उस वक्त भले ही अन्ना के आदेशों के आगे नतमस्तक हो गये लेकिन उनके मन में अन्ना का साथ छूटने का मलाल जरूर था। राजनीति में प्रवेश करने के बाद से ही अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें जुदा हो गई…और इसके साथ ही दोनों के बीच कोल्ड वार भी शुरु हो गया, हालांकि सार्वजनिक रूप से अरविंद केजरीवाल बार-बार अन्ना को अपना गुरु ही बताते रहे।

इस बीच अन्ना ने दबी जुबान से यह कहना शुरु कर दिया कि जनलोकपाल के लिए चलाए जाने वाले आंदोलन में फंड संचालन की जिम्मेदारी अरविंद केजरीवाल पर थी…उन्हें पता नहीं कि इस फंड का कैसे उपयोग किया गया…एक तरह से अन्ना अप्रत्यक्ष रूप से अरविंद केजरीवाल पर फंड का घालमेल करने का आरोप लगाते हुये नजर आये…चूंकि उस वक्त अरविंद केजरीवाल सियासत में दाखिल ही हुये थे…यह आरोप निश्चित रूप से उनके वजूद पर हमला जैसा था, फिर भी उन्होंने संतुलन बरकरार रखते हुए दलील दी कि अन्ना आंदोलन के फंड के संबंध में पूरी जानकारी वेब साइट पर मौजूद है…और जनता द्वारा एकत्र किया गया धन जो उनके पास पड़े हुये उसे लौटाने के लिए तैयार है। इस विवाद को लेकर दोनों के संबंध तेजी से बिगड़ रहे थे। इसी दौरान विदेशी फंड के मसले पर भी दबी जुबान से अन्ना टीम की ओर से बहुत कुछ कहा गया और अरविंद केजरीवाल बार-बार सफाई देते हुये नजर आये।

दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल अपने दमखम से उतरे..और आम आदमी पार्टी को एक बड़ी कामयाबी दिलाने में सफल हुये….इसके लिए अन्ना का आर्शिवाद भी मिला पर खुले मन से नहीं। यहीं तक कि जब अन्ना लोकपाल बिल को लेकर रालेगांव सिद्धि में अनशन पर बैठ गये और अरविंद केजरीवाल के वहां जाने की बात आई तो उन्होंने बड़ी बेरूखी से कहा कि उनके लिए अन्ना मंच पर कोई स्थान नहीं है…यदि चाहे तो लोगों के बीच में आकर बैठक सकते हैं….और फिर अरविंद केजरीवाल ने भी बीमारी का हवाला देते हुये रालेगांव सिद्धि की अपनी यात्रा टाल दी। मतलब साफ है कि दोनों एक दूसरे की मौजूदगी में खुद को सहज महसूस करने की स्थिति में नहीं है।

अन्ना और केजरीवाल के बीच जारी तनातनी का असर दोनों पर पड़ रहा है…भले ही सिद्धांतों के नाम पर अन्ना ने केजरीवाल से दूरी बना ली हो, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अन्ना के जन लोकपाल आंदोलन पर इसका जबरदस्त असर पड़ा है…अन्ना आज जन लोकपाल बिल को छोड़ कर सरकारी लोकपाल से संतुष्ट हो गये हैं…इसके पीछे एक मुख्य कारण अरविंद केजरीवाल और अन्ना के बीच बढ़ती दूरी रही है…अरविंद केजरीवाल के अलग राह पकड़ने से अन्ना की शक्ति भी कम हुई है…एक भीड़ जो अन्ना के इर्दगिर्द  रहकर व्यवस्थित तरीके से अन्ना के तमाम कार्यों को मैनेज करती थी वह दूर हो गई है…भले ही अन्ना इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न करें लेकिन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि अब अन्न कमजोर हो गये हैं….और समझौता परस्त भी…अब वो हुंकार भरने वाला अन्ना नहीं रहे….किसी लक्ष्य को पाने के लिए लंबे संघर्ष में उनका यकीन डगमगा सा गया है….और इसकी एक मुख्य वजह अरविंद केजरीवाल का उनसे दूर होना है।

ऐसा नहीं है कि अन्ना और केजरीवाल के अलग होने से नुकसान सिर्फ अन्ना को हुआ है….इस नुकसान में अरविंद केजरीवाल भी बराबर के भागीदार हैं….दिल्ली की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से काबित होते होते वो चूक गये….यदि अन्ना अरविंद केजरीवाल के साथ पूरी तरह से होते निश्चित रूप से आज दिल्ली में आप आदमी पार्टी की मजबूत सरकार होती…अन्ना के चाहने वालों और उन पर यकीन करने वालों की आज भी कमी नहीं है….अन्ना को विश्वास में लिया बिना जिस तरह से जिस तरह से अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की अचानक घोषणा कर दी थी, उससे कहीं न कहीं अरविंद केजरीवाल में अन्ना का विश्वास डगमगया था…समय के साथ शायद अरविंद केजरीवाल इस बात को समझ पाये कि अन्ना को खो कर उन्होंने क्या खोया है।

दिल्ली में सत्ता से थोड़ा सा के लिए चूकने के बाद अरविंद केजरीवाल की नजर अब निश्चिततौर पर लोकसभा चुनाव पर होगी….और यदि आम आदमी पार्टी अन्ना को साथ लेकर मैदान में उतरती है तो निश्चततौर पर इसका लाभ आम आदमी पार्टी को मिलेगा…अन्ना एक मकबूल फेस हैं…पूरा हिन्दुस्तान उन्हें जानता है और उन पर यकीन करता है…एक बेहतर संगठनकर्ता के रूप में अरविंद केजरीवान ने अपनी काबिलियत दिखा दी है…..ऐसे में यदि दोनों एक बार फिर से मिल जाते हैं तो निश्चततौर पर इसका दूरगामी प्रभाव हिन्दुस्तान की राजनीति पर पड़ेगा। लेकिन अहम सवाल यह है कि ऐसा होगा कैसे…..?

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