केजरीवाल: ईमानदारी की महत्वाकांक्षी परिभाषा!

अनिता गौतम,

भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल की भूमिका शुरू से ही संदिग्ध रही है। जन लोकपाल के सबसे बड़े चेहरे अन्ना हजारे को हाशिये पर धकेल कर जिस तरह से उन्होंने आम आदमी पार्टी का गठन किया था, उससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा स्पष्ट तौर पर दिखाई दे गयी थी।

पहले तो आम आदमी की पैरोकारी करने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार को मिटाने की हुंकार भरते रहे। फिर अल्पमत में होने के बावजूद उन्होंने दिल्ली की कुर्सी को जनता की जीत बता कर स्वीकार किया। एक मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना कितना सही था इसे लेकर आम आदमी वाकई भ्रम में रहा पर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा लोगों से छुपी नहीं रह सकी। अपनी इस दबी इच्छा को उन्होंने लोगों की इच्छा करार दिया और इसे अपने स्तर से नये आकार में ढालने की कोशिश की।

समय के साथ उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा उन पर इस कदर हावी हो गई कि उन्हें दिल्ली विधानसभा की नहीं दिल्ली लोकसभा की सत्ता दिखाई देने लगी। कांग्रेस और शीला सरकार को पानी पी-पीकर कोसने वाले अरविन्द केजरीवाल को अचानक सांप्रदायिक शक्तियां और भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा लगने लगा। राबर्ट वाड्रा की पोल खोलते खोलते इन्हें मुकेश अंबानी सबसे भ्रष्ट नजर आने लगे। इनके कार्यकलापों की अगर समीक्षा की जाये तो इनके अनुसार कांग्रेस का कब्जा सिर्फ दिल्ली विधान सभा पर ही था इसलिये दिल्ली को सरकार विहीन बनाने भर की इनकी जिम्मेवारी थी। अब आने वाले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का सीधा मुकाबला केन्द्र की सत्ता सीन सरकार से नहीं बल्कि उनके धुर विरोधी रहे भाजपा से है।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि दिल्ली की सियासत में आम आदमी पार्टी की धमक बढ़ी है। अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोक दी थी उसी तर्ज पर लोकसभा के चुनाव में भी वे निश्चित रूप से अपनी पूरी टीम को उतारेंगे।

बहरहाल इतना तो तय है कि लोगों का झुकाव आम आदमी पार्टी की ओर तेजी से बढ़ा है। उनके बढ़ते कद से कांग्रेस और भाजपा भी अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को गंभीरता से लेने लगी है। पर क्या केजरीवाल के इस तरह से रण-छोड़ पलायन की रणनीति को आम आदमी वाकई समझ पायेगा, देश में एक तबका जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से नाराज है और धीरे-धीरे अरविंद केजरीवाल के पीछे खड़े होने की कोशिश कर रहा है उसे महज जनलोकपाल के लिये दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी की कुर्बानी हजम होगी? जबकि उनकी तकलीफे अनंत हैं।

अनुभव की कमी झेल रहे अरविंद केजरीवाल की पार्टी में जोश और जज्बे की कोई कमी नहीं है पर पूरी टीम के परिपक्व होते होते कहीं सब कुछ बिखर न जाये

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