सियासी हुनर की कामयाब महिलायें

विनायक विजेता, वरिष्ठ पत्रकार।

बरसों पुराना जुमला है कि महिलाओं को खुद इस बात का इल्म नहीं होता कि उनमें कितनी ताकत है। और तो और, दुनिया भी इन दिनों उनके हाथ मजबूत करने की बात कर रही है। महिला सशक्तिकरण की गूंज देस-परदेस तक सुनाई दे रही है। कहावत भी है कि जहां महिलाएं खु रहती हैं, वही समाज आगे बढ़ने के ख्वाब देख सकता है। लेकिन देश की सियासत की कहानी कुछ और है। यहां महिलाओं को कम करके आंकना पुरुष नेताओं के लिए भारी पड़ सकता है। अतीत इस बात का गवाह रहा है और संभावनाएं इस बात के पर्याप्त संकेत दे रही हैं कि नेतागिरी के मामले में महिलाएं कभी कमजोर नहीं साबित होंगी। और ताकतवर होती जाएंगी। यूं कहा भी जाता है कि महिलाओं में गजब का संयम होता है और राजनीति में संयम से बढ़कर और क्या गुण चाहिए!
कोई केंद्र की राजनीति में इशारों से सरकार चलवाता रहा है, तो कोई अपने-अपने सूबों में बरसों पुराने किलों को ढहाकर कदम जमाने में कामयाब साबित हुआ है। ये पांच महिलाएं भले अलग-अलग राजनीतिक दलों से हों, लेकिन सियासी हुनर की बात होने पर सब एक से बढ़कर एक हैं।

सोनिया गांधीः नेतागिरी सिखाने वालीं नेता

त्याग की ताकत, राजनीतिक चतुरता, रणनीतिक क्षमता और दोस्त बनाने में महारत। अगर किसी एक शख्स में ये सारी काबिलियत तलाश रहे हैं, तो एक नजर यूपीए और कांग्रेस की बागडोर संभालने वालीं सोनिया गांधी पर जरूर डालनी होंगी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी की शुरुआत भले इटली में हुई, लेकिन जिस तरह से उन्होंने खुद को भारतीय परिवेश में ढाल लिया, वो काबिल-ए-तारीफ है। पीएम की कुर्सी भले मनमोहन सिंह ने दस साल संभाली हों, लेकिन इन दस साल का कोई दिन ऐसा नहीं गया होगा, जब सोनिया ने अपनी ताकत का अहसास न कराया हो। वो सरकार चलाना जानती हैं, उन्हें संगठन संभालना आता है, अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कला से वाकिफ हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि बीते कई साल से कांग्रेस का हर नेता उन्हें अपना नेता मानता है। लेकिन इस वक्‍त उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी है। उम्र ढल रही है, कमान राहुल के हाथ जा रही है और कांग्रेस में बुजुर्गों-नौजवानों के बीच मतभेद पैदा हो सकते हैं। सामने नरेंद्र मोदी का पहाड़ खड़ा है और आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर कोई खास उम्मीद नहीं है। ऐसे में उन्हें सारा जोर इस बात पर लगाना चाहिए कि अप्रैल से शुरू हो रहे महासमर में कांग्रेस के नुकसान को किस तरह कम से कम किया जा सकता है।

मायावतीः दलित वोट बैंक से सोशल इंजीनियरिंग

तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। एक वक्त था जब इसी नारे के दम पर बहुजन समाज पार्टी ने दलित वोटों का ऐसा ध्रुवीकरण बनाया कि पुराने कई खिलाड़ी का खेल डोल गया। फिर बारी आई सोशल इंजीनियरिंग की। ऐसा फॉर्मूला जिसने अगड़ी ज‌ा‌ति को भी मायावती के पीछे लाकर खड़ा कर दिया और एक बार फिर कई सूरमाओं के अरमान धरे के धरे रह गए। यह मायावती का जादू है, जो सिर चढ़कर बोलता है। उत्तर प्रदेश में विपक्ष की कुर्सियां संभाल रहीं मायावती इन दिनों लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी हैं और उनकी पार्टी से जुड़ी संभावनाएं भी अच्छी दिख रही हैं। वजह यह है कि बीते करीब दो साल से यूपी संभाल रही समाजवादी पार्टी के साथ इन दिनों आलोचना चल रही है। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद मायावती काम में जुट गई थीं। और अब वक्त आ गया इस बीच बनाई गई रणनीतियों को जमीनी स्तर पर अमली जामा पहनाया जाए। यह भी बड़ा सवाल बना हुआ है कि मायावती किसके साथ जाएंगी। भाजपा ने अब तक उनके खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार नहीं किया है, लेकिन मायावती, मोदी के नाम पर गुस्सा देख चुकी हैं। लेकिन राजनीति का कोई भरोसा नहीं है। चुनावी नतीजे बताएंगे कि हाथी कौन सी राह पकड़ता है। पर यह तय है कि लोकसभा सीटों का अपना कोटा पक्का करे बैठीं मायावती के दोनों हाथों में लड्डू दिख रहे हैं।

ममता बनर्जीः वाम दलों के पसीने छुड़ाने वालीं

देश का एक सूबा ऐसा है, जहां वामपंथियों ने एक या दो साल नहीं, बल्कि तीन दशक राज किया। विकास विरोधी नीतियों की तमाम आलोचनाओं के बावजूद वो हर बार चुनाव में खडे़ होते, लड़ते और जीत जाते। लेकिन इन तमाम साल एक महिला ऐसी थी, जो नतीजे के बारे में सोचे बिना जमीनी स्तर पर लगातार काम करती रही। और मेहनत का फल कई साल बाद मिला। यह ममता बनर्जी की जंग थी, जो उन्होंने अकेले लड़ी। और आज वो कितनी ताकतवर हैं, इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं है। पश्चिम बंगाल में उनकी गद्दी संभली हुई है और अब निशाना इस तरफ है कि राष्ट्रीय राजनीति में अपना कद कैसे बढ़ाया जाए। भाजपा उन पर डोरे डाल रही हैं, कांग्रेस उन्हें खुश करने की कोशिश में लगी है और अगर तीसरे मोर्चे में वामपंथी न होते, तो उसे ममता को अपने पाले में करने में जरा देर न लगती। दिल्ली में ताकत बनकर उभरे अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनावों के लिए झंडा बुलंद कर रहे हैं। वो लाख कोशिश कर चुके हैं कि अन्ना हजारे उनके साथ आ जाएं, जिनके आंदोलन पर उनका पूरा राजनीतिक करियर खड़ा हुआ है। लेकिन इस मामले में भी ममता बनर्जी उन्हें गच्चा दे गईं। अन्ना टीवी पर ममता के लिए वोट मांग रहे हैं और अल्पसंख्यक वोट का जुगाड़ करने के लिए जामा ‌मस्जिद के शाही इमाम बुखारी तैयार हैं।

जे. जय‌ललिताः अम्मा का हर दांव चौंकाने वाला

कई बरस पहले फिल्मी पर्दे पर चमकने वाली एक अभिनेत्री अब अम्मा कहलाती हैं। और उनकी सियासी चाल का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। राजनीतिक जानकार उम्मीद कर रहे थे कि जयललिता अपने दोस्त और भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का साथ देने के लिए तुरंत तैयार हो जाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने साफ कर दिया कि वह खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी बहुत पसंद करती हैं। एआईएडीएमके ने भी इस पर उनका पूरा साथ दिया। कुछ ही दिन बीते थे कि वह वाम दलों से जा मिलीं। तो ऐसा लगा कि भाजपा के साथ मिलने की सारी संभावनाएं खत्म हो गईं। हालांकि, यह कहा जाता रहा कि वह चुनावों के बाद भाजपा के पाले में जा सकती हैं। लेकिन उन्होंने एक बार फिर चौंकाया। तमिलनाडु की सारी सीटों पर उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया और वामपंथी दल हक्का-बक्का रह गए। यह रिश्ता टूट गया। और इस बार ममता बनर्जी ने चौंकाया। ममता ने कहा कि अगर जयललिता तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनती हैं, तो उन्हें उनकी पीएम दावेदारी पर कोई ऐतराज नहीं होगा। तमिलनाडु में डीएमके की हालत खराब है और जयललिता को लोकसभा चुनावों में बढ़िया सीटें मिलने की उम्मीद है। ऐसे में उन पर डोरे डोलने वालों की कमी नहीं रही। चुनाव बाद उन्हें चुनना है कि वह कहां जाना चाहती हैं। और स्थिति अच्छी रही, तो वो सौदेबाजी में माहिर रही हैं, ऐसे में घाटे का सौदा नहीं करेंगी।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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