मोदी – युग का शुभारंभ !

अनिता गौतम,

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं झुकने दूंगा, और अच्छे दिन की उम्मीदों के बीच भारत में पंद्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने देश की बागडोर संभाल ली है। नरेन्द्र मोदी पिछले दस सालों से सत्ता से दूर रही भारतीय जनता पार्टी को अपार जन समर्थन दिलाकर अपने बूते सरकार बनाने की ताकत दिलाने वाले विरोधी पार्टी के पहले नेता के रूप में इतिहास के पन्नों में शामिल हो गये हैं। इस तरह से एक कठोर प्रशासक और कड़े अनुशासन के साथ लोगों के बीच मोदी युग का आरंभ हो गया है।

मैं नरेन्द्र दामोदरदास मोदी . . . के उद्घोष के बीच मोदी का देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना और विभिन्न देशों के राजनेताओं के साथ ही अपने देश की हस्तियों की उपस्थिति ने इस ऐतिहासिक क्षण को न सिर्फ यादगार बना दिया बल्कि उनके आने वाले समय को चुनौतियों से भर दिया। तकरीबन चार हजार लोगों के बीच मोदी और उनके मंत्रिमंडल का राज्याभिषेक सही मायनों में ऐतिहासिक तब माना जयेगा जब यह जनता के अरमानों को भी पूरा करेगा।

17 सितंबर, 1950 को गुजरात के मेहसाणा ज़िले में जन्में नरेन्द्र मोदी देश में आजाद भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री बने हैं। देश की बागडोर संभालने से पहले वे गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मोदी के नेतृत्व में गुजरात में भारतीय जनता पार्टी न सिर्फ लंबे समय तक राज करती रही बल्कि गुजरात मॉडेल के रूप में देश के सामने विकास का एक मिशाल भी कायम किया।

अपने कार्यकलापों और कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़े रहने की वजह से आवाम के बीच उनकी छवि काफी सुलझी और अनुशासित है। स्वयं नरेन्द्र मोदी की ही माने तो कई सभाओं और रैलियों में सार्वजनिक मंच से उन्होंने यह घोषणा की है कि वे दृढ़ निश्चयी और आशावादी हैं। उनकी इन्ही सब बातों का देश की जनता पर काफी सकारात्मक असर हुआ। जाहिर है आम जन अपनी देश भक्ति की भावना और विकास की ललक को पूरी करने के लिये एक अनुशासित और समर्पित सिपाही के रूप में नरेन्द्र मोदी का चयन किया। इस चयन का आधार बना उन्हें मिला अपार जन समर्थन और बाद में वोट में तब्दील होता संख्या बल।

वाक कला में माहिर नरेन्द्र मोदी की छवि अनुभवी और अनुशासित प्रशासक की है, साथ ही उनकी मृदुलता और संवेदना को भी लोगों ने अनुभव किया है। संसद भवन के दरवाजे पर माथा टेकने से लेकर अपने आंसुओं पर काबू न पाने की कोशिश उनकी विनम्रता को दर्शा गयी है। भारतीय जनता पार्टी के लाल कृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता को भी यह अहसास हो गया कि इस जीत के श्रेय के अकेले हकदार नरेन्द्र मोदी हैं और उन्होंने संसद भवन के सेन्ट्रल हॉल में सार्वजिनिक रूप से इस जीत को मोदी की कृपा बता दिया।

महज दो पार्टियों से अपने सफर की शुरुआत करने वाले नरेन्द्र मोदी ने चुनाव आते आते एक पूरा कारवां तैयार कर लिया। एक एक कर कई पार्टियां कुछ सामने से और कुछ पर्दे के पीछे से नरेन्द्र मोदी की मदद के लिये सामने आने लगी। भावी प्रधानमंत्री की घोषणा के साथ उनकी अग्निपरीक्षा शुरू हो गयी थी। विशाल विरोधियों की सेना के सामने अकेले पड़ चुके नरेन्द्र मोदी के सामने इस चुनाव के बाद के लिये कोई विकल्प नहीं था। कोई उन्हें समुद्र में फेकने की बात करता तो किसी के स्वर और भी तल्ख होते। मोदी की जय या पराजय के बीच संपन्न चुनाव के आवाम के फैसले ने सभी अटकलों पर विराम लगा दिया।

देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के नतीजे जब वैलेट से बाहर निकले तो उनके सामर्थ्य की पहचान बनी उनकी भारी बहुमत से मिलने वाली जीत। अलग अलग राज्यों में चुनावी तालमेल के बाद भी अकेले भाजपा को न सिर्फ पूर्ण बहुमत मिला बल्कि आकड़ों के इस खेल में काफी आगे निकल गया मोदी का व्यक्तित्व। विरोधियों और सहयोगियों को हैरानी में डालने वाले आकड़े देश में मीडिया के माध्यम से एक्जिट पोल के रूप में आई अटकलों पर भी विराम लगा गये। तकरीबन तीस सालों बाद स्थिर सरकार का भारत का सपना पूरा हो रहा था। गठबंधन की दुहाई देकर भ्रष्टाचार और दूसरी समस्याओं को झेल रहे देश के सामने एक मजबूत सरकार बनने का रास्ता सिर्फ मोदी के ही नेतृत्व का नतीजा है।

गुड गवर्नेश की दुहाई देने वाले मोदी के सामने इस सत्ताभिषेक के बाद चुनौतियों का अंबार लगा है। बड़ी बड़ी बातें कर के देश की जनता को सपने बेचने जैसे आरोप लगाने वाले विरोधी भी उनके अपार जन समर्थन को स्वीकार करते हुये दो साल का समय देना चाहते हैं। पिछली मनमोहन सरकार ने साफ तौर पर यह कहा था कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, पर मोदी की सरकार को उनके विरोधियों द्वारा निश्चित ही उनके वायदों पर घेरने की कोशिश जारी रहेगी।

नरेन्द्र मोदी यथार्थवादी होने के साथ ही आदर्शवादी भी हैं। उनमें आशावाद कूटकूट कर भरा है। अपने आशावादी होने की बात वे प्राय: सभा औऱ रैलियों में करते रहते हैं। नरेंद्र मोदी के शब्दों पर ही यकीन करें तो उनका जीवन बचपन से ही विभिन्न तरह की विषमताओं एवं विपरीत परिस्थितियों में गुजरा है। किन्तु अपने अंदर के आत्म बल और साहस ने सदैव उनका मार्गदर्शन किया है। अवरोधों को उन्होंने अपनी ताकत की तरह इस्तेमाल किया है। गृहत्याग के बाद भी उनके कदम सदैव आगे ही बढ़े हैं और व्‍यक्‍तित्‍व की इन्‍हीं विशेषताओं के चलते उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई जारी रखी बल्कि राजनीति शास्त्र जैसे विषय में एम.ए किया।

बहरहाल 1984 में देश के प्रसिद्ध सामाजिक, सास्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश कर गुजरात के रोल मॉडेल बने नरेन्द्र मोदी अब एक नई राह पर चल पड़े हैं। देखना यह होगा कि आने वाले समय में एक स्वयं सेवक की भूमिका से अपने जीवन की शुरूआत कर देश के शीर्ष पद पर पहुंचने वाला यह व्यक्तित्व आम जन की कसौटी पर कितना खरा उतरता है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, युवाओं की उम्मीद, काला धन और न जाने कितने वादों के बीच मोदी की ताजपोशी कुछ समय देने की वकालत तो कर सकती है पर समस्यों के निदान से अपना मुंह नहीं मोड़ सकती।

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