नारी शक्ति को समर्पित दो भाषाओ भोजपुरी और मैथिलि में एक साथ बानी सोशल फिल्म ”डमरू उस्ताद” 5 सितम्बर को रिलीज़ होगी सिनेमाघरों में

राजू बोहरा, नयी दिल्ली,

सिनेमा का  हमेशा से सामाजिक सरोकार रहा है जिसे मनोरंजन के माध्यम से दर्शकों तक पड़ोसा जाता है। सामानांतर सिनेमा का अस्तित्व सामाजिक सरोकार लेकर ही रहा है । कुछ फिल्म मेकर ऐसे भी हैं जो मनोरंजन में सामाजिक सरोकार  की चासनी  पिरोकर फिल्म बनाते हैं और सफल होते आये हैं। ऐसी ही एक फिल्म डमरू उस्ताद 5 सितम्बर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही है।  डमरू उस्ताद एक साथ मैथिलि और भोजपुरी भाषा में बनी है और दोनों ही भाषाओँ में प्रदर्शित हो रही है। इस  फिल्म का टैग लाइन है नारी शक्ति की कहानी और इसे काफी धारदार तरीके से इस फिल्म में दिखाया गया है। दरअसल फिल्म डमरू उस्ताद नारी देह और नारी संघर्ष की कहानी है जिसमें नारी अपने देह को अपनी अस्मिता से जोड़कर  जीने से इंकार कर देती है। वो कहती है उसके पेट में पलने वाला बच्चा नाजायज इसीलिए नहीं हो सकता क्योंकि उसके बच्चे का बाप उसका पति नहीं है। अगर उसका पति ऐय्याश है और दूसरी औरतों साथ सम्बन्ध रखता है तो पहला अपराधी वो है।

डमरू उस्ताद नारी प्रतिशोध की कहानी भी दिखाई देती है जहाँ एक पत्नी सिर्फ पति से प्रतिशोध लेने  लिए दूसरे पुरुष से  सम्बन्ध बनाती है और उस बच्चे को समाज में स्थान दिलाने  लिए विधवा बनने  तैयार रहती है।नायक डमरू नारी शक्ति के आत्मबल  रूप में उभरा है।  डमरू जबकि एक मज़दूर है लेकिन वो सच्चा प्रेमी है और उसका प्रेम सिर्फ नारी देह तक सिमित नहीं है।  डमरू के लिए प्रेम सम्पूर्णता है जिसे प्रेम करके ही हासिल किया जा सकता है। एक ज़मींदार द्वारा ठगी गयी नायिका को डमरू सम्पूर्णता  से अपनाता है और इसीलिए डमरू उस्ताद कहलाता है।  फिल्म डमरू उस्ताद का पहलू बिहारी मज़दूरों के ऊपर भी है. फिल्म डमरू उस्ताद उन बिहारी मज़दूरों की पीड़ा को बखूबी दिखलाता है जो घर से दूर बड़े शहरों में मज़दूरी करते हैं  और ओये बिहारी सुनकर जीने को विवश हैं।

फिल्म ”डमरू उस्ताद” के लेखक / निर्देशक अनूप कुमार हैं जो सालों से दूरदर्शन एवं अन्य चैनलों के लिए  एवं धारावाहिक बनाते आ रहें हैं। अनूप कुमार वर्तमान में  एक राष्ट्रीय हिंदी न्यूज़ चैनल के सीनियर प्रोग्रामिंग प्रोडूसर हैं  और सामाजिक सरोकार से सम्बंधित प्रोग्राम बनाने के लिए जाने जाते हैं। सिंदूरदान के बाद अनूप कुमार की ये दूसरी फिल्म है और इनसे ये उम्मीद भी की जाती है की ये सामाजिक सरोकार से गुंथी हुई कहानी लेकर ही मनोरंजन करने दर्शकों तक पहुंचेंगे। अनूप कुमार फिर एकबार सशक्त फिल्म बनाने में सफल हुए हैं। चरित्रों में नायक डमरू की भूमिका में अनिल मिश्रा हैं जो मैथिलि सिनेमा के सबसे चर्चित चेहरा हैं. नायिका नेहा श्री राजस्थानी और भोजपुरी सिनेमा की आती हुई सबसे चमकदार चेहरों में हैं।  शुभनारायण झा मैथिलि सिनेमा के भीष्म पितामह माने जाते हैं। सहयोगी नायिका मिष्टी एक ट्रेंड डांसर है और मंजी हुई अभिनेत्री होने का इन्होने परिचय है। कल्पना जी और मीणा गौतम के साथ विजय मिश्रा ,नीलेश दीपक ,संतोष , आदि ने बेहतरीन अभिनय है। श्री राम जानकी बैनर के तहत ये फिल्म बनी है जिसके निर्माता बिष्णु पाठक हैं।

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