पटना की हवा और कुछ कमीने दोस्त

पटना की हवा मुझे हमेशा से अच्छी लगी है, सारे कमीने दोस्त मेरे यहीं रहते हैं, जिनके साथ अव्वल दर्जे की लुच्चई में मैं संलग्न रहा हूं। दुनिया में बेतल्लुफ दोस्त शुरूआती दौर में ही मिलते हैं, बाद में तो दोस्ती पर कई तरह की चासनी चढ़ी होती है, कई तरह के मतलब होते हैं। खैर बात पटना की करते हैं। यहां की सड़के चौड़ी हो चुकी हैं और कई फ्लाईओवर बन चुके हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां इन फ्लाईओवरों पर सर्पीली आकार में घूम रहीं हैं। और साथ में कुछ कमीने दोस्त बैठे हो तो मजा दोगुना हो जाता है। अब इस तरह की बात सुनने को आपको कहां मिलेंगी, “कल रात में दारू ज्यादा पी लिया बीवी घर में घुसने नहीं दे रही थी। आज समय पर घर जाऊंगा, वो भी बोर्नविटा के साथ। आज कोई मुझे दारू छूने के लिए नहीं बोलना।” बेशक जिंदगी कहीं ठहरती नहीं है। अपनी गति और चाल से यह आगे बढ़ती रहती है। पुराने दोस्त पुरानी शराब की तरह होते हैं, लंबी जुदाई के बाद चौगुना मजा देते हैं। उनके साथ हर कश में मजा है।

सड़कों पर और ओवरब्रिज के रूप में बदलाव तो देखने को मिलते हैं, लेकिन लोगों की बोल चाल और हाव भाव में रत्तीभर भी फर्क नहीं आया है। बिंदास अंदाज में यहां का जीवन अपनी गति से चलायमान है,लेकिन इसके साथ ही उनका इकोनोमिकल पक्ष हावी हो गया है। कमाने की धुन में अपने बिंदासपन के साथ लोग सहजता से आगे बढ़ते जा रहे हैं। कमीने दस्तों के साथ पटना की सड़कों पर कार में दौड़ते हुये गपशप करना अच्छा लगा। लंबे समय के बाद पटना लौटा हूं। इस शहर में मेरा बचपन बीता है और पत्रकारिता की पढ़ाई भी यहीं से की है। मेरे बैच के सारे साथी आज पत्रकारिता की दुनिया में अच्छी मुकाम हासिल किये हुये हैं। अपने कमीने दोस्तों से उनके बारे में सुन कर यह यकीन और पुख्ता होता है सब के सब अपने समय के बेहतरीन दिमाग थे। उर्जा उनमें कूटकूट कर भरी हुई थी। आज बिहार की पत्रकारिता में वे अहम भूमिका निभा रहे हैं। यहां की सोशल इंजनीयरिंग को बेहतर तरीके से समझते हुये अपनी कलम चला रहे हैं।

लंबे समय के बाद आप अपने पुराने शहर में लौटते हैं तो कई चीजें बरबस आपको अपनी तरफ आकर्षित करती है। उन चीजों को देखकर आप नास्टेलिजिया के शिकार होते हैं। पुराने दिनों की एक-एक बातें आपके जेहन पर हावी होने लगती है। 1997 में मैं पटना से दिल्ली रवाना हुआ था। यह दौर लालू प्रसाद यादव का था। लालू प्रसाद यादव पिछड़ों के मसीहा के तौर पर बिहार की राजनीति में पूरी तरह से स्थापित हो चुके थे। सामाजिक न्याय का नारा बुलंद करते हुये उन्होंने बिहार की जनता को नये तरीके से गोलबंद करके राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से दखल दे रहे थे। उन दिनों पिछड़ावाद को लेकर जोरदार बहस होती थी। अब इन बहसों का स्वरूप बदल गया है। अब ‘मोदीमैनिया’ के लेकर चर्चाएं हो रही हैं। बिहार की भावी राजनीति की रूपरेखा ‘मोदीमैनिया’ के  इर्दगिर्द बुनी जा रही है।

दिल्ली की पत्रकार मंडली में दबी जुबान से यह चर्चा होती रही है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी के काबिज होने के बाद अघोषित रूप से हर चीज का केंद्रीकरण किया जा रहा है। यहां तक की मंत्रियों के हाथपांव भी बांध दिये गये हैं। हर मंत्री की गतिविधि पर पीएमओ की कड़ी नजर है। पत्रकारों की एक लाबी नरेंद्र मोदी को सदी का महानायक साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोड़ लगाये हुये है। कुछ संपादक और पत्रकार जो कल तक कांग्रेस हुकूमत के कदमो तलें पड़े रहते थे अब पाला बदलकर नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे गढ़ने लगे हैं। मोदी सरकार के खिलाफ खबरों पर अघोषित रूप से सेंसर लग गया है। बिहार में स्थिति थोड़ी उलट है। यहां के लोग रियेक्ट कर रहे हैं। इन्हें अहसास है कि आने वाले समय में बिहार में अमित शाह के नेतृत्व में मोदी मंडली यहां काबिज होने के लिए हरसंभव कोशिश करेगी। राजद और जदयू गठबंधन एक साथ मिलकर मोदी मंडली की हवा निकलाने की तैयारी में है। सुशील कुमार मोदी सहित भाजपा के कई नेता इस गठबंधन को नापाक करार देते हुये फिर से जंगल राज की वापसी की दुहाई देने लगे हैं। परस्पर विरोधी विचारधारा के आधार पर जो राजनीतिक जमीन बिहार में तैयार हो रही है उसकी अनदेखी करके भाजपा खेमा पूरी लड़ाई को जंगलराज पर केंद्रित करने की रणनीति अपनाये हुये है। बिहार में भाजपा की यह रणनीति कहां तक सफल होगी यह तो समय ही बताएगा। इतना तय है कि बिहार आने वाले समय में भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने वाला है। यहां की राजनीतिक बहसें गुदगुदाने वाली है। बहसों का यह सिलसिला चलता रहेगा, और भविष्य में बिहार की राजनीति क आकार देने में इन बहसों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इन राजनीतिक बहसों के बीच मेरे एक कमीने मित्र ने मुझसे सवाल किया, ‘हमलोग लंबे समय से बिहार में जमे हुये हैं और तुम बाहर की दुनिया में घूम रहे हो। सब लोग पैसे कमा रहे, अच्छी नौकरी कर रहे हैं या फिर अपना धंधा संभाले हुये है, तुम्हें नहीं लगता कि यहां से दूर रहकर तुमने गलती की है।’ उत्तर में मैं कहता हूं, ‘नहीं, कतई नहीं। बिहार से बाहर निकल कर जो मैंने हासिल किया है वो शायद तुम कभी हासिल कर नहीं पाओगे। हर व्यक्ति के अपने अनुभव होते हैं और इन्हीं अनुभवों के आधार पर ही तो व्यक्तित्व का निर्माण होता है। मेरे दिमाग में बहुत कुछ है, जिन्हें आनेवाले समय में मैं व्यवस्थित तरीके से शब्दों में ढालूंगा और यही मेरी पूंजी है।’ दोस्तों के साथ किस्से और कहानियों का दौर चलता रहता है। सुकून है कि लंबे भागदौड़ के बाद अब अनवरत कुछ लिख पाऊंगा और 2015 में बिहार के चुनाव को भी करीब से देख पाऊंगा।

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