मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी ( भाग-३)

संजय मिश्र

इंडिया के करीब सौ मुसलमान युवकों के फरार होने की खबर सार्वजनिक हुई तो देश के समझदार तबकों में सनसनी फैल गई… दबे स्वर में उन्होंने चिंता जताई… खबर खुफिया स्रोतों की तरफ से आई थी… आशंका है कि ये युवक इराक और सीरिया में आईएसआईएस के चंगुल में हैं… जिहाद करने निकले हैं… और इसलाम के नाम पर आहूति देने गए हैं। इधर इन युवकों के परिजनों का हाल बेहाल है… वे मदद की गुहार लगा रहे हैं।
ये मुसलमानों के पश्चिम की तरफ ताकने का पीड़ा देने वाला पहलू है… मक्का-मदीना पश्चिम में है सो स्वाभाविक चार्म है उस दिशा का… ये चार्म पश्चिम के विकसित देशों के लिए रूझान से अलग है… ये धार्मिक है… इसका प्रकटीकरण बीसवीं सदी के शुरूआत से ही इंडिया के राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में असहजता घोलने का पोटेंशियल रखता आया है।
ओटोमन अम्पायर (तुर्क) में ब्रिटिश मनमानी के मुद्दे पर इंडिया में १९१९-२२ में जो खिलाफत आंदोलन चला उसमें तुर्की के सुल्तान के धार्मिक अधिकारों के सवाल भी शामिल थे…. इंडिया के मुसलमानों के इस हलचल को लेकर गांधी विशेष आग्रही हुए … उन्होंने इसे अवसर के रूप में देखा और खुल कर समर्थन दिया… इस देश के आज के लोग जो दिन-रात सेक्यूलरिज्म की बात सुनते हैं… उन्हें ये अटपटा जरूर लग सकता है।
पाकिस्तान भी पश्चिम में है… और इसकी बुनियाद भी इसलाम के आसरे पड़ी … जिन्ना और इकबाल ने जिस पाकिस्तान का तान छेड़ा वो इस सबकंटिनेंट को पार्टिशन की तरफ धकेलने में सफल हुआ… जिस मुसलमान आबादी ने इंडिया में ही बसर करने का मन बनाया.. उसके लिए न तो पश्चिम के धार्मिक प्रतीकों का मोह कम हुआ और न ही नए बने पाकिस्तान के लिए आसक्ति… साल १९७१ के युद्ध और पाकिस्तान के टूटने का गहरा असर पड़ा उनपर।
वे इस बात पर एकमत हुए कि पाकिस्तान में बसने के किसी सपने से ज्यादा मुफीद इंडिया में रहना ही है… इससे भी बड़ा सबक था बांग्लादेश का आकार लेना… इसने जता दिया था कि भाषा(यहां बांग्ला पढ़े) की ललक धर्म के आकर्षण से पार पा सकता है… टू-नेशन थ्योरी ध्वस्त हो चुकी थी… बांग्लादेश में फंसे बिहारी मुसलमानों को लेने से पाकिस्तान के इनकार ने रही सही कसर पूरी कर दी… पाकिस्तान रूपी पश्चिम का मोह मोटा-मोटी अब वहां रहने वाले उनके संबंधियों और सांस्कृतिक आह्लादों तक सिमट कर रह गई।
इधर एक नया तबका उभरा है इस देश में जो मुसलमानों के पश्चिम प्रेम को भड़काने के नाम पर सशक्त हुआ है… इसका आधार मुसलमान के मानस का दोहन करना है… वे कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म के फोकल प्वाइंट यानि मुसलमानपरस्ती की खातिर ऐसा करते हैं… इसके दर्शन हाल में इस देश को खूब हुए हैं… मसलन इराक में आईएसआईएस की बर्बरता, बोको हरम से जुड़ी अमानुषिक हरकतों पर तो चुप्पी साध जाता है ये तबका पर गजा पट्टी के हमास के लिए इंडिया की सड़कों को उद्वेलित करने से नहीं चूकता… पश्चिम भाव के दोहन और जायज नजरियों के बीच से गुजरते हुए इंडिया के मुसलमानों का बड़ा तबका अपने नए पीएम की उत्साह बढ़ाने वाली उस स्वीकारोक्ति को परखने में लगा है जिसमें कहा गया है कि इंडिया के मुसलमान देशभक्त हैं और अलकायदा जैसे संगठनों के मंसूबों को सफल नहीं होने देंगे।

संजय मिश्रा

About संजय मिश्रा

लगभग दो दशक से प्रिंट और टीवी मीडिया में सक्रिय...देश के विभिन्न राज्यों में पत्रकारिता को नजदीक से देखने का मौका ...जनहितैषी पत्रकारिता की ललक...फिलहाल दिल्ली में एक आर्थिक पत्रिका से संबंध।
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