चीन को नहीं भा रही भारत-वियतनाम की करीबी

संजय राय, नई दिल्ली
देश में नयी सरकार के गठन के बाद से ही चीन की ओर से भारत के मामलों में लगातार टांग अड़ाई जा रही है। भारत की विदेशनीति में आयी नयी करवट को गौर से देख रहा चीन इन दिनों काफी तिलमिलाया हुआ है। उसे भारत के पूर्वोत्तर के राज्य अरुणाचल प्रदेश में सरकार की ओर से की जा रही बुनियादी ढ़ांचा विकास की कोशिशें बिलकुल ही अच्छी नहीं लग रही हैं। पूरे अरुणाचल को चीन अपना हिस्सा बताता है। चीन की हरकतें इस बात का साफ संकेत दे रही हैं कि भारत की तरक्की में सबसे पहली और बड़ी बाधा इसकी तरफ से ही आने वाली है। हकीकत यह है कि चीन ने भारत के रास्तें में छोटे-मोटे रोड़े अटकाने शुरू कर दिये हैं। हाल में सम्पन्न हुये वियतनाम के प्रधानमंत्री नुयेन तन जुंग के दिल्ली दौरे के बाद उसकी तिलमिलाहट कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के पहले और बाद में चीन ने भारत को अपनी धौंसपट्टी दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। लद्दाख में चीन के सैनिक पहले घुसे फिर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेहमान बने। भारत से वापसी के तुरंत बाद बीते 22 सितम्बर को जिनपिंग ने अपने आला सैनिकों को बुलाकर कहा था सेना को क्षेत्रीय युद्ध की तैयारी शुरू कर देनी चाहिये। भारत ने चीन की ओर से अपने सैनिकों को दिये गये इस आदेश को काफी गंभीरता से लिया है। हालांकि, चीन ने सफाई में कहा कि उसका यह बयान भारत के लिये नहीं था। ताजा घटनाक्रम में बीते 22 अक्टूबर को चीन के सैनिकों ने लद्दाख में दोतरफा घुसपैठ की है। वहां तैनात सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट है कि पेंगांग झील के अंदर और जमीनी इलाकों में काफी अंदर तक चीनी सैनिक घुस आये थे, लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया और इसके बाद वे वापस लौट गये।
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार समय रहते ही चीन के इरादों को समझ गयी थी। संभवतः इसीलिये उसकी ओर से अपनी घेरेबंदी की काट के तौर पर उन सभी देशों के साथ दोस्ती को मजबूत करना शुरू कर दिया गया था, जिनका चीन के साथ किसी न किसी विषय पर विवाद रहा है। भारत के लिये यह एक अच्छी बात है कि सरकार बदलने के बाद भी विदेशनीति की दशा-दिशा में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इस दिशा को न सिर्फ बरकरार रखा है, बल्कि गति भी काफी तेज कर दी है।
विगत 28 अक्टूबर को भारत दौरे पर आये वियतनाम के प्रधानमंत्री नुयेन तन जुंग ने भारत के साथ दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज करने का एक समझौता किया। भारत इस इलाके में पहले ही दो ब्लाॅकों में तेल की खोज कर रहा है। नये समझौते में वियतनाम ने भारत को दो अतिरिक्त ब्लाॅक तेल की खोज के लिये आवंटित किया है। चीन इन इलाकों को अपना बताता आ रहा है। वियतनाम ने 2011 में विवादित इलाके को लेकर एक कानून बना दिया था, जिसका चीन लगातार विरोध कर रहा है।
हालांकि, जब भारत सरकार ने वियतनाम के साथ मिलकर इस इलाके में तेल की खोज का अभियान शुरू किया था, तब इसपर कई तरह के सवाल उठे थे। यह कहा जा रहा था कि अमेरिका की शह पर भारत अपने अनखोजे इलाकों की अनदेखी करके बेवजह दो देशों के विवाद में फंस रहा है। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि सरकार का यह फैसला बिलकुल सही था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और जब उससे खुलकर दोस्ती की जाय तो यह संकेत मिलता है कि दोस्ती करने वाले का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। भारत अब चीन के दुश्मन माने जा रहे देशों के साथ यही कर रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत और चीन के बीच इस प्रतिस्पर्धा का भरपूर फायदा दोनों देशों के कई पड़ोसी देशों को मिल रहा है।
इतना ही नहीं पिछली सरकार द्वारा दिखाई गयी दिशा में दो कदम आगे बढ़ते हुये भारत सरकार ने वियतनाम को 10 करोड़ अमेरिकी डाॅलर का कर्ज देने का भी फैसला किया है, जिससे कि वह भारत का नौसैनिक पोत हासिल कर सके। वियतनाम भारत से कुल चार पोत खरीदने वाला है। इस दौरान हुये समझौतों में भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री और वियतनाम के वायु सैनिकों को सुखोई विमानों के संचालन का प्रशिक्षण देने की भी हामी भरी है। इसके अलावा भारत वियतनाम में एक अंग्रेजी भाषा एवं सूचना-प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण केंद्र खोलेगा और उसके उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजने में मदद भी करेगा। मालूम हो कि भारत वियतनाम को वर्ष 2013-14 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार आठ अरब डाॅलर का था। दोनों के बीच सहमति बनी है कि अगले छह वर्ष में विभिन्न नये क्षेत्रों में व्यापार का दायरा बढ़ाकर इसे 15 अरब डाॅलर तक पहुचाया जायेगा।
दक्षिण चीन सागर में भारत ने अपनी मौजूदगी बढ़ाने की स्पष्ट घोषणा की है। भारत ने समुद्री परिवहन की स्वतंत्रता को लेकर वियतनाम के नजरिये का पुरजोर तरीके से समर्थन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि समुद्री व्यापार में कोई बाधा नहीं होनी चाहिये और इससे जुड़े आपसी विवाद का समाधान अंतरराष्ट्रीय नियमों के आधार पर किया जाना चहिये।
दक्षिण चीन सागर प्रशांत महासागर का हिस्सा है, जो सिंगापुर से लेकर ताईवान स्ट्रेट के बीच 35 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें 250 से भी ज्यादा छोटे-छोटे द्वीप हैं। चीन के अलावा मलेशिया, ब्रुनेई, फिलीप्पींस, सिंगापुर, इंडोनेशिया और वियतनाम की सीमायें इस सागर से मिलती हैं। दक्षिण चीन सागर से दुनिया के नौवहन का एक तिहाई यातायात इसी सागर के रास्तों से होता आया है। व्यापारिक ढुलाई के मामले में यह दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला रास्ता है। इस क्षेत्र में तेल और गैस के भारी मात्रा में भंडार हैं। चीन की नजर इन खनिज भंडारों पर है। वह इनका इस्तेमाल अकेले करना चाहता है। इसीलिये वह पड़ोसी देशों को समय-समय सेना की धौंसपट्टी दिखाता रहता है। भू-राजनीतिक नजरिये से यह बेहद अहम जल-क्षेत्र है। वियतनाम, फिलीप्पीन्स, जापान, मलेशिया और सिंगापुर जैसे कई देश चीन के इस दावे को लगातार खारिज करते आ रहे हैं।
भारत और वियतनाम की ताजा करीबी जाहिरा तौर पर चीन के लिये परेशानी का गम्भीर सबब है। वह भारत के आर्थिक विकास का दायरा पड़ोसी देशों तक भी नहीं फैलने देना चाहता है। अगले पांच साल में चीन भारत के पड़ोसी देशों में भारी निवेश करने जा रहा है। जल और थल की घेरेबंदी के साथ धन की ताकत को चीन ने भारत की घेरेबंदी का अहम हथियार बनाया है। उसे शायद यह बात अच्छी नहीं लग रही है कि भारत अब वह दुनिया से नजर मिलाकर बात करने की स्थिति में आ चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिलहाल चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में इसी नीति पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत विरोध की बुनियाद पर टिका पाकिस्तान तो पूरी तरह से चीन के इशारे पर नाच रहा है। जब चीन ने अपने सैनिकों को क्षेत्रीय युद्ध के लिये तैयार रहने को कहा तो इसके महज कुछ दिन बाद ही पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ फायरिंग की, जो भारत के खिलाफ चीन-पाक गठजोड़ की तस्दीक करते हैं। मोदी सरकार ने इस खतरे को काफी गम्भीरता से लिया है और इजराइल से भारी संख्या में टैंक व अन्य सैन्य हथियारों की खरीद को मंजूरी दी है।
आज की दुनिया में सम्बंधों का मकड़जाल काफी पेचीदा हो चुका रहा है। सारे एक दूसरे के साथ रणनीतिक सम्बंधों के आधार पर व्याापार को मजबूत बनाने में जुटे हुये हैं। आर्थिक सम्बंध ही आज के दौर की विदेशनीति की धुरी बना हुआ है। इसके साथ ही गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी चल रही है, जो कि पूरी तरह स्वाभाविक भी है। एशिया में चीन को अगर भविष्य में किसी देश से मजबूत चुनौती मिल सकती है तो वह भारत ही है। इस तरह के माहौल में भारत को हर कदम पर चीन की अड़ंगेबाजी से निबटने का हथियार साथ-साथ लेकर ही चलना होगा। भारत और ताईवान के सम्बंधों में आयी प्रगाढ़ता चीन को काबू में रखने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।
समाप्त।
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