यह तुम्हारे नयन हैं, या नयनाभिराम कोई भवन (कविता)

[ कोई बतीस कि पैतीस बरस से भी अधिक समय हो गए कविता लिखना छोड़े हुए। लगता था कि अब जीवन में कभी कविता लिखना नहीं हो पाएगा । पर आज कविता लिखना फिर से हो गया है । लगता है जैसे जी गया हूं । ]

पचास पार की तुम
और जाने कितने समंदर सोखे
तुम्हारी यह आंखें

जैसे बिजली का एक नंगा तार हैं
कि तुम्हारी आंखें हैं

इस उम्र में भी
आग बन जाती हैं
तुम्हारी आंखें

यह समंदर, यह आग
यह बिजली का नंगा तार
यह तुम्हारे नयन हैं
या नयनाभिराम कोई भवन

तुम्हारी इन भोली , मासूम
और बेचैन आंखों की तपन भी
महसूस करना
खुद की आग में दहकना है

आख़िर यह कौन सा सूर्य है
जो तुम्हारी आंखों को
इतना दहकाता है
कि तुम्हारी आंखें
बिजली का नंगा तार बन जाती हैं
और तुम मृत्यु मांगने लगती हो

मृत्यु मुक्ति का आख़िरी रास्ता है

तो तुम मुक्ति चाहती हो
खुद से कि
अपनी आंखों से
आंखों के अंगार से
या कुछ और है

मृत्यु तो अस्सी पार मेरी मां भी मांगती है
कहती है कि बहुत जी चुकी
सारे अरमान पूरे हो गए
सारे सुख पा लिए
पर अब क्यों जी रही हूं
वह खुद से सवाल करती है
और जवाब तलाशती कहती जाती है
भगवान न जाने कितनी उम्र दे दिए हैं मुझे  !

लेकिन जीवन से भरी तुम्हारी आंखों में
ममत्व का जो एक कटोरा है न
वह बहुत हुलसाता है
ऐसे गोया यह आंखें न हों तुम्हारी
एक शिशु हों
सुबह-सुबह दूध भात का कटोरा गोद में लिए

समुद्र सी शांत आंखों में दूध का कटोरा जैसे उफना जाता है
और मन होता है कि
गौरैया बन जाऊं
गौरैया बन कर तुम्हारी आंखों में ही
एक घोसला बनाऊं
घोसला बना कर उस में बस जाऊं
शिशु बन जाऊं
दूध भात खाऊं
खिला दो न

तुम्हारी आंखों को
तकलीफ तो नहीं होगी

चोंच भर दाना
बूंद भर पानी
और यह मेरा पंख फैलाना

कितनों को टीस देता है

आकाश को तो टीस नहीं होती
मेरा उड़ना उसे सुहाता है
लेकिन बिजली के
खुले इन नंगे तारों को
नहीं सुहाता

इसी लिए मैं तुम्हारी आंखों में
एक घोसला बनाना चाहता हूं

लेकिन तुम्हारी आंखें भी तो बिजली का नंगा तार हैं
और बिजली का नंगा तार
दोस्ती में छुएं या दुश्मनी में
जल जाना ही है ,मर जाना ही है

अपनी इन भोली , मासूम
और बेचैन आंखों की तपन में
जलते आकाश के इस सूर्य को
थोड़ी छांह दो न
थोड़ा विश्राम दो ना !

तुम्हारी इन समुद्र सी गहरी आंखों की सिलवट
देख कर पूर्णिमा की चांदनी मन में उतर जाती है
कहीं बहुत गहरे

तुम्हारी शांत आंखों में बारूद भरी बेचैनी देख कर
जैसे शरद भीतर उतर आता है
मन रजाई बन जाता है

मन में ढेर सारे चित्र बनने लग जाते हैं
जैसे चांद पर वह एक चरखा कातती औरत
या कि उस का भरम
कि कुछ भी नहीं है
न औरत , न चरखा , न कातना, न कोई चित्र

तुम्हारी समंदर सी गहरी इन आंखों के भीतर
हलचल बहुत है
उथल-पुथल बहुत है
शांत दिखने वाले इस समंदर में
बाकी सब है
एक शांति नहीं है

गौरैया का घोसला
हिल रहा है
तेज़-तेज़

तो क्या घोसला
बनने और बसने से पहले ही
उजड़ रहा है

तुम्हारी आंखों में बसा
यह कौन सा समंदर है
यह कौन सी टीस है
कि एक घोसला बन रहा है , उजड़ रहा है
निर्माण और ध्वंस
साथ-साथ
कहीं ऐसे भी कोई नीड़ बनता है
किसी आंख से कोई ऐसे भी उजड़ता है

यह मेरा
चोंच भर दाना
बूंद भर पानी
और यह मेरा पंख फैलाना
तुम्हारी आंख में बसे समंदर को भी
क्यों खल रहा है

क्यों खल रहा है
तुम्हारी आंखों में
मेरा बसना
और मेरा जीना

क्या तुम नहीं जानती
कि तुम्हारे यह नयन हमारा भवन हैं
नयनाभिराम
अपलक खड़ा मैं इस में जीता हूं
और तुम मुझे देवता बना देती हो
अपनी आंखों को
अपलक निहारने
के जुर्म में

सुनो
मुझे देवता मत बनाओ

गौरैया की ही तरह
उड़ने और बसने दो
अपने इन निर्दोष नयनों में

शायद भीतर-भीतर
बहुत कुछ घट रहा है
तुम्हारी आंखों के पार
समंदर सा सवाल लिए
आकाश सा फैलाव लिए

जो भी हो
इस घोसले को बचा लो न

मुझे उड़ने मत दो न
मन की रजाई  ओढ़ लेने दो
थक बहुत गया हूं
ओढ़ कर सो लेने दो !

साभार:     http://sarokarnama.blogspot.in

[ 17 नवंबर, 2014 ]

दयानंद पांडेय

About दयानंद पांडेय

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एम.ए. करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। वर्ष 1978 से पत्रकारिता। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई 26 पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रेमचंद सम्मान, कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान तथा फ़ेसबुक में फंसे चेहरे पर सर्जना सम्मान। लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद डा. ओम प्रकाश सिंह द्वारा अंजोरिया पर प्रकाशित। बड़की दी का यक्ष प्रश्न का अंगरेजी में, बर्फ़ में फंसी मछली का पंजाबी में और मन्ना जल्दी आना का उर्दू में अनुवाद प्रकाशित। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास),सात प्रेम कहानियां, ग्यारह पारिवारिक कहानियां, ग्यारह प्रतिनिधि कहानियां, बर्फ़ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), कुछ मुलाकातें, कुछ बातें [सिनेमा, साहित्य, संगीत और कला क्षेत्र के लोगों के इंटरव्यू] यादों का मधुबन (संस्मरण), मीडिया तो अब काले धन की गोद में [लेखों का संग्रह], एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी [ राजनीतिक लेखों का संग्रह], सिनेमा-सिनेमा [फ़िल्मी लेख और इंटरव्यू], सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’ नाम से तथा पॉलिन कोलर की 'आई वाज़ हिटलर्स मेड' के हिंदी अनुवाद 'मैं हिटलर की दासी थी' का संपादन प्रकाशित। सरोकारनामा ब्लाग sarokarnama.blogspot.in वेबसाइट: sarokarnama.com संपर्क : 5/7, डालीबाग आफ़िसर्स कालोनी, लखनऊ- 226001 0522-2207728 09335233424 09415130127 dayanand.pandey@yahoo.com dayanand.pandey.novelist@gmail.com Email ThisBlogThis!Share to TwitterShare to FacebookShare to Pinterest
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