लुभावने चुनावी वायदों से इठलाता बिहार !

अनिता गौतम.

बिहार विधानसभा के चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही प्रदेश में अमूमन हर पार्टियों के द्वारा वोटरों को लुभाने की कवायद तेज़ हो गई है। केन्द्र औऱ राज्य सरकार के बीच कुर्सी पाने की जद्दोजहद को दूर करने का एक मात्र सहारा सभी पार्टियों के लिए लोक लुभावन वायदे हैं। नित नयी घोषणाओं से पूरा प्रदेश सराबोर हैं। या यूं कहे कि वायदों की बहार है। ऐन चुनाव के वक्त की जाने वाली लुभावनी बातें जनता के लिए कोई नया नहीं है। साथ ही जनता के लिए यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि इनके वादों पर कितना ऐतबार किया जाए, क्योंकि दावे से कोसो दूर होते हैं ये वादे।

बिहार में जब पहली बार कांग्रेस से वर्तमान राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने सत्ता छीनी थी तब भी ऐसे ही दौर से गुजरा था बिहार। हालांकि ऐसी स्थिति अमूमन तभी आती है जब परिवर्तन की लहर चल रही हो। अभी के हालात में बिहार में परिवर्तन जैसी कोई बात नहीं दिख रही है। कहते हैं, जाने वाली सरकार के लिए अपने आखिरी वक्त में किये गये लोक लुभावन वायदें कोरामिन का काम करते हैं। कुछ इसी तर्ज पर तत्कालीन जगन्नाथ मिश्र की कांग्रेस सरकार ने नित नये प्रयोग करने के इरादे से जनता के लिए इतने वादे किये कि हर तरफ उसका उपहास उड़ाया जाने लगा था। लोगों की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह से आ रही थी“जाती हुई सरकार अब और क्या क्या करेगी? जब पिछले कई सालों से सत्ता में रहकर न कर सकी। ये वादें तो बिल्कुल वैसे है मानों सिर्फ स्वर्ग तक सीढ़ी लगाना बाकी है”।

खैर! तब स्थितियां प्रतिकूल थी। कांग्रेस के खिलाफ एक लहर चल रही थी। जेपी आंदोलन के बाद एक बार फिर बिहार के लोग कांग्रेस के शासन से ऊब रहे थे। तब न मंडल था और न ही कमंडल। सभी एक साथ वीपी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पर प्रहार करने को तैयार थे।

पर आज की स्थिति में भाजपा गठबंधन और लालू नीतीश की जोड़ी वाली महागठबंधन आमने सामने हैं। जनता का मन मिजाज भी समझना आसान नहीं है। इन्हीं सब के बीच तीसरा मोर्चा भी बहुत मजबूती से खड़ा है। तो जाहिर है हर बार की भांति इस बार भी घोषणाओं की बारिश बिहार में हो रही है। क्या पक्ष, क्या विपक्ष और क्या केन्द्र, एक के बाद एक सभी पार्टियां बढ-चढ़ कर वायदों की झड़ी लगा रहे हैं। कोई लैपटाप देने की बात कह रहा है तो कोई गरीबों की झोपड़ी में रंगीन टीवी और केबल कनेक्शन देने की बात कह रहा है। किसी को गरीब महिलाओं के लिए साड़ी वितरण की याद आ रही है। कुर्सी पाने की जल्दबाजी में कभी नेताओं की जबान फिसल रही है तो कभी उनके ज्यादा बढ़ चढ़ कर की गयी बातें आचार संहिता के माया जाल में उलझ जा रहीं हैं। राजनेता के बयान और उनकी पार्टी एक दूसरे से कितना इत्तफाक रखते हैं, इसका पता भी तब चल रहा है जब इनकी घोषणाओं पर चुनाव आयोग संज्ञान ले रहा है। नये नेताओं के वादे तो समझ आ रहे हैं पर पुराने और अनुभवी नेताओं को भी चुनाव आयोग के दायरे की जानकारी नहीं है यह हास्यास्पद है। पूर्व मुख्यमंत्री, वर्तमान मुख्यमंत्री, पूर्व उपमुख्यमंत्री तक पर आचार संहिता उलंघन का मामला इनके राजनीती के तकनीकी अल्पज्ञान को बताने के लिए काफी है।

बहरहाल इन चुनावी वायदों की झड़ियों से जनता कितना इत्तफाक रखती है, कहना मुश्किल है पर इतना तय है कि दर दर भटकते राजनेताओं और चाटुकारिता की हदें पार करती उनकी बातों ने जनता को कुछ समय के लिए, बादशाहत तो दे ही दी है। यह है हमारे देश के लोकतंत्र की खूबसूरती, विपक्ष को हिसाब दे या न दे, पर आखिरी गेंद जनता के पाले में ही आती है।

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