नब्बे के हुये नामवर

जब आइना झूठ बोलेगी

तो नामवर पैदा होगा

आलोक नंदन

नई दिल्ली  । नब्बे बहार देखने के बाद हिन्दी साहित्य के  सुविख्यात समालोचक नामवर सिंह ने अपने जीवन के शतकीय पाली की ओर कदम बढ़ा दिया है। जीवन के प्रति आत्मविश्वास से वह पूरी तरह से लबरेज दिख रहे थे। 28 जुलाई को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक भव्य समारोह में उनको 90 वें जन्मदिन की बधाई देने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। यथावत पत्रिका के संपादक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र अध्यक्ष रामबहादूर राय ने नामवर सिंह के जन्मदिन के अवसर को बड़ी कलात्मकता से देश में लंबे समय से चल रहे दो विपरित विचारधाराओं के मिलन पल में तब्दील कर दिया था।

इस समारोह को लेकर देश के साहित्यिक और राजनीतिक हलकों में पहले से ही फुसफुसाहट हो रही थी। नामवर सिंह अपने धूर वामपंथी मन-मिजाज के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन के पश्चात कई छोरों से असिष्णुता को लेकर आवाजें उठती रही हैं, खासकर साहित्य जगत में पुरस्कार तो राजकीय पुरस्कारों को लौटाने की एक रवायत सी बन गई थी। ऐसे में गृहमंत्री राजनाथ सिंह और संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री महेश शर्मा का नामवर सिंह के 90वें जन्मदिवस समारोह  में समारोह में शिरकत करते हुये देश की संस्कृति और साहित्य में उनके योगदान को मजबूती के साथ स्वीकार निश्चितौर पर एक सुखद अहसास की अनुभूति कराने वाला था।

समालोचना का शिखऱपुरुष हैं नामवर सिंह-राजनाथ सिंह

इस जन्मदिनी समारोह में शिरकत करके राजनाथ सिंह काफी खुश दिख रहे थे। उन्हें भी इस बात का पूरा अहसास था कि जिस अजीम शख्सियत के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में वह शामिल हो रहे हैं, वह विचारधारा के स्तर पर दूसरे छोर पर खड़े हैं। अपनी लेखनी और व्याख्यानों के माध्यम से उन्होंने हमेशा संस्कितवाद के अतिवादी रूप का हमेशा पुरजोर विरोध किया है। इस मौके पर बड़े मीठे लहजे में राजनाथ सिंह ने कहा, “जब मुझे इस कार्यक्रम में आने का न्यौता मिला तो मैंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया। नामवर सिंह के नाम से मैं पहले से वाकिफ था। विज्ञान का छात्र का होने के बावजूद जब से मैंने साहित्य में रूचि लेनी शुरु की थी तभी से नामवर सिंह का नाम सुनता आ रहा था। मैं उसी जनपद का रहने वाला हूं जिस जनपद के नामवर सिंह हैं। पता नहीं नामवर सिंह को लोग क्यों आलोचक कहते हैं। वस्तुत वह समालोचक हैं, समालोचना के शिखर पुरुष। यदि देश में पिछले 40-45 वर्षों का समालोचना का इतिहास लिखा जाये तो वह नामवर सिंह के बिना पूरा नहीं होगा।”

राजनाथ सिंह का स्वार्थ

राजनाथ सिंह ने आगे कहा, “ नामवर सिंह वामपंथी विचारधारा के साहित्यकार हैं। मैं पूरी ईमानदारी से कह रहा हूं, यहां आने के पीछे आंशिक रूप से मेरा अपना स्वार्थ भी था। अब कम से कम मुझे कोई असहिष्णु तो नहीं कहेगा। किसी ने मुझसे कहा है कि नामवर सिंह ने अपना लिखना बंद कर दिया है, पढ़ते ज्यादा हैं-खासकर विरोधी विचारधारा को। भारत की संस्कृति विश्व की सर्वोत्तम संस्कृति है। यहां धर्म को विज्ञान से अलग नहीं किया जाता बल्कि धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे समाहित हैं। मंदिर-मस्जिद और गिरिजाघर में जाना ही धर्म नहीं है, बल्कि जड़ और चेतन के अस्तित्व की सुरक्षा की गारंटी धर्म है। इस आयोजन के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कर्ता धर्ता रामबहादूर राय निसंदेह बधाई के पात्र हैं।”

आइना झूठ बोलेगी तो नामवर जन्म लेंगे- महेश शर्मा

नामवर सिंह के विशाल व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुये संस्कृति एंव पर्यटन मंत्री महेशा शर्मा ने कहा, “साहित्यकार आइना है और आइना कभी झूठ नहीं बोलती। जब आइना झूठ बोलेगी तो नामवर सिंह जैसे लोगों का जन्म होगा।”

देश के नब्बे स्थानों पर हो कार्यक्रम – रामबहादुर राय

इस मौके पर सभागार में मौजूद तमाम लोगों को धन्यवाद देते हुये इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादूर राय ने कहा, “इस आयोजन से नामवर सिंह को दस साल और जीने की उर्जा मिली है। यह उर्जा हमें भी मिले। यदि देश में कोई नया रास्ता दिखाने की क्षमता रखता है तो वह नामवर सिंह हैं। वह धर्मपुरुष, संस्कृतिपुरुष और राजनीतिकपुरुष भी हैं। यह आयोजन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किया गया है। देश के नब्बे स्थानों पर ऐसा आयोजना होना चाहिए। मेरी पूरी कोशिश होगी कि देशभर में इस तरह के आयोजनों का सिलसिला चलता रहे। ”

इस अवसर वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति गिरीश्वर मिश्र, केदारनाथ सिंह, निर्मला जैन, काशीनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पांडेय, विभूतिनारायण राय, भालचंद नेमाडे, रघुवीर चौधरी, तंकमणि अम्मा, पद्मा सचदेव, एस.आर. किदवई, हरिमोहन शर्मा, ज्ञानेंद्र कुमार संतोष व रश्मि रेखा ने भी अलग-अलग सत्रों में नामवर सिंह की सार्थकता पर अपने विचार रखते हुये उनसे जुड़ी हुई कई रोचक कहानियों को याद किया।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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