मून एवं मांक्रों का उदय अमेरिकी चाल के पतन के संकेत

मोहम्मद हसीन बाबू

दक्षिण कोरिया में उत्तर कोरियाई शरणार्थी के बेटे की जीत के कारण अब अमेरिका की मानसिक पीड़ा बढ़ी है। दक्षिण कोरिया के उदारवादी नेता एवं डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार मून को चुनाव में मिली जीत पर एक नजर डालें तो सुधारवादी नेता मून के द्वारा सत्ता की कमान संभालने के बाद सबसे पहले उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग के साथ नए राष्ट्रपति मून सबसे पहले राजनीतिक रूप से अपनी पहली बातचीत शुरू करेंगे। बता दें कि पूर्व राष्ट्रपति पार्क गून हे ने उत्तर कोरिया से अपने सभी रिश्ते खत्म कर लिए थे। साथ ही उत्तर कोरिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। मार्च में पार्क गून हे को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था, जिसके बाद मून जाए-इन एक बड़ी जीत के साथ देश कि सत्ता पर काबिज हुए हैं। यह जीत कोरियाई प्रायद्वीप में अमेरिकी दखल को खत्म करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

मून के आने के बाद से अमेरिका की पीड़ा बढ़ने की वजह शायद यह रही की उत्तर कोरिया के साथ तनाव के बीच पार्क ग्यून-हे की बर्खास्तगी के फौरन बाद अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने दक्षिण कोरिया का दौरा किया। मून की पार्टी को अमेरिकी नीति का सबसे बड़ा विरोधी माना जाता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता मून खुद अमेरिका के कड़े आलोचक हैं। ऐसे में उनके सामने दक्षिण कोरिया में अमेरिकी दखल को रोकने की भी बड़ी चुनौती है। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में थाड एंटी-मिसाइल सिस्टम तैनात कर रखा है, जिसको लेकर काफी विवाद चल रहा है। मून ने इसकी कड़ी आलोचना की है। उत्तर कोरिया की ओर से परमाणु और मिसाइल परीक्षण करने के चलते अमेरिका के साथ उसका तनाव और भी बढ़ गया है। कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध के हालात बने हुए हैं।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के द्वारा उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की हत्या करने की साजिश भी रची गई थी। जिसकी जानकारी उत्तर कोरिया को मिल गई, अपनी हत्या हेतु साजिश की जानकारी होने के बाद बौखलाए उत्तर कोरिया ने अमेरिका को सबक सिखाने की ठान रखी है। ऐसे में यह जीत उत्तर कोरिया के पक्ष में मानी जा रही है। हालांकि अगर युद्ध हुआ तो अमेरिका से ज्यादा कोरियाई देशों को नुकसान उठाना पड़ेगा। ऐसे में तनाव को खत्म करना मून के लिए बड़ी चुनौती है।

हकीकत यह भी है कि दोनों कोरियाई देशों को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कोई अपनी स्पष्ट नीति नहीं है, लेकिन इस जीत से यह नजरिया भी कमजोर होता दिख रहा है, क्योंकि अमेरिका उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को रोकने की कोशिश कर रहा है और उसको वार्ता की बेंच पर लाना चाहता है, जो संभव नहीं है। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग अमेरिका की कूटनीति से पूरी तरह वाकिफ हैं। उत्तर कोरियाई शरणार्थी के बेटे मून के सामने दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना, भ्रष्टाचार का खात्मा करना और बेरोजगारी की समस्या से निपटना जैसी अनेकों चुनौतियां हैं। हाल ही के दिनों में दक्षिण कोरिया में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा है। पार्क गून-हे खुद भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हैं। इसके अलावा दक्षिण कोरिया एशिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसके सामने अब रोजगार पैदा करने की समस्या बढ़ी है। देश के 10 फीसदी युवा बेरोजगारी से जूझ रहे है। 1960 में दक्षिण कोरिया सबसे गरीब देश माना जाता था, लेकिन हाल ही में उसने काफी तरक्की की थी।

मून जे इन के प्रारंभिक जीवन पर एक नजर डालें तो उनका जीवन अनेकों समस्याओं से भरा हुआ था, जीवन के आरम्भ में ही उन्हें जेल की सलाखों के पीछे अपना जीवन गुजारना पड़ा था। गुन हे के पिता का विरोध करने की वजह से मून जे-इन को जेल में अपने दिन बिताने पड़े थे, परन्तु भ्रष्टाचार के आरोप में पार्क गुन हे जेल में बंद हैं और एक शरणार्थी के बेटे मून दक्षिण कोरियाई सत्ता के शिखर पर पहुंच गए हैं। मून की मां उन्हें पीठ पर बिठाकर गुजारे के लिए अंडे बेचा करती थीं और आज वो देश का नेतृत्व करने जा रहे हैं। कोरियाई युद्ध के समय मून के माता-पिता उत्तर से पलायन कर गए थे। 1953 में जब मून जे-इन का जन्म हुआ तब उनका परिवार दक्षिणी द्वीप जेओजे में रहता था। मून के पिता युद्धबंदियों के एक शिविर में काम करते थे, जबकि उनकी मां बंदरगाह नगर बुसान की सड़कों पर अंडे बेचा करती थीं, परन्तु संघर्ष परिश्रम एवं लगन ने सदैव मानव प्रजाति के भाग्य को बदला है। जिस व्यक्ति ने संघर्ष किया, उसका फल निश्चित उसे मिला, संघर्ष के समय समस्याएं तो आती हैं, परन्तु परिणाम आश्चर्य जनक होते हैं।

विश्व में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने समय के साथ संघर्ष किया और विश्व को एक नया इतिहास लिखने के लिए बाध्य कर दिया। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर जैसे अनेकों व्यक्तियों ने देश के इतिहास को बदल दिया और पुरानी परम्परा को उखाड़ फेंका। यही स्थिति आज के समय में दक्षिण कोरिया कि राजनीति में दिखाई दे रही है। जिसने पुरानी परम्पराओं को उखाड़ फेका तथा दक्षिण कोरिया की राजनीति को नई दिशा देते हुए एक नया इतिहास लिखने पर विवश एवं बाध्य कर दिया।

ज्ञात हो कि कोरिया, पूर्वी एशिया के मुख्य स्थल से संलग्न एक छोटा सा प्रायद्वीप है,जो पूर्व में जापान सागर तथा दक्षिण-पश्चिम में पीतसागर से घिरा है, उसके उत्तरपश्चिम में मंचूरिया तथा उत्तर में रूस की सीमाएँ हैं। यह प्रायद्वीप दो खंडों में बँटा हुआ है। उत्तरी कोरिया का क्षेत्रफल 1,21,000 वर्ग किलोमीटर है। इसकी राजधानी पियांगयांग है। दक्षिणी कोरिया का क्षेत्रफल 98,000 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ पर ई.पू. 1918 से 139 ई. तक कोर-यो वंश का राज्य था जिससे इस देश का नाम कोरिया पड़ा। चीन तथा जापान से इस देश का अधिक संपर्क रहा है। जापान निवासी इसे ‘चोसेन’ कहते रहे हैं, जिसका अर्थ है ‘सुबह की ताजगी का देश’। यह देश कई आक्रमणों से त्रस्त हुआ। कोरिया ने कई शताब्दियों तक राष्ट्रीय एकांतिकता की भावना को अपनाया। अनेकों शताब्दियों तक यह चीन का एक राज्य समझा जाता था। 1776 में इसने जापान के साथ संधि स्थापित किया। 1904-1905 में रूस एवं जापान युद्ध के पश्चात यह जापान का संरक्षित क्षेत्र बना। 22 अगस्त 1910 को यह जापान का अंग बना लिया गया। द्वितीय महायुद्ध के समय जब जापान ने आत्मसमर्पण किया तब 1945 में याल्टा संधि के अनुसार उत्तरी अक्षांश रेखा के द्वारा इस देश को दो भागों में विभाजित कर दिया गया। उत्तरी भाग पर रूस का और दक्षिणी भाग पर संयुक्त राज्य अमरीका का अधिकार स्थापित हुआ। इसके पश्चात अगस्त 1948 में दक्षिणी भाग में कोरिया गणतंत्र का तथा सितंबर 1948 में उत्तरी कोरिया में कोरियाई जनतंत्र की स्थापना हुई। जिसकी राजधानी सियोल और पियांगयांग बनाई गई। 1953 की पारस्परिक संधि के अनुसार 38 उत्तर अक्षांश को विभाजन रेखा मानकर इन्हें अब उत्तरी तथा दक्षिणी कोरिया कहा जाने लगा है।

पुरातत्व नतीजों से संकेत मिलता है कि वहाँ होमो सेपियन्स 400000 साल पहले कोरियाई प्रायद्वीप में बसे हुए थे। कोरिया की जलवायु उत्तरी चीन से मिलती जुलती है। लगभग संपूर्ण देश का तापमान नीचे चला जाता है। यहाँ मई जून में अधिकतम वर्षा होती है। दक्षिण कोरिया में अप्रैल में कुछ ही दिनों का वर्षाकाल का समय होता है जिससे यहाँ चावल की अत्यधिक फसल होती है। वर्षा का औसत 35 तथा ग्रीष्म का ताप 75 फारेनहाइट रहता है। उत्तरी पूर्वी भाग में सर्दी के समय में खूब तुषारपात होता है किंतु दक्षिण जिनसेन और सियोल के दक्षिण वाले भाग का तापमान शून्य से नीचे जाता है। अत: यहाँ नौ मास उपज काल रहता है। उत्तरपश्चिमी महाद्वीप की जलवायु मंचूरिया के निकटवर्ती मार्गों से मिलती जुलती है।

उत्तरी कोरिया खनिज पदार्थों में धनी है तथा यहाँ एंथ्रासाइट कोयला, कच्चा लोहा और सोना निकाला जाता है। यहाँ टंगस्टन भी प्राप्त होता है। उंसन और सुइअन यहाँ की मुख्य सोने की खानें है। कच्चा लोहा वांधाई और श्रेष्ठतम एंथ्रासाइट पियोप्यांग से निकलता है। यहाँ खनिज लौह का सुरक्षित भण्डार 10 करोड़ टन है। कोयले का उत्पादन 1.5 करोड़ टन है, जिसमें 60 लाख टन दक्षिण कोरिया से प्राप्त किया जाता है। इन खनिजों के अतिरिक्त कोरिया में जस्ता, सीसा और अभ्रक पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। उत्तरी कोरिया में मुख्य उद्योग सूती वस्त्र व्यवसाय, रेशमी वस्त्र, सीमेंट, कच्चा लोहा, रसायनक, जलविद्युत आदि हैं। यह क्षेत्र औद्योगीकरण के साथ साथ खाद्य पदार्थों के उत्पादन में भी आत्मनिर्भर है। दक्षिणी कोरिया में वस्त्रोद्योग, लोहा, सीमेंट आदि का विकास हुआ है। औद्योगिक नगरों में पुसान सिल्क के लिये, केंजिहो और इंचोन लौह इस्पात के लिये प्रसिद्ध हैं। देश की 95 प्रतिशत जलविद्युत शक्ति का उत्पादन उत्तरी कोरिया में होता है। उत्तरी कोरिया का लगमग 60 प्रतिशत विदेशी व्यापार रूस के साथ 30 प्रतिशत चीन के साथ और शेष व्यापार अन्य देशों के साथ होता है।

कोरिया प्रायद्वीप 1894 से ही जापानी दबदबे में आ गया था। 1910 में जापान ने उसे अपना हिस्सा बना लिया। 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मनी और जापान घनिष्ठ साथी थे। युद्ध में पानमुन्जोम के पास उत्तर कोरिया को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। मुख्य रूप से विजेता अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (आज के रूस) ने कोरिया को जापान से छीन कर उसका विभाजन कर दिया। कोरिया प्रायद्वीप पर यह विभाजन रेखा 38 अंश अक्षांश। इस अक्षांश के उत्तर का हिस्सा रूस और चीन की पसंद के अनुसार एक कम्युनिस्ट देश बना और बोलचाल की भाषा में उत्तर कोरिया कहलाया। दक्षिण का हिस्सा अमेरिका और उसके मित्र देशों की इच्छानुसार एक पूँजीवादी देश बना और दक्षिण कोरिया कहलाया।

दोनों कोरिया अपने-अपने शुभचिंतकों पर आश्रित थे और किसी हद तक केवल शतरंजी मोहरे थे। अमेरिका और रूस उन्हें आपस में लड़ा रहे थे एक तरफ रूस और चीन और दूसरी तरफ शक्तिशाली अमेरिका और उसके यूरोपीय साथी थे।  कोरिया युद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ की विधिवत अनुमति से चला पहला युद्ध था, जो तीन साल चला था और जिसने 35 लाख प्राणों की बलि दी गई थी। सोवियत संघ (रूस) और चीन के समर्थन के बल पर उत्तर कोरिया ने 1950 में साजिश का शिकार हुआ और उसने दक्षिण कोरिया को रौंद डाला, उस समय सुरक्षा परिषद की उस स्थायी सीट पर, जिस पर आज चीन बैठता है, उसका प्रबल विरोधी ताइवान बैठा करता था (ताइवान को हटा कर यह सीट चीन को 25 अक्टूबर 1971 को दी गयी थी)। चीन और सोवियत संघ की उस समय खूब बनती थी, इसलिए चीन के साथ एकजुटता दिखाने के चक्कर में सोवियत संघ सुरक्षा परिषद की बैठकों का बहिष्कार कर रहा था। बहिष्कार करने के कारण ही वह किसी अमेरिकी प्रस्ताव को गिराने के लिए अपने वीटो अधिकार का उपयोग भी नहीं कर सका।

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इसका भरपूर लाभ उठाया। कोरिया युद्ध शुरू होने के बाद एक विभाजन रेखा सुरक्षा परिषद ने वहां पर प्रस्ताव नंबर 85 पास करवा लिया, जिसके अधीन अमेरिका और उसके कई मित्र देशों को संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले कोरिया में अपने सैनिक भेजने का अधिकार मिल गया। भारत ने भी उस समय अपनी एक मेडिकल कोर कोरिया भेजी थी। सबसे अधिक सैनिक अमेरिका के थे। अमेरिकी सेनाओं के कंमाडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने उत्तर कोरिया और उसका साथ दे रहे देशों के जल्द ही छक्के छुड़ा दिये। पूरा दक्षिण कोरिया लगभग खाली करवा लिया, लेकिन जैसे ही संयुक्त राष्ट्र सैनिक चीनी सीमा के पास पहुँचे, चीन खुलकर लड़ाई में कूद पड़ा, हितैषी बताते हुए उसने लाखों लड़ाके मैदान में उतार दिये। संयुक्त राष्ट्र सैनिकों को पीछे हटना पड़ा, तब मैकआर्थर ने राष्ट्रपति ट्रूमैन से कहा कि उन्हें चीन पर परमाणु बम गिराने का अधिकार दिया जाये, परंतु ट्रूमैन यह हिम्मत नहीं कर पाये और ट्रूमैन की जगह जब ड्वाइट आइजनहावर राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने युद्धविराम का निर्णय किया और इस तरह 27 जुलाई 1953 को दोनों कोरिया की सीमा पर पानमुन्जोम में युद्धविराम का समझौता हुआ और लड़ाई रुकी। आज भी युद्धविराम ही है, युद्ध-स्थिति का विधिवत अंत नहीं हुआ है।

युद्धविराम होने तक 40 हजार संयुक्त राष्ट्र सैनिक, जो कि 90 प्रतिशत अमेरिकी सैनिक थे, मारे जा चुके थे। उत्तर कोरिया और उसके साथी देशों के संभवत: 10 लाख तक सैनिक मारे गये। मारे गये सैनिक एवं नागरिकों की संख्या 20 लाख आँकी जाती है। आज भी कई हजार अमेरिकी सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात हैं, ताकि उत्तर कोरिया अचानक फिर कोई आक्रमण करने का दुस्साहस न करे। दूसरी ओर, भारी आर्थिक कठिनाइयों और संभवत: आंशिक भुखमरी के बावजूद उत्तर कोरिया ने भी 12 लाख सैनिकों वाली भारत के बराबर की संसार की एक सबसे बड़ी सेना पाल रखी है। युद्धविराम के बाद से 240 किलोमीटर लंबा और चार किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र दोनों कोरिया को अलग करता है। तट पार पीत सागर में 38 अंश अक्षांश रेखा के समानांतर 200 किलोमीटर लंबी एक जलसीमा है, जिसे उत्तर कोरिया ने कभी स्वीकार नहीं किया। वहां दोनों की नौसेनाओं के बीच अक्सर झड़प हो जाती है। दोनों के बीच की सीमा सामान्य नागरिकों के लिए हमेशा से बंद रही। कोई डाक सेवा नहीं है, कोई टेलीफोन सेवा नहीं है। विभाजित जर्मनी वाले दिनों की तरह दोनों तरफ के लाखों परिवार छह दशकों से भटक रहे हैं। जर्मनी तो इस बीच एक हो गया, कोरिया का एकीकरण अभी भी एक दिवास्वप्न ही है।

ज्ञात हो कि ट्रंप के सत्ता में आने से विश्व की राजनीति को नई दिशा की ओर जाते हुए देखा जा रहा था, परन्तु अमेरिकी चुनाव के बाद फ्रांस तथा दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति चुनावों मे ट्रंप की विचारधारा पर पूर्णरूप से विराम लगता हुआ दिखाई दे रहा है। फ्रांस के उदारवादी नेता मैक्रों ने जिस तरह से अपने विरोधी उम्मीदवार को हराया, उससे विश्व की राजनीति में अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को एक बड़ा झटका लगा और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति चुनाव ने इसकी पूर्ण रूप से पुष्टि कर दी। दक्षिण कोरिया के चुने गए राष्ट्रपति के माता-पिता मूलत: उत्तर कोरिया के रहने वाले हैं, युद्ध के कारण उनके माता-पिता ने उत्तर कोरिया को त्यागकर दक्षिण कोरिया में शरण ले रखी थी, उन्हीं का बेटा मून आज दक्षिण कोरिया का राष्ट्रपति बन गया।

ज्ञात हो कि उत्तर कोरिया एवं दक्षिण कोरिया के मध्य विवाद चल रहा है, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सनक पूरे विश्व में एक बार फिर भयंकर युद्ध को दावत दे रही है, परन्तु उत्तर कोरिया के उभरे हुए नेता ‘मून’ ने बड़ी सूझ-बूझ का परिचय दिया। मून ने अपने कार्यकाल में सबसे पहले उत्तर कोरिया के तानाशाह से मिलने की योजना बताई है। यह एक बड़ा कदम है, जो सम्पूर्ण विश्व को युद्ध से बचा सकता है, दक्षिण कोरिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने उदारवादी रुख अपनाते हुए स्वयं इसकी पहल करने का एलान किया है।

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