इस्लाम की बेहतरीन समझ देता “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम”

दुनिया में इस्लाम को देखने और समझने के दो नजरिये मौजूद हैं, एक इस्लामिक और दूसरा गैर इस्लामिक। इस्लाम के दायरे में जीवन व्यतीत करने करने वाला व्यक्ति पूरी तरह से कुरान और पैगंबर मोहम्मद में यकीन करता है और अपने जीवन को इसी सांचे में ढालते हुये आखिरत की तैयारी करते हुये जन्नत का तलबगार होता है। दूसरी ओर एक गैर इस्लामिक व्यक्ति अपनी मुखतलब पृष्ठभूमि की वजह से इस्लाम पर मुखतलफ नजरिया रखता है। यदि यह नजरिया इस्लाम के स्थापित सत्य पर सवाल खड़ा करता है तो यकीनन इसे इस्लामिक जगत में मकबूलियत हासिल नहीं होती है, चाहे अपने पक्ष में वह तमाम तरह के तथ्य क्यों न जुटा ले। कुरान में ऐस लोगों के लिए जो इस्लाम में यकीन नहीं करते हैं काफिर, मुशरिक, मुन्कीर और मुनाफिकिन जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुये इस्लाम के दायरे में पनाह लेने वाले लोगों को सावधान किया गया है। एक मायने में कहा जा सकता है कि  इस्लाम की ताकत भी यही है और कमजोरी भी।

बी.बी. कुमार की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई पुस्तक “अंडरस्टैंडिग इस्लाम” (समझ इस्लाम) दूसरी श्रेणी में आती है। अपनी पुस्तक की भूमिका में खुद बी.बी कुमार भी इस बात को कबूल करते हैं कि उन्होंने इस्लाम को एक गैर इस्लामिक शख्स के तौर पर समझने और समझाने की कोशिश की है। यही वजह है कि वह न सिर्फ इस्लाम को समग्रता के साथ पेश करने में सफल हुये हैं बल्कि उन्होंने इस्लाम के उदय़ के पूर्व के अरब के समाज को भी पूरी मजबूती से उकेरा है, जिसे आमतौर पर इस्लाम में यकीन करने वाले लोग और विद्वान “दौर जाहलियत” (अंधकार युग) के नाम से जानते हैं। बी.बी. कुमार की पुस्तक समझ इस्लाम (अंडरस्टैंडिंग इस्लाम) में “दौर जाहलियत” की मंजरकशी करते हुये कहा गया है कि यह वाकई में अंधकार युग नहीं था। यह सही है कि उस समय का अरब समाज कबाइली हलकों में विभाजित था और लोग अपने कबाइली दस्तुरों के मुताबिक जीवन की सहूलियतों और आनंदों को हासिल करते हुये लंबी उम्र गुजारते थे। कबीलों के दस्तुर और नफिसियात मानवीय मुल्यों पर आधारित थे। इस्लाम के पूर्व अरब में अंधकार युग जैसी स्थिति नहीं थी।

इस पुस्तक में तफसील से बताया गया है कि अरब का कबाइली समाज एक उन्नत समाज था। मक्का के लोग दमिश्क और यमन के अलावा मिस्र और अबिसीनिया से व्यापारिक ताल्लुकात कायम किये हुये थे। उनका व्यापार पूरी तरह से सिंडिकेट व्यवस्था पर आधारित था, जिनका तर्जो अमल आज के मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह था। वहां के लोग बाहरी दुनिया से कतई अनभिज्ञ नहीं थे। यहां तक कि सिकंदर महान के अभियानों की चर्चा भी उनके बीच होती थी।

इस्लाम का आगाज के पहले मानवीय मुल्यों पर आधारित अरब के कबाइली समाज का मंजरकशी करते हुये बी.बी. कुमार पैगंबर मोहम्मद के सबसे बड़े दुश्मन अबू सूफियान की पत्नी हिन्द: का हवाला देते हुये बयां करते हैं कि बद्र के युद्ध में शिकस्त के बाद जब मक्का के लोग गुस्से से भरे हुये थे पैगंबर मोहम्मद की बेटी जैनब मक्का से मदीना रवाना हो रही थी। उस वक्त वह गर्भवती थी, एक शख्स हब्बार ने उसे ऊंट से गिरा दिया, जिससे उसका गर्भपात हो गया। हिन्द: खुद पैगंबर मोहम्मद से नफरत करती थी, लेकिन जब उसे जैनब के साथ घटी घटना के बारे में पता चला तो उसने हबार की मजाहमत करते हुये ये शब्द कहे, “शांति के समय तुम जंगली बन जाते हो और युद्ध के समय उन महिलाओं की तरह व्यवहार करते हो जिसे मासिक धर्म हो रखा हो।” जिस युग में ऐसी मानसिकता कायम हो, क्या उस युग को अंधकार युग कहा जा सकता है ?

इसके साथ ही अबू सुफियान के कुरैशी खेमे में एक पत्नी के तौर पर हिन्द : की मजबूत मौजूदगी, जो बद्र के युद्ध में मारे गये अपने परिजनों का बदला लेने के लिए उदह के युद्ध में अपने दुश्मन का कलेजा चबाने पर आमादा थी, इस बात की तस्दीक करती है कि इस्लाम के पूर्व अरब के कबाइली समाज में महिलाओं की स्थिति उस समय दुनिया के मुखतलफ हिस्सों में कायम सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और जंगी व्यवस्था  की तुलना में ज्यादा साजगार थी। अरब समाज में महिलाओं की स्थिति खासतौर पर मुखतलफ कबिलाओं के अंदरूनी बुनावट पर निर्भर थी। इस्लाम के नुमाइंदे इतिहासकार बार-बार इस बात पर जोड़ देते हैं कि “दौर जाहलियत” में लड़कियों की हत्या करने का आम रिवाज था, जबकि हकीकत में कई कबीलों में लड़कियों के जन्म पर खुलकर पूरे तामझाम के साथ खुशी का इजहार करने का चलन था। यहां तक कि महिलाएं युद्ध के मैदान में योद्धाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए युद्धगान भी गाती थीं।

इस्लाम के उदय के पूर्व अरब की जिंदगी में सात्विकता, त्याग, संयम और संयास की भी भावना मौजूद थी। इस पुस्तक में पैगंबरी के पूर्व खुद मोहम्मद के साथियों का हवाला देते हुये बताया गया है कि कैसे वे लोग महिला, मांस और नरम बिस्तर से दूर रहने का दम भरते थे। हालांकि आम लोगों के जीवन में गीत-संगीत और नृत्य का बोलबाला था। यहां तक कि एक आम आदमी भी बेहतरीन कविताएं रचता था। ऐसे में सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लाम के आगमन के पूर्व अरब के लोग एक खुशहाल और मुक्कमल  जिंदगी जी रहे थे।

इस पुस्तक में इस्लाम के पूर्व अरब के धार्मिक जीवन पर भी तथ्यपरक तरीके से रोशनी डाली गई है। उस समय मौजूद दुनिया की मुखतलफ सभ्यताओं की तरह अरब के लोग भी बहुदेववादी थे। मुखतलफ कबीलाओं के लोग बुतों की शक्ल में मुखतलफ देवी-देवताओं की पूजा व उपासना करते थे, वावजूद इसके अरब के सभी कबीला अल्लाह तआला को सर्वोपरि मानते थे। अल्लाह तआला के अलावा अन्य देवताओं हुबाल, वाद, सुवाह, यघुत, यायुब, नसर, अल-हुजा (अल्लात) को भी मकबूलित हासिल थीं। हुबाल बारिश का देवता था, जिसकी पूजा इंसान के शक्ल में की जाती थी। वाद भी इंसानी रूप में ही उनके बीच मौजूद था। सुवाह देवी थी। अल-हुजा, मन्नात और अल्लात का जिक्र कुरान में भी है, जिनके बारे में अरबों की धारणा थी कि वे अल्लाह की बेटियां हैं। कहा जा सकता है कि अरब की धार्मिक व्यवस्था भी उनके लिए पूरी तरह से साजगार थी। पैगंबरी के आलातरीन मुकाम पर फायज होने के बाद मोहम्मद ने एक नई व्यवस्था को कायम करने की दिशा में कदम उठाते हुये अरब के पुरातन सभी देवी-देवाताओं को खारिज करते हुए उन पर अल्लाह की मकबूलित कायम कर दी और इसे क्रांति का नाम दिया। अल्लाह की बशारत और रसूल मोहम्मद का यशोगान करते हुये इस्लामिक इतिहासकार भी इस्लाम के पूर्व अरब के स्थापित देवी-देवताओं को पूजने की रिवाज को पूरी तरह से “दौर जाहलियत” का हिस्सा मानते हैं। एक कुशल अन्वेषक की तरह बी.बी. कुमार अपनी पुस्तक अंडरस्टैंडिंग इस्लाम (समझ इस्लाम) में तथाकथित “दौर जाहलियत” के दौरान मौजूद उस रोशनी को पूरी मजबूती से नुमाया करते हैं जो मुखतलफ कबीलाओं में संगठित होने के बावजूद उन्हें एक सूत्र बांधे हुये थी।

इस्लाम की पुख्ता समझ देने के लिए पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में पैगंबर मोहम्मद के पूर्वजों का यमन से मक्का पलायन करने की कहानी को रोचक तरीके से पेश किया गया है। गैर इस्लामिक लोगों के जेहन में यही बसा हुआ है कि पैगंबर मोहम्मद के पूर्वज मूल रूप से मक्का और मदीना के निवासी थे। इस पुस्तक में बताया गया है कि पैगंबर मोहम्मद के पूवर्जों की पांचवी पीढ़ी यमन में रहती थी। यमन का ‘मारीब डैम’ के ध्वस्त हो जाने की वजह से पूरा इलाका उजाड़ हो गया। रोजी रोटी की तलाश में खेत-बारी छोड़कर पैगंबर मोहम्मद के पूवर्ज मक्का पहुंचे। काबा पर जुरहम कबीलों का आधिपत्य था। वे लोग तीर्थयात्रियों को अपनी शर्तों पर जियारत करने का अधिकार देते थे। बाद में किनान और खुजा कबीलों ने काबा पर अधिकार कर लिया और उन्हें मक्का से मार भगाया। वहां पर धीरे-धीरे कुरैशों का दबदबा कायम हो गया और पैगंबर मोहम्मद के पूर्वज किलाब वहां की व्यवस्था में अहम किरदार अदा करने लगे। पैगंबर मोहम्मद की पैंगबरी के वक्त मक्का पर कुरैशों का ही अधिपत्य था। बाद में पैगंबर मोहम्मद के परदादा हाशिम ने मक्का में मकबूलियत हासिल की।

हाशिम ने यथरीब (मदीना) में रहने वाले अम्र की बेटी सलमा से शादी की। इसके पहले सलमा की दो बार शादी हो चुकी थी। उसे एक बच्चा भी था। उसने हाशिम से इसी शर्त पर शादी की वह अपने मामले में किसी तरह की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करेगी। उसकी यह शर्त भी इस बात की तस्दीक करती है कि तथाकथित “दौर जाहलियत’ में महिलाओं की स्थिति कितनी मजबूत थी। बहरहाल, हाशिम से सलमा को एक बेटा प्राप्त हुआ जिसका नाम उसने शायबा रखा। यही बच्चा पैगंबर मोहम्मद के दादा अब्दुल मुत्तलिब था।

सलमा चाहती थी कि शायब यथरीब (मदीना) में रहे। जब उसके चाचा अल-मुत्तलिब उसे मक्का ले जाने के लिए आये तो उसने बच्चे को उनके साथ भेजने से साफ तौर पर इन्कार कर दिया। ताहम उन्होंने सलमा को समझाया कि अब बच्चा बड़ा हो रहा है। मक्का में काबा पर हमारे परिवार का दबदबा है। यदि बच्चा वहां रहेगा तो आगे चल कर परिवार के कारोबार में हाथ बटाएगा। चूंकि काबा अरबों का प्रमुख धार्मिक स्थल है, अरब के तमाम ओहदेदार वहां आते हैं। उन सब लोगों के साथ बच्चे का राब्ता होगा। उनकी बातों को सुनने के बाद सलमा बच्चे को उनके साथ भेजने के लिए तैयार हो गई।

मक्का में परवान चढ़ने के दौरान अबु मुत्तलिब की मुखालफत उसके परिवार के दूसरे सदस्य पुरजोर तरीके से कर रहे थे। हाशिम की बुलंदी उनके भतीजे ओम्मैया से देखी नहीं जा रही थी। बड़ा होने के साथ अब्दुल मुत्तलिब को यह बात समझ में आ गई थी कि यदि मक्का में काबा पर अधिकार बनाये रखना है तो परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। उसके दस बेटें और छह बेटिया थीं। पैगंबर मोहम्मद के पिता अब्दुलाह इन्हीं में से एक थे। पैगंबर मोहम्मद के परिवार को बेहतर तरीके से समझने के लिए इस पुस्तक में एक वंशावली भी दी गई है।

इस्लाम को अच्छी तरह से समझने के लिए जरूरी है कुरान और हदीसों को समझना। पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम”(समझ इस्लाम) में कुरान और हदीसों से ताल्लुक तमाम पहलुओं को बखूबी रखा गया है। कुरान में कुल 114 सूरा और कुल 6236 आयतें हैं। इनमें से 100 आयतें कर्मकांड, 70 आयतें पर्सनल लॉ, 70 आयतें सिविल लॉ, 30 आयतें पैनेल लॉ और 20 आयतें न्यायिक प्रक्रियाओं और गवाहियों से संबंधित हैं। यहां ध्यान देने योग्य है कि कुल 6236 आयतों में से 3900 आयतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काफिर, मुशरिक, मुन्कीर और मुनाफिकिन से ताल्लुक रखती हैं। ये सारे शब्द कुरान में गैर मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किए गए हैं, जो अपने समय में किसी न किसी रूप में इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद की मुखालफत किया करते थें। जिब्रायल के साथ पैगंबर मोहम्मद का पहली बार साबका होने की घटना को भी “अंडरस्टैंडिग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में उनकी पत्नी आयशा के हवाले से काफी रोचक तरीके से रखा गया है। कुरान में हर सूरा के साथ एक शीर्षक है अल-बकरा, आले इमरान, अन-निसा आदि।

तथाकथित “दौर जाहलियत” में अरब लोगों का कविता से काफी लगाव था। कविता उनकी जिंदगी के हर गोसे में बसी हुई थी। शायद यह तथाकथित “दौर जाहलियत” का ही असर है कि पूरा कुरान काव्यात्मक है। कुछ आयतें काफी बड़ी हैं तो कुछ महज एक पंक्ति की। कुरान की पूरी भाषा बशारत और खौफ की भाषा है। एक ओर उसमें सर्वोपरि अल्लाह का गुनगान करते हुये उनके द्वारा दी जाने वाली रहमतों का पूरी तफसीली के साथ वर्णन है तो दूसरी ओर उनकी नाफरमानी करने वाले लोगों के लिए आखिरत के बाद जहन्नुम का अजाब है। पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में तथ्यपरक तरीके से यह भी बताया गया है कि कुरान को लिपिबद्ध करने की जरूरत क्यों पड़ी। इस्लाम के आगाज के प्रारंभिक दौर में कुरान को जुबानी याद करने की रवायत थी। लेकिन जैसे-जैसे इस्लाम का विस्तार होता गया और इस्लाम के खाते में युद्धों की संख्या बढ़ती गई वैसे-वैसे कुरान को जुबानी याद करने वाले मुसलमानों की संख्या इन युद्दों में हलाक होने की वजह से कम होती गई। पूरे माशरे  पर यह खतरा मडराने लगा कि यदि ऐसे ही मुसलमान हलाक होते रहे तो कुरान को जुबानी याद करने वाले लोगों का एक दिन सफाया हो जाएगा, ताहम इन्हें लिपिबद्ध करना जरूरी है।

इस्लामिक जीवन पद्धति को अच्छे तरीक से अपनाने के लिए दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत हदीसों को माना जाता है। पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में हदीसों पर पूरा एक अध्याय लिखा गया है। हदीसों से खासतौर पर यह पता चलता है कि कुरान में वर्णित आयतें किस संदर्भ में हैं और उनका अवतरण कब हुआ था। इसके साथ ही हदीसों में पैगंबर मोहम्मद से संबंधित अमूमन हर पहलू पर चर्चा है। हदीसें मुख्य रूप से रवायतें हैं जिनमें पैगंबर मोहम्मद के करीब रहने वाले लोगों ने उन्हें मुखतलफ मौकों पर अपने तरीके से याद किया है।

हदीसों का मुख्य स्रोत पैगंबर मोहम्मद की पत्नी आयशा, अबू बक्र, उमर, अनास बी. मिलक आदि को माना जाता है। पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में हदीसों के संकलन प्रक्रिया की रोचक जानकारी भी दी गई है, जो निश्चिततौर पर इस्लाम को समझने की चाह रखने वाले लोगों के लिए काफी लाभदायक है। हदीसों की संख्या को लेकर इस्लामिक विद्वानों में मतभेद है। कहा  जाता है कि जब इनका संकलन करने की कवायद शुरु हुई तो तकरीबन विभिन्न स्रोतों से 6,00,000 से भी अधिक हदीस सामने आये। बड़ी मश्कत के बाद इन हदीसों की विश्वसनीयता को परखने के बाद संकलन में उन्हीं रवायतों का शामिल किया जिसकी तस्दीक कम से कम दो लोग करते थे। इस तरह संपादन के बाद तकरीबन 2000 हदीसों को संकलन में स्थान दिया गया। हदीसों का संकलन करने में इमाम मुस्लिम और अल-बुखारी ने अहम भूमिका निभाई है।

पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” (समझ इस्लाम) में इस्लाम के आगाज के बाद के हालतों पर भी व्यापाक रोशनी डाली गई है। यहूदियों और ईसाइयों के साथ इस्लाम के बनते बिगड़ते ताल्लुकातों पर भी पैनी नजर डाली गई है।

पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” दस अध्यायों में बंटा है। कुछ महत्वपूर्ण अध्याय इस प्रकार है:  पृष्ठभूमि, जिसमें इस्लाम के जन्मस्थल, इस्लाम के पूर्व  अरब के कबाइली हलकों की झलक, और पैगंबर मोहम्मद के पूर्वजों की सविस्तार चर्चा है, इस्लाम को समझने के स्रोत, जिसमें कुरान, हदीस, इस्लाम के प्रारंभिक इतिहासकार और उनके कार्य पर रोशनी डाली गई है, पैगंबरी के पहले का चरण, जिसमें पैगंबर मोहम्मद के जन्म और बचपन और उनके परिवार के बारे में बताया गया है, अवतरण, बुलावा और मक्का में धर्म प्रचार, जिसमें वह्य, मक्का काल के दौरान इस्लाम और प्रारंभिक मुसलमानों से रू-ब-रू कराया गया है, मदीन चरण, इस में पैगंबर मोहम्मद के मदीना हिजरत करने के पूर्व मदीना का समाज, हिजरत और हिजरत के बाद मदीना की स्थिति,पैगंबर और कवि और पैगंबर और कपटचारियों के बारे में तफसील से रोचक जानकारी दी गई है, तथा समाज, राजनिति और अर्थ, जिसमें इस्लामिक पहचान, इस्लाम के दायरे में महिलाएं, मुसलमानों के बीच अरब और कुरैशों का प्रभुत्व, इस्लामिक युद्ध में औजार के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल,  इस्लामिक अरब समाज का उद्भव और विकास, और इस्लामिक अर्थ व्यवस्था पर रोशनी डाली गई है।

इसके अलावा पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम” में प्रार्थना, जकात, हज्ज और इस्लामिक जिहाद के साथ-साथ इस्लाम की मजबूती और कमजोरियों को भी दर्शाया गया है। सहज अंग्रेजी भाषा में लिखी गई 435 पृष्ठों की यह पुस्तक निश्चिततौर पर इस्लाम को सही धरातल पर समझने में कारगर साबित होगी। बी.बी कुमार रसायन शास्त्र और मानव शास्त्र में एमएससी और पीएचडी करने के बाद शैक्षणिक हलकों में कई ऊंचे महकमों पर फायज रह चुके हैं।

पुस्तक समीक्षा

अंडरस्टैंडिंग इस्लाम

लेखक: बी.बी. कुमार

प्रकाशक: विमर्श. दिल्ली

मूल्य : Rs 325

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