शहनाई के शाहंशाह की सिसकती धरती

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

 आखिर क्यों नहीं याद आये उस्ताद किसी को। 21 अगस्त को आंखें टिकी रही सभी अखबारों और टेलिविजन चैनलों पर।

अखबार कहीं उनके लिये एक शब्द नहीं तो दूसरी ओर चैनल पर यशवंत प्रकरण हावी रहा । उस्ताद की शहनाई की गूंज पूरा देश सुनता था। उन्होंने शहनाई को एक मुकाम भी दिया लेकिन भूला दिये गये। वैसे भी भूलने की संस्कृति हमारी पूरानी रही है। लेकिन जरा सा हम उन्हे याद कर सकते हैं । क्योकिं उनकी जन्मभूमि पर भूमाफियाओं की नजर लग चुकी है। 

   

            उस्ताद जी के घर का अगला हिस्सा      

 दिल्ली से आ रहे हैं एक्सप्रेस ट्रेन से तो बक्सर उतर जाइए। अगर पटना के तरफ से जा रहे हैं तो डुमरांव स्टेशन पर उतर जाइए। यह डुमरांव है। वहीं डुमरांव जिसकी माटी ने एक ऐसे लाल को जन्म दिया जिसने तुरही को शहनाई के दर्द का मानक बनाते हुये देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उसे एक सम्मान दिलवाया। आज उनकी धरती पूरी तरह सिसक रही है। वो जबतक जीवित रहे कहते रहे कि जन्मभूमी का दर्जा स्वर्ग के बराबर होता है। अपने लोग तो उसी माटी में जन्में उनके गांव से मात्र आठ किलोमीटर डुमरांव प्रखंड के कचईनियां गांव में। डुमरांव पढ़ने आते थे । कभी लगा नहीं कि आजादी के साठ साल बाद भी गंदगी की ढेर पर बसा और राजनीतिक रुप से जातिवाद का मुख्य अड्डा बन चुका डुमरांव विधानसभा क्षेत्र शहनाई के शेर की धरती है। जब पता चला तो बहुत देर हो चुकी थी। डुमरांव में उनका पैतृक निवास उपेक्षित है। स्थानीय प्रशासन की उपेक्षा की वजह से भूमाफियों की नजर उनके आशियाने पर पड़ चुकी है। इतना ही नहीं उनकी धरती को यादगार बनाने के वादे बहुत हुए लेकिन अब तो सुनने में आ रहा है कि उनकी जन्भूमि का सौदा भी होने वाला है। हालाकि यह चर्च चंद बुद्दिजीवियों के डर का अफवाह भी हो सकती है लेकिन ऐसा हो ही गया तो क्या करेगी सरकार।

   

             उस्ताद जी घर                                                                                              

   अपने लोगों के एक दोस्त और स्थानीय स्तर पर सरोकार की पत्रकारिता करनेवाले एम  एम  श्रीवास्तव बताते हैं कि डुमरांव के एक अति गरीब परिवार में 21 मार्च 1916 को उस्ताद का जन्म हुआ था। उस्ताद के अब्बा जान पैग्बंर बख्स उर्फ बचई मिय़ां अपने कमरुद्दीन को बड़ा अधिकारी बनाना चाहते थे। अब्बा बक्सर जिले के  डुमरांव महाराज के दरबार में दरबारी वादक हुआ करते थे। वहां भी बच्ची मियां शहनाई ही बजाया करते थे। राजदरबार में कोई उत्सव हो और बच्ची मियां नहीं आयें भला कैसे हो सकता है। इसी माहौल में पले बढ़े कमरुद्दनी ने शहनाई के शेर बनने के वो गुर सीखे जिसने राष्ट्रीय पटल पर दर्द का एक ऐसा इतिहास लिखा जो आगे चलकर राषट्रपति भवन तक गूंजता रहा। लेकिन आज उनका अपना धर दर्शनीय स्थल बनने की वजाए उदास है। कोई ध्यान नहीं है। स्थानीय विधायक को जातिगत राजनीति से फुर्सत नहीं तो कोई समाजिक संस्था भी आगे नहीं बढ़ पाई।

राजदरबार

डुमरांव के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि उस्ताद बचपन में एक बार अपने मामा अली बख्स के साथ वाराणसी गये। उसके बाद उन्हे 14 साल की उम्र में पहली बार इलाहाबाद में बासुरी बजाने का मौका मिला फिर उस्ताद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मामू की मौत ने बीच में उस्ताद को एक पल के लिए विचलित किया लेकिन बाद में वो फिर संभले।

 उस्ताद ने भोजपूर की माटी को भी समृद्द किया और यही मटिया में भुलाईल हमार मोतिया हो रामा जैसी अनेक दर्द भरी रचनाएं उन्हीं की देन रही। आज भी उनकी धुन विश्व के कोने कोने में गूंज रही है। लेकिन कहीं न कहीं उनकी आत्मा अपने ही जन्मभूमि की हालत पर रो रही है। उस्ताद इसी महीने की 21 तारीख को 2006 में 2 बजकर 20 मिनट पर हमें अलविदा तो कह गये। लेकिन उनकी धुन आज भी डुमरांव की गलियों और राजधराने के बचे हुए हिस्से में गुंजती है जरूरत है सिर्फ उसे ध्यान से सुनने की।

आशुतोष कुमार पांडे

लेखक परिचय : आशुतोष कुमार पांडे जन सरोकारों से जुड़ी हुई पत्रकारिता के पैरोकार हैं। लंबे समय से पत्रकारिता की नब्ज को टटोल होते हुये धारदार तरीके से अपनी कलम चला रहे हैं।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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3 Responses to शहनाई के शाहंशाह की सिसकती धरती

  1. sudama prasad says:

    pandeyji aapkaa lekh padhaa. bahut achahha to nahi par na mama ki jagah kaanaa maamaa hai.
    aapne pahala foto jo dikhaayaa hai woh maharani ushaarani baalikaa vidyaalayaa kaa hai
    tisaraa fot bihariji ki mandir kaa hai kripyaa ise sudhaar lenge to achchha rahegaa.

  2. मुरली मनोहर श्रीवास्तव says:

    पांडेय जी आप बहुत अच्छे पत्रकार हैं…आप निरंतर आगे बढ़ें और इसी तरह लिखते रहें…लेकिन गलत सूचना से बचने की कोशिश करें…वो भी खासकर शहनाई नवाज पर जानकारी के मामले में…किसी से पुछ लेना बुराई नहीं…आपने इसमें कई गलतियां परोसी हैं…आगे से सुधार कर लिजिएगा…शेष सब छीक है…मुरली मनोहर श्रीवास्तव, पत्रकार सह लेखक, शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुस्तक

  3. हमने उस्ताद पर मुरली मनोहर श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक शहनाई वादक विस्मिल्लाह खान पढ़ी है। जो प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित है। आप अपने लेख को उन्नत करने के लिए उस किताब का सहारा ले सकते है। वैसे आपने उस्ताद के बारे अच्छा लिखा है।

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