सिर्फ नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी रचना ही नहीं है ‘दिमाग में घोंसले’

 

तेवरआनलाईन, कोलकाता,

पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज ने कथाकार विजय शर्मा के पहले उपन्यास दिमाग में घोंसले पर कल एक संगोष्ठी प्रसिद्ध आलोचक प्रो. रविभूषण की अध्यक्षता में वाई एम सी ए हॉल (चौरंगी) में आयोजित की | कार्यक्रम के आरम्भ में समाज के कार्यकारी अध्यक्ष राज मिठौलिया ने कथाकार विजय शर्मा को और समाज के उपाध्यक्ष महिंदर सिंह गिल ने प्रो.रविभूषण को फूलों का गुलदस्ता भेंट देकर स्वागत किया| शुरुआत में आलोचक श्री परशुराम ने आलेख पाठ करते हुए कहा कि इतिहास जहाँ मौन रहता है, वहाँ साहित्य लिखता है। नक्सलबाड़ी का आंदोलन एक सड़ी गली व्यवस्था को हटाकर नयी व्यवस्था स्थापित करने की लड़ाई थी। इस आन्दोलन में अन्तर्निहित कमजोरियां हो सकती है, पर यहाँ सतही जानकारी ही है। अंतर्कथा की असम्बंधता भी यहाँ दिखती है| उपन्यास में संकेत भरे पड़े हैं।

पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज के महासचिव डॉ. अशोक सिंह ने उपन्यास पर आलेख पाठ करते हुए कहा कि ‘दिमाग में घोंसले’ उपन्यास एक महत्वपूर्ण घटना के साक्षी होने की भूमिका का पालन करता है। इस उपन्यास में लेखक ने नक्सलवाद को मानवीय दृष्टि से देखने की चेष्टा की है । संभवतः किसी हिंदी उपन्यास में पहली बार बंगलादेश से आये लोगों की चर्चा है। बाहर से जो लोग कलकता आये उनकी पीड़ा भी यहाँ है। एक बड़े आन्दोलन की एक झलक भी कोई रचनाकार दिखता है तो वह बड़ी बात है।

कवि-आलोचक श्री प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा कि उपन्यास में देश-काल स्पष्ट नहीं हैं, ना ही प्रेम का कोई सपष्ट रूप है| इस उपन्यास में सारे विवाद है। विफलताओं का स्थापत्य इस उपन्यास में है। नक्सलबाड़ी आंदोलन प्रायोजित आंदोलन नहीं था। अगर वह आन्दोलन विफल है तो कहीं सफल भी है। उपन्यास में जीवन के यथार्थ को हासिल करने की कोशिश की गई है।

कवि श्री एकांत श्रीवास्तव ने कहा कि उपन्यास के रूप में एक मौलिक रचना सामने आई है। इसकी रचना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की चेष्टा के समान है, यह कथा साहित्य में एक प्रयोग के समान है, शिल्पगत प्रयोग तो है ही। कथा दृष्टि उलझी हुई प्रतीत होती है, लेखक की इस तकनीक से उपन्यास की रोचकता बढ़ी है। कई प्रसंग है, जो और विस्तार पा सकते थे, पर लेखक ने संकेत देकर उन्हें पाठकों पर छोड़ दिया है।  उपन्यास का चौथा खण्ड – वापसी का रास्ता और परिवर्तन चक्र उपन्यास का मुख्य भाग है । जो शायद बने नहीं पर बन रहें हैं- घोंसले उसके प्रतीक हैं। यह उपन्यास आदमी के ज़िंदा रहने की तकलीफ को सामने रखता है। यह एक नया प्रयास है जिसकी सराहना की जानी  चाहिये।

कवियत्री डॉ. नीलम सिंह ने कहा कि यह उपन्यास वर्तमान को अतीत से जोड़ता है। लगातार बदलते इतिहास का यहाँ चित्रण है। यह उपन्यास कलकत्ता की कहानी है और यथार्थ के धरातल पर है। लेखक ने विवादस्पद लेकिन प्रशंशनीय मुद्दे उठाये हैं| 

 कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला ने कहा कि संभवतः घोंसले घास पत्ते तिनके आदि से बने होते हैं, उनमे सृजन की आकांक्षा होती है। रोचकता की दृष्टि से यह एक अच्छा उपन्यास है। प्रेम डगर हो या जेल प्रसंग, रोचकता का आभाव कहीं नहीं है। रचनाकार खुद तय करता है कि कितना लिखा जाना चाहिये। कुछ पात्र और भी विकसित हो सकते थे पर यह रचनाकार का अपना चुनाव होता है। इसमें बाजारवाद के आतंक का संकेत भी है और ग्लोबलिजेसन कि और भी संकेत है। आज की राजनितिक परिस्थितियों में यह एक महत्वपूर्ण रचना है। उपन्यास का कथानक विश्वशनीय लगता है।

लेखक, कवि और टिप्पणीकार श्री प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि उपन्यासकार ने जो कुछ लिखा है बड़े सकारात्मक ढंग से लिखा है, उसकी नियत साफ़ है। जेल में खटमलों के खून से दीवारों पर बने निशानों की तुलना गाँवों में स्त्रियों द्वारा बनाये गये मंगलकामना के प्रतिक चिन्हों से करना, बहुत कुछ नया दिखाता है। तथ्यों को भले ही व्यवस्थित रूप से ना उठाया गया हो पर उनमे आपस में सम्बन्ध हैं। अंतिम भाग में बहुत सारे संकेत हैं । भविष्य में यह एक मेनिफेस्टो के रूप में अपनाया जायेगा। रचनात्मकता के लिए बंधे-बंधाए तरीको को छोडना पड़ता है, लेखक ने यही किया है। इसकी भाषा शैली हिंदी-उर्दू के मिलन बिंदु पर स्थित है।

संगोष्ठी कि अध्यक्षता करते हुए आलोचक प्रो.रविभूषण ने कहा कि हिंदी उपन्यास पर बात करने पर कई बातें उभरकर सामने आती है। प्रेमचंद ने अलग तरीके से लिखा, अज्ञेय ने भी अपने तरीके से लिखा। उपन्यास पढ़कर लगता है कि विजय शर्मा काफी चिंतन करने वाले और बहुत पढ़ने वाले व्यक्ति है। जिस उपन्यास में संस्कृत के आनंदवर्धन से लेकर आज के नेनो तकनीक तक का वर्णन है,इसमें नाम अधिक है, सूचनाएं भी हैं पर संकेत सबसे अधिक है। ब्रजराज की स्मृतियों के सहारे यह उपन्यास चलता है। इस उपन्यास में एक सर्वभारतीय चित्र उभरता है जिसे देखा जाना चाहिये। इसे सिर्फ नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी रचना ही नहीं मान लेन चाहिये, क्योंकि उसकी चर्चा मात्र दूसरे खण्ड में कुछ पृष्ठों तक सिमित है। जेल के जीवन पर भी अच्छा प्रकाश है। इसमें सांस्कृतिक स्तर को पहचानने की कोशिश की गई है। लेखक का शब्द और भाषा पर भी पूरा अधिकार है। इस उपन्यास में संकेत इतने अधिक हैं कि उसे और भी विकसित किया जा सकता था। वर्तमान से अतीत का रिश्ता उपन्यास बताता है। एक तरह से यह स्मृति बाहुल्य उपन्यास है, जिसमे यथार्थ भी है। स्मृति और यथार्थ का द्वन्द है यह उपन्यास। यह एक यात्रा उपन्यास है जो नक्सलबाड़ी से यात्रा करता हुआ आज के समय तक आता है। अंतः यह वर्तमान से विच्छिन्न उपान्यास नहीं है। यह एक मानसिक-राजनितिक यात्रा है । किसी सिमित मानक से देखने पर इसमें कमियां नज़र आ सकती हैं। इसमें कल्पना और यथार्थ भी है, रचाने का कौशल भी है जिसमे भाषा और शिल्प मुख्य है। यह लघुकाय उपन्यास है जो अधिक बातें समेटना चाहता है। इसमें असंख्य संकेत हैं ,इसका कलेवर छोटा पर कंटेन्ट बड़ा है। वैदिक  सभ्यता से लेकर लोकतंत्र और नौकरशाही तक सभी पर टिपण्णी है। यह उपन्यास पूरी तरह संभावनाओं से भरा हुआ है। इस पर और अधिक जमकर कार्य किया गया होता तो और भी अच्छा होता। कोई भी रचना मुकम्मल नहीं होती, बस प्रयास होते रहना चाहिये। कार्यक्रम का संयोजन केशव भट्टड़ और संचालन डॉ. अशोक सिंह ने किया।

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3 Responses to सिर्फ नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी रचना ही नहीं है ‘दिमाग में घोंसले’

  1. Hitendra Patel says:

    यह बहुत सुंदर रिपोर्ट है. यह पुस्तक के बारे में व्यक्त विचारों को जानने में सहायक है. मैं कार्यक्रम में उपस्थित न होकर भी सब कुछ जान गया. इसके लिए आप को धन्यवाद देता हूँ.

  2. JITENDRA says:

    KYA ISS KARYAKRAM MAIN LOG PRESENT NAHEE THE

  3. vijay sharma says:

    उत्तरआधुनिक टेक्स्ट क्या होता है,इसके लिये सास्यूर ,विटजेंन्सटाईन की शरण में जाने की जरूरत नहीं है। 20-25 बरसों के यारों के कमेंट पर ही नजर फेर लें। एक भी कमेंट ऐसा नहीं जिसके कई -कई अर्थ ना हों,जिसे समयानुसार ,सुविधानुसार गिटपिट ना किया जा सकता हो। चंद्रकांता के खत्री जी भोले दिखेगें ,इन करमजरूआओं के आगे। हर नमस्कार के पीछे ,खंजर खिंचा है,हर दीवार के पीछे एक दरवाजा।बुद्धि लगभग तिकडम-उखाड-पछाड हो गई है,सरकारी नौकरी वाले सुरक्षित रोजगार वाले तो डॉन कारलिओने बन गये हैं,अबे 40000हजार की पगार का इतना गरूर ,ऐसा इमपावरमेंट, तो फिर उसके क्या कहने जो 20-30-40 सालों से इससे दस गुना कमा रहा है।फिर तो गिलगिलिया जी देवता तुल्य हैं,जो आपको झुक कर नमस्कार करते हैं,आप तो एक साल ‘ए सी’की यात्रा करके बौरा गये,वो भी अपने पैसे पर नहीं…..

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