अभी चुनाव का नहीं, कोरोना से आम लोगों की सुरक्षा का समय है

पटना। एआइपीएफ की पहलकदमी पर वर्चुअल मीडिया जूम पर पटना के सिविल सोसाइटी का एक वेबिनार आयोजित हुआ। बेविनार का विषय था – कोविड संकट व समावेशी लोकतंत्र पर हमला, संदर्भ – बिहार विधानसभा चुनाव। वेबिनार का संचालन एआइपीएफ के पटना संयोजक गालिब ने की।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से पटना विवि इतिहास विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डेजी नारायण, दलित ह्यूमैन एक्टिविस्ट फादर जोस, चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता अफजल हुसैन, भाकपा-माले के पोलित ब्यूरो सदस्य धीरेन्द्र झा, वाटर एक्टिविस्ट रंजीव कुमार, एआइपीएफ के बिहार प्रभारी अभ्युदय, धर्मदेव पासवान आदि ने प्रमुखता से भाग लिया।

वेबिनार का संचालन करते हुए गालिब ने कहा कि आज जब बिहार में कोरोना महाविस्फोटक दौर में पहुंच गया है, ऐसी स्थिति में बिहार विधानसभा चुनाव कराने की बात कितना उचित है? क्या हम आम लोगों की जिंदगी की कीमत पर चुनाव कराने को परमिशन दे सकते हैं? जाहिर सी बात है कि यदि वर्चुअल तरीके से चुनाव हुआ, तो उसमें जनता की भागीदारी भी बहुत कम होगी।

प्रो. डेजी नारायण ने कहा कि हमारे देश का लोकतंत्र समावेशी चरित्र का रहा है। मतलब हमारा लोकतंत्र विभिन्न तबकों की विशिष्टताओं का ख्याल रखते हुए सबको समान अधिकार प्रदान करता है। लेकिन भाजपा-आरएसएस जैसी ताकतें इस अवधारणा पर लगातार हमला कर रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि कोरोना व लॉकडाउन ने बिहार और खासकर गरीबों-मजदूरों की कमर तोड़ दी है। बिहार सरकार से निराश होकर प्रवासी मजदूर काम की तलाश में फिर वापस लौट रहे हैं। इधर, राज्य में कोरोना बेकाबू हो गया है, लेकिन भाजपा-जदयू चुनाव कराने पर आमदा हैं। जनदबाव में चुनाव आयोग अब समीक्षा की बात कह रहा है। हम साफ तौर पर कहना चाहते हैं कि लाशों के ढेर पर हमें इस तरह का कटा-छंटा चुनाव मंजूर नहीं है। अभी बच्चों, महिलाओं, अशक्तों और समाज को बचाना सबसे जरूरी कार्यभार है।

ह्यूमैन एक्टिविस्ट फादर जोश ने कहा कि सत्ताधारी दल सरकारी तंत्र का दुरूपयोग कर रहे हैं। कोरोना से लड़ने की बजाए सरकार ने मशीनरी को चुनाव में लगा दिया है, जिसकी वजह से स्थिति गंभीर हो गई है। बिहार की आधी आबादी को दरकिनार कर चुनाव कराना असंवैधानिक होगा। इसी सरकार ने मार्च में पंचायतों के उपचुनाव को कोराना के नाम पर स्थगित कर दिया था, अब जब कोरोना वास्तव में संकट है, ये लोग चुनाव क्यों कराना चाह रहे हैं?

अफजल हुसैन ने कहा कि इस पूरे दौर में मीडिया की भूमिका बेहद नकरात्मक रही है। कोरोना के लिए मुसलमानों को दोषी बताया गया, लेकिन जब वे प्लाजमा दे रहे हैं, तो उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है। दलित-अल्पसंख्यक-कमजोर लोगों के हित में चुनाव को टाला जाना चाहिए। पोस्टल बैलेट से चुनाव की गोपनीयता भंग होगी। अपर सचिव तक के लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं, फिर भी सरकार को कुर्सी की ही चिंता ज्यादा सता रही है।

धीरेन्द्र झा ने कहा कि भाजपा-जदयू लगातार लोकतंत्र को संकुचित करने का काम कर रही हैं। चुनाव आयोग को न केवल राजनीतिक पार्टियों बल्कि सिविल सोसाइटी, चिकित्सकों, चुनाव के काम में लगने वाले शिक्षकों व कर्मचारियों से राय लेनी चाहिए। चुनाव में यदि जनभागीदारी नहीं होती है तो चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अभी चुनाव का कोई माहौल नहीं है। आगे कहा कि रसोइया कार्यकर्ताओं ने कोरोना काल में जी-जान से काम किया, लेकिन सरकार उन्हें मजदूरी नहीं देती। कई संक्रमित हो गईं, सरकार को उनसे कोई लेना-देना नहीं। आशाकर्मियों का भी वही हाल है। इसलिए चुनाव आयोग को व्यापक जनता से राय लेनी ही होगी।

नागेश आनंद ने बातचीत के दौरान कहा कि आज चुनाव आयोग खुद स्वतंत्र नहीं रह गया है। इस मसले पर हाइकोर्ट में पीआइएल दर्ज किया जाना चाहिए। पुनीत कुमार ने भी चर्चा में हिस्सा लिया।

अंत में वेबिनार में हुई चर्चा व सुझावों को लेकर एक ज्ञापन सिविल सोसाइटी की ओर से चुनाव आयोग को सौंपने का निर्णय हुआ।  वेबिनार में पटना ऐपवा की शशि यादव, समता राय, रवीन्द्र कुमार, राजीव रंजन सहित दर्जनों की तादाद में लोग शामिल हुए।

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