धूमते फिरते… ट्वेटी ट्वेंटी…मुस्कान और किलकारी

गांधी मैदान में एक दिन……………………..

 पहली तस्वीर………

राजधानी पटना का गांधी मैदान। मैदान के बीच का हिस्सा खाली। किनारे में भीड। कोई मूंगफली बेच रहा,कोई खरीद रहा,कोई आराम फरमा रहा। मैदान के उत्तर तरफ है राज्य का पुलिस हेडक्वार्टर। वहां ड्यूटी करने वाले कुछ पुलिसवाले मैदान के अंदर ताश खेल रहे हैं। हालाकि उनका कमान कार्यालय से सुरक्षा ड्यूटी के लिये कटा है। चारों ओर चिल्ल पों की स्थिति। कहीं तोता पंडित, कहीं जूस और सिगरेटवाला। सब कुछ चल रहा है। हाल में जिला प्रशासन की सख्ती की वजह से मैदान में अपनी हिस्सेदारी समझनेवाले केवल जानवर नहीं दिख रहे हैं……………………।
थोडा सा पास जाने पर पता चला कि पुलिसवाले ….दहलपास और ट्वेटी ट्वेंटी खेल रहे हैं। उनके खेलने के स्थान से मात्र थोडी दूर पर एक विधवा मां अपनी 14 साल की बेटी के साथ मैदान के जमीन में चूल्हा बनाकर रिक्सेवालों के लिये होटल चलाती है। ग्राहकों को सम्हालनें के दौरान विधवा की बेटी यानि वहां काम करनेवाली लड़की पुलिसवालों के मुख्य केंद्र में है। उम्र में एक पुलिसवाले की बेटी जैसी दिखनेवाली होटल की लड़की। बेचारे कह रहे हैं……क्या बात है सिंह जी….आज एको बार छोकरियां हमलोगों तरफ मुंह करके बरतन नहीं धो रही है। हसंते हुए सिंह जी….काहे आज सुबह से एकोबार ओकरा चु……ईईई के दर्शन ना भईल ह का। रोज खाली दर्शने होई कि कहियो मिलबों करी…………एकरा खातीर त रात में ताश के बैठकी लगावेके परी।

दूसरी…तस्वीर……………………..
मैदान में और जरा पश्चिम की ओर बढ़ने पर। एक साथ दिखे दो मासूम। उम्र दोनों की 7 साल। पैरों में चप्पल नहीं। नाक साफ नहीं। फटे हुये पैंट। दोनों के हाथ में एक मैलाकुचैला झोला। पूरी तरह गंदा। दोनों एक साथ झोला के एक..एक टांगना को थामकर चल रहे हैं। लेकिन दोनों की नजरें नीची हैं। हर आने जाने वाले के पैरों की तरफ नजरें हैं। उनके आस..पास हम होके गुजर रहे हैं। दोनों में से एक डरते सहमते बोलता है……..सर जूता पालिस कर दें। हम अच्छा से कर देंगें । पैसे भी कम लेते हैं।
हमारी चुप्पी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देती है। दोनों एक साथ झोला जमीन पर रखते हैं। उस झोले से निकलती है……एक पालिस की डिबिया और एक टूटा हुआ ब्रस।
एक लड़का एक पैर का जूता पालिश कर रहा है। अपनी नजरें जरा नीचे जाती है। जूते की तरफ। जहां एक छोटा सा बिल्कुल कोमल हाथ। जैसा और भी बच्चों का होता है। कान्वेंट ,प्ले स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों की तरह। मेरे भईया के प्यारे से बेटे दिपू के हाथों की तरह। वैसा ही कोमल, जिसे कभी कभी हम प्यार से अपने मुंह में ले लेते हैं।
तबतक पहला जूता कंपलिट हो चुका था। हम तो किसी दूसरी दुनियां में खो चुके थे। हमें याद आ रहा था राज्य सरकार का वह समारोह जिसमें मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा बड़े ही तामझाम से ऐसे ही बच्चों के लिये किलकारी और मुस्कान योजना की शुरुआत हुई थी। जिसके तहत ऐसे बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के आलावा उनके लिए बहुत कुछ किये जाने की बात थी। बडी.-बडी. घोषणायें हुई थी। लेकिन अब लग रहा है कि घोषणा की एक अलग परिभाषा भी होती है।
एकझटके से पूरे उल्लास के साथ लगा बहुत बड़ी सफलता मिली हो। किसी ने उंगली पकड़कर झकझोरा।

“सर…हो गया। अं………। सर दो रुपये दिजिए।”

हमने कहा,  “ये लिजिये दो रुपये। लेकिन दोनों लोग आईये एक-एक बिस्कुट खाते हैं। अब अपना नाम बताईए।”

“जी सर मेरा नाम राज…..और ये मेरा दोस्त अरबाज।” दोनों ही बिस्कुट खा रहें हैं। बातचीत में पता चला कि राज की मां गांधी मैदान में रहती है….और हाथों पर मोजा (साक्स) रखकर बेचती है। दो दिन पहले उसका हाथ जल गया है। मां ने ही कहा है मैदान में जूते पालिश करो। किसी ने जले हुये हाथ देखकर राज की मां को एक पर्ची लिखकर थमाई है……..जिसे राज दिखा रहा था। उसपर एक मलहम का नाम लिखा हुआ था। मलहम खरीदना भी था और पेट पूजा भी करना था। इसलिये दोनों जूता पालिश करने निकले थे।

हम आसमान की ओर देख रहे थे…सरकार की मुस्कान और किलकारी योजना इन जैसे बच्चों के चेहरे पर कब मुस्कुराहट लाएगी…....हमारी निगाहें फिर ढूंढ रही थी..कोई और तस्वीर।

परिचय : आशुतोष कुमार पांडे -

 जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता के पैरोकार हैं, और इसी तर्ज पर लंबे समय से अपनी लेखनी की धमक बिखेर रहे हैं।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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4 Responses to धूमते फिरते… ट्वेटी ट्वेंटी…मुस्कान और किलकारी

  1. aman soni says:

    no words for this story……………..best and extra best ………real picture of one part in gandhi maidan patna ……….well don ashutosh

  2. rani bibha says:

    abb tak kisi blog yaa internet par iss trha ki jamin se juri baat padhnne ko nahi mili thi. Lekhak ko usske iss imandar pryass ke liye tahe dil se badhi tto de ja saktti hai.Rani

  3. anjali says:

    pandey jee
    aapki kalam ki daad deni paregi .Jisne samaj ki itni sahi tasweer pesh karne ki himmat dikhai.

  4. Hey mate, thanks for sharing but this page doesn’t format correctly in Chrome it is doubled up.

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