सपनों के पंख से गीतकार मंथन की कच्ची उम्र में मुंबई उड़ान (भाग 1)

जूलियस सीजर ने अपने सैनिक अधिकारियों को इंग्लैंड के तट पर उतारने के बाद उन्हें अपने सभी जंगी जहाजों को जलाने का आदेश दिया था। उसके हुक्म पर अमल करने के बाद जब सारे सैनिक एक जगह एकत्र हुये तो सीजर ने उन्हें संबोधित करते हुये कहा, आगे इंग्लैंड है और पीछे मौत। अब तय कर लो तु्म्हें क्या चाहिये। एक स्वर से सभी सैनिक चिल्लाते रहे, इंग्लैंड ! इंग्लैंड ! और फिर देखते ही देखते इंग्लैंड को फतह कर लिया गया। 17 साल की कच्ची उम्र में आज से करीब 12 साल पहले मुंबई में मंथन की इंट्री कुछ इसी अंदाज में हुई थी। अपने पीछे वो सबकुछ छोड़ कर आये थे, यह निश्चय करके की अब वापस नहीं लौटना है, चाहे कुछ भी हो जाये। एक रात अपने घर वालों से बिना कुछ कहे वह चुपके से मुंबई की ट्रेन पर बैठ गये। घर के माहौल को लेकर जेहन में कड़वाहट भरी हुई थी, और आंखों में कुछ धुंधले से सपने तैर रहे थे, कुछ कर दिखाने के सपने, कुछ पाने के सपने, लेकिन इन सपनों को जमीन पर उतारना आसान नहीं था। मायानगरी में कदम रखते ही उन्हें इस बात का तुरंत अहसास हो गया कि जो कुछ वह पाना चाहते हैं, उसके लिए उन्हें नाको चने चबाने पड़ेंगे, सफलता पाने का यहां कोई शार्ट-कर्ट रास्ता नहीं है, खासकर उस स्थिति में जब मध्यम परिवार से हैं और आपके सिर पर किसी गाडफादर का हाथ नहीं है। ऐसी स्थिति में सिर्फ अपने आप पर यकीन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। मंथन को खुद पर पूरा यकीन था।       

मथुरा में घर का माहौल पूरी तरह से किसानी था, इनके पिता जी फौज में थे, और परिवार के सदस्यों को बहुत हद तक फौजी अंदाज में पाला पोसा था। वह चाहते थे कि मंथन भी अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कोई फौजी ओहदा अख्तियार करें और उनके रुतबे को बढ़ाये, लेकिन इनका मन शुरु से कविताओं और गजलों में रमा रहता था। कालेज में एक बेहतर कवि के रुप में इनकी पहचान बहुत पहले ही बन गई थी और इसके बाद वह अपने शहर के साथ-साथ दूसरे राज्यों में होने वाले कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करने लगे थे। स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में भी इनकी ज्वलंत कविताओं और गजलों ने अपनी धाक जमा ली थी। बड़े-बड़े प्रोफेसर और कवि इन्हें हमउम्र मानने लगे थे, और शेरो शायरी की नजाकत पर राय शुमारी तक करने लगे थे। बहुत सारे प्रोफेसरों ने इनकी लिखने की अदाकारी को अपने तरीके से तराशा भी, और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी किया। एक बेहतर शायर की संभावना से यह पूरी तरह से भरे हुये थे। लिखना और पढ़ना, पढ़ना और लिखना इनकी आदत सी बन गई थी।    

इसके बावजूद घर वालों को यही लग रहा था कि उनका बेटा एक फौजी ही बने। गांव- जवार में एक फौजी को सम्मान से देखा जाता था। फौज की अच्छी नौकरी का मतलब था अपने कुटुम में मान सम्मान के साथ-साथ दान-दहेज के साथ एक सुंदर सी लड़की के मिलने की पूरी गारंटी। अपने घर वालों, खासकर अपने पिता, के कहने पर इन्होंने फौज में जाने की पूरी तैयारी भी कर ली थी, लेकिन प्रकृति को यह मंजूर नहीं था।       इसी बीच इनके एक आंख में कुछ खराबी आ गई, और यह फौज के लिए अनफिट घोषित कर दिये गये तो घर वालों ने किसी अन्य क्षेत्र में नौकरी करने की सलाह दी। कुर्सी पर बैठकर बाबूगिरी करने से इनका रुह कांपता था, इनके दिल और दिमाग में तो फैज, गालिब, नीरज, रसखान, कबीर, आदि की पंक्तियां गूंजती रहती थी, और अपने इर्दगिर्द के वातावरण को अपनी खुद की पंक्तियों में ढालते थे, कभी रोषपूर्ण तरीके से, तो कभी-कभी कोमलता के साथ। कुल मिलाकर शब्दों को छंदबद्ध करने का नशा उन्हें हो चला था, और दूसरों की गजलों के साथ खुद के लिखे गजलों को भी गुनगुना उन्हें अच्छा लगता था।    

अख्खड़ स्वाभाव के फौजी पिता जी गुस्से में बहुत कुछ कह जाते थे, हालांकि दिल से उन्हें प्यार भी करते थे। हर फौजी पिता की तरह उनका यही सपना था कि उनका बेटा उनके नक्शे कदम पर आगे बढ़े। घर में बड़ा बेटा होने के कारण बार-बार इन्हें इनकी जिम्मेदारी का अहसास करता थे, जबकि मां खामोश रहती थी। लेकिन मन से यही चाहती थी कि मंथन वही काम करे जो उन्हें रुचता हो। एक दिन पिता जी ने कहा कि मुफ्त में घर में रोटी तोड़ते रहते हो, बेहतर होता कुछ कमाने की जुगत करते। यह बात सीधे तीर की तरह उनके दिल को छेदते हुये निकल गई, और फिर अचानक घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। आधी रात को एक बैग में सामान बांधा और चुपके से रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़े। उन्हें यह भी पता नहीं था कि मथुरा से सीधे मुंबई की ट्रेन चलती है या नहीं। मथुरा से वह दिल्ली गये, और वहां से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ा, जो मथुरा होते हुये निकली। और एक बार फिर मथुरा को अपनी आंखों के सामने देखते हुये उन्हें पकड़े जाने के डर का अहसास हुआ और वह ट्रेन में ही दुबक गये। इसके बाद जब ट्रेन मथुरा से आगे बढ़ी तो इनके दिमाग में बस दो ही बात ही घूम रही थी, अब वापसी के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, और उनका मुकाम सिर्फ मुंबई ही हो सकता है, सिर्फ मुंबई, जहां उनके गीत और गजल को एक नया आयाम मिलेगा।

मुंबई में कदम रखते ही संयोग से मंथन की मुलाकात एक सरदार से हो गई, जो यह भांप गया कि यह लड़का घर से भागकर आया है। मुंबई मंथन के लिए एक नया शहर था, सरदार के कहने पर वह उसके साथ हो लिये और उन्हें सरदार की खोली में जगह मिल गई। वह सरदार एक बावर्ची था, और मुंबई के बड़े-बड़े लोगों की होने वाली पार्टियों में खाना बनाने का काम करता था। स्वभाव से सीधा, सहज और सरल था, लेकिन रात में शराब पीने के बाद  जो सामने पड़ जाये उसे ही गालियां निकालने लगता था, जो मंथन को चुभता था।     

मुंबई में फाकामस्ती में कुछ महीने ऐसे ही कटे, रहने के लिए एक गंदा सा चाल मिल गया था, जिसमें सारी व्यवस्थाएं पारंपरिक चालों वाली थी। मसलन, लाइन में लगकर ट्टटी-पेसाब करना, पानी लेना आदि। इस चाल के बगल में एक नाला था, जिसमें से लगातार दुर्गंध आती थी। उस सरदार का राज बब्बर के घर आना जाना था, और मंथन बार-बार उससे यही कहते थे कि उसे कहीं अच्छी जगह पर रखवा दे, वह बी.ए. पास है, लिखना-पढ़ना आता है, कोई भी काम कर लेगा। एक दिन सरदार मंथन को राज बब्बर के घर पर ले गया, जहां पर इनकी मुलाकात राज बब्बर के सेक्रेटरी एच.पी. पाटिल से हुई। एच. पी. पाटिल ने इन्हें बताया कि नादिरा बब्बर को एक पर्सनल असिस्टेंट की जरूरत है।  उन दिनों नादिरा बब्बर रंगमंच की दुनिया में जोरदार तरीके से सक्रीय थी। मुंबई के थियेटर जगत में उनकी धमक थी और एक मजबूत टीम को वह लीड कर रही थी। मंथन को उन्होंने अपने पर्सनल कार्य के लिए रख लिया, जिसमें कई तरह के कार्य शामिल थे, मसलन, स्क्रीप्ट पर उनके साथ काम करना, नाटकों के डायलाग को ठीक करना, नादिरा बब्बर की ओर से थियेटर जगत से संबंधित लोगों को पत्र लिखना और कभी-कभी स्टेज के पीछे से कलाकारों को प्राम्ट करना। नादिरा बब्बर ने उनके रहने सहने की व्यवस्था भी अपने यहां कर दी थी, यहां तक की खाने-पीने का भी। यहीं पर उनकी मुलाकात राज बब्बर से हुई, और एक बेहतरीन इनसान के रूप में राज बब्बर आज भी उनके जेहन में सुरक्षित स्थान बनाये हुये हैं। वैसे तो राज बब्बर उन दिनों का काफी व्यस्त रहते थे, लेकिन जब कभी घर पर उनसे मिलने का अवसर मिलता वह मंथन के साथ बहुत ही आत्मीय रूप से पेश आते थे, उन्हें अपने घर का एक सदस्य मानते थे। यह जानने के बाद कि मंथन मथुरा के रहने वाले हैं, उनकी मंथन के प्रति उनकी आत्मीयता कुछ और बढ़ गई थी। यहां तक की फोन पर मंथन के पिता जी से भी अक्सर उनका हाल चाल पूछते रहते थे, और अपनी ओर से मंथन के प्रति उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त करते थे। घर वालों को भी यह सुकून हो चला था कि मंथन सही जगह पर पहुंच गये हैं, कम से कम खुद की रोटी तो कमाने ही लगे हैं, साथ ही अपनी मनचाही दुनिया में भी काम कर रहे हैं, जिसमें दूर तक जाने की पूरी संभावना है।

मंथन को राज बब्बर के घर का लाइब्रेरी बेहद पसंद था, वह अक्सर वहीं बैठकर किताबों को उलटते-पलटते रहते थे। इन्हीं किताबों के बीच उन्हें राज बब्बर की खुद की लिखी हुई एक डायरी भी मिली थी, जिसमें राज बब्बर ने अपने संघर्ष के दिनों को बहुत ही भावनात्मक तरीके से दर्ज किया था। मंथन बताते हैं कि उस डायरी को पढ़ने के बाद यही लगता था कि राज बब्बर न सिर्फ उम्दा कलाकार हैं, बल्कि उनकी लेखनी भी चीजों को मजबूती से उकेरने में पूरी तरह से समक्ष है, उनके एक बेहतर इनसान होने में कहीं कोई सुबा ही नहीं है।    

राज बब्बर के यहां आने के बाद मंथन को जुहू में घूमने का पूरा अवसर मिलता था, पृथ्वी थियेटर में इनका आना जाना शुरु हो गया था। फिल्म से जुड़े लोगों के बीच भी उठने-बैठने तौर-तरीके सीख गये। इसी क्रम में इनकी मुलाकात अक्षय कुमार के सेक्रेटरी विकास बाली से हुई, जिनका धमेंद्र के घर में आना जाना था। विकास बाली भी मंथन की बातों से काफी प्रभावित हुये और उम्र में बड़ा होने के बावजूद मंथन के साथ एक दोस्त की तरह व्यवहार करने लगे। अक्षय कुमार को उन दिनों अधितर बी क्लास की फिल्में मिल रही थी, लेकिन विकास बाली के उनसे जुड़ने के बाद मुंबई में बनने वाली अधिकतर ए ग्रेड की फिल्में अक्षय कुमार के खाते में आने लगी थी। विकास बाली का साथ मिलने पर मंथन को यह समझने का अवसर मिला कि कैसे फिल्में पाने के लिए लाबीबाजी होती है, और इस लाबीबाजी में एक सेक्रेटरी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। विकास बाली ने मंथन को यकीन दिलाया कि बहुत ही जल्द उन्हें कोई बड़ी फिल्म की गीत लिखने के लिए दिला देंगे। लेकिन जल्द ही विकास बाली की मौत हो गई, और मंथन का रास्ता थोड़ी देर के लिए थम सा गया।

नादिरा बब्बर के यहां लगातार दो साल तक रहने के बाद इन्हें अहसास हुया कि जो कुछ वह मुंबई में पाना चाह रहे हैं, वह यहां रहकर संभव नहीं है, हालांकि नादिरा बब्बर की ओर से इन्हें कोई परेशानी थी। महीने में चार-पांच हजार रुपये इन्हें मिल जाते थे, ऊपर से खाने-पीने रहने सहने का इंतजाम अलग से था। इसके बावजूद वहां रहकर इन्हें अपनी मंजिल मिलती नहीं दिखाई दे रही थी। अंतत: इन्होंने नादिरा बब्बर से अलग होने का कठोर फैसला किया, हालांकि जाने के पहले नादिरा बब्बर ने इन्हें कहा कि किसी भी तरह की परेशानी की स्थिति में वह दोबारा यहां आ सकता है, लेकिन अपने धुन के पक्के मंथन को पीछे लौटना कभी मंजूर नहीं रहा- एक बार निकल गये, तो समझो निकल गये।                 

 अगले अंक में जारी रहेगा….          

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