सपनों के पंख के सहारे गीतकार मंथन की कच्ची उम्र में मुंबई उड़ान ( भाग 2)

 

जिन लोगों को पता होता है कि उनकी मंजिल कहां है वो सिर्फ अपनी मंजिल की ओर बढ़ना ही जानते हैं, राह में आने वाली मुश्किलों की परवाह नहीं करते। राज बब्बर का घर छोड़ने के बाद मुंबई में मंथन का रास्ता आसान नहीं था। हर कदम पर परेशानियां थी, संर्घष थे। रहने के लिए ठिकाना चाहिए था, साथ ही रोजी रोटी की व्यवस्था भी करनी थी। कुछ पैसे बैंक में जमा थे, लेकिन मुंबई में पैसे हवा की तरह उड़ते हैं। हर काम के लिए वहां पर पैसा चाहिए। सबसे पहले उन्होंने लोखंडवाला में अपने लिए पेइंग गेस्ट के तौर पर रहने की व्यवस्था की, और फिर नये अंदाज में मुंबई से रू-ब-रू होने लगे।

बड़ी फिल्मों के निर्माता-निर्देश अपनी फिल्मों के गीत के लिए पुराने गीतकारों पर ही भरोसा करते थे, नये गीतकारों पर रिस्क लेना वे नहीं चाहते थे। मंथन जहां कहीं भी जाते थे तो उन्हें मुंबई की दस्तुर के मुताबिक साफतौर पर ना तो नहीं कहा जाता था, लेकिन काम भी नहीं मिलता था, और लगातार उन्हें यह यकीन दिलाया जाता था कि बस उन्हें काम मिलने ही वाला है। यह मुंबई का चलन है कि कभी आपको ना नहीं कहा जाएगा, पता नहीं कल कौन आसमान में चमकने लगे। बहरहाल मंथन के अच्छे खासे दिन इसी चक्कर में निकलते रहे, समय हाथ से फिसलता रहा, और कोई नतीजा भी नहीं दिख रहा था। इस बीच कुछ दोस्तों ने उन्हें सलाह दी कि फिल्मों के बजाय वह सीरियलों के लिए ट्राई करें। चूंकि बैंक में जमा पैसे भी खत्म होने के कगार पर थे, और मुंबई में जमे रहने के लिए पैसों की पग-पग पर जरूरी थी। अत: मंथन ने धारावाहिकों के लिए प्रयास करना शुरु किया। लेकिन यहां भी भीड़ थी। बहुत बड़ी संख्या में लोग धारावाहिकों में भी जुटे हुये थे। यहां भी काम मिलना आसान नहीं था। काम के लिए मारा-मारी थी। लेकिन थोड़ा बहुत प्रयास करने के बाद मंथन की प्रतिभा की धमक यहां बिखरने लगी। एक के बाद एक कई धारावाहिक मिलते चले गये। आने वाला पल, जमीन, आ गले लग जा, जिंदगी एक सफर, फूल और पत्थर, चाहत, जजबात, शाहीन, मुझे मेरे साले से बचाओ, क्या दिल ने कहा जैसे धारावाहिकों में मंथन के गीतों ने आकार लिया और अपने आप में उनका कांफिडेंस बढ़ता चला गया, साथ ही पैसे भी आने मिलने लगे थे। हालांकि अपने गीतों के लिए पैसा हासिल करने के लिए इन्हें काफी मेहनत करना पड़ता था। गीतकारों के प्रति फिल्म प्रोड्यूसरों का रवैया ठीक नहीं था। अधिकतर प्रोड्यूसरों को तो यही लगता था कि एक कागज पर चंद शब्द उकेरने के कीमत ही कितने होंगे। जिसको जितना बनता था थमा देता था। वैसे मंथन बहुत पहले ही राइटर एसोसिएसन के सदस्य हो गये थे, लेकिन व्यवहारिकतौर पर उन्हें पता था कि यदि फिल्मों में काम पाना है तो एसोसिएशन की धौंसपट्टी को छोड़कर ही चलना होगा। औने-पौने दाम पर वह गीत लिखते रहे, और जो मिलता गया लेते गये। लेकिन साथ ही इस ट्रेड का सीक्रेट भी सिखते गये। अपने अनुभव से उन्होंने भांप लिया कि यहां पर लोगों को अपनी कीमत खुद तय करनी होती है। और फिर मंथन अपनी गीतों की कीमत खुद तय करने लगे। इन्होंने निश्चय किया कि चाहे कुछ भी हो जाये एक गीत की कीमत पांच हजार रुपये से कम नहीं लेंगे। और सख्ती से इस निर्णय पर वह अमल भी करने लगे। शुरु में तो कुछ परेशानी हुई, लेकिन फिर लोगों को पता चल गया कि मंथन को बुलाने का मतलब है उनका फिक्स एमाउंट देना। एक रेपो उनका बनता चला गया।

 यह आम धारना है कि मुंबई में कोई किसी का नहीं होता, सब पैसे के पीछे भागते रहते हैं। लेकिन सर्वमान्य नियम यही है कि अच्छे लोगों को सारी दुनिया अच्छी लगती है और उन्हें सभी जगह अच्छे दोस्त भी मिल जाते हैं। मुंबई में मंथन के दोस्तों की भी संख्या बढ़ते चली गई, जो हर परिस्थिति में मंथन का साथ निभाते थे, और मंथन भी हर मौके पर उनका साथ देते थे। मुंबई जैसे बड़े शहर में सच्ची दोस्ती वाकई में सुकून देने वाली होती है, और आपका सर्किल जितना बड़ा होता है, काम मिलने में उतनी ही सहूलियत होती है। मुंबई में बड़ा सर्किल आपको सुरक्षा का अहसास से लबरेज रखता है। मथुरा छोड़ने के बाद मंथन मुंबई तेजी तैरना सीख चुके थे।   

मुंबई की बरसात काफी रोचक होती है, यहां रहने वाले लोगों के जीवन पर उनके हैसियत के अनुसार प्रभाव डालती है। ऊंचे बहुमंजिले मकानों में रहने वाले लोग जहां बरसात के मौसम को पूरी तरह से इंज्वाय करते हैं वहीं चालों में रहने वाले लोगों का जीवन नरकमय हो जाता है। अपने फिल्मी कैरियर के उतार चढ़ाव के दौरान

कुछ वर्षों तक मंथन को आदर्शनगर के पास लोटस पेट्रोल पंप के पीछे एक चाल में रहने का मौका मिला। यह इलाका मुंबई में फिल्म गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। तमाम तरह के म्युजिक स्टूडियो इसी इलाके में हैं, और फिल्मी लोगों का हुजूम इसी इलाके में अपना कारोबार फैलाये हुये है। यहां पर रहते हुये मंथन को इन लोगों से संपर्क साधने में सहुलियत होती थी। लेकिन बरसात आते ही इनके कमरे का पूरा नक्शा ही बदल जाता था। लगातार चार घंटे बारिश होने की स्थिति में सड़कों और नालों का पानी कमरे के अंदर दाखिल होने लगता था, और कमरे के सारे सामान तैरते हुये नजर आते थे। उनके द्वारा लिखे हुये गजलों और गीतों की कापियां भी इसी में बह जाती थी। कभी-कभी तो पानी कमर से भी ऊंचा पहुंच जाता था, और पूरा कमरा तालाब की तरह लगता था। ऐसे में इन्हें अपने किसी दोस्त के यहां शरण लेना पड़ता था। बरसात के दिनों में दोस्ती बहुत काम आती है, खासकर तब जब आप किसी चाल में रहते हैं और आपके दोस्त किसी बिल्डिंग में। बहरहाल मंथन मुंबई में जीने की कला तो सीख ही चुके थे, दिन प्रति दिन इसमें और निखार आता जा रहा था।          

 प्रैक्टिल तौर पर मुंबई के फिल्म उद्योग में हाथ पैर मारने के दौरान मुंबई की मुलाकात कई स्थापित म्युजिक डायरेक्टरों से हुई, और इनको गीत और संगीत के बदलते पैटर्न की समझ हुई। भारतीय फिल्मों में गीत और संगीत की परंपरा समृद्ध रही हैं, विगत में फिल्म के इस सेक्शन पर खासा ध्यान दिया जाता रहा है। वर्तमान दौर में गीतों पर संगीत हावी हो गये हैं। चलताऊ बोल पर कानफाड़ू संगीत को काफी तव्वजों दिया जाने लगा है, और इसे बदलते जमाने का टेस्ट बताया जा रहा है। इस संबंध मंथन कहते हैं, मेकिंग पैर्टन में तब्दीली आई है। पहले गीतकार गीत लिखता था, फिर उस गीत को  संगीतकार के पास भेजा जाता था। महीनों मेहनत करने के बाद संगीतकार उस गीत के लिए खास धुन तैयार करता था। अब सबकुछ ठेका पर होने लगा है। पहले संगीत तैयार होता है फिर उस पर बोल लिखने को कहा जाता है। ऐसे में गीत की क्वालिटी तो खराब होगी ही।  यही कारण है कि आज कल के गीतों में थीम का अभाव होता है। यहां वहां से शब्द उठाकर गीत बना दिये जाते हैं।  

टीवी धारावाहिकों के अलावा म्युजिक एलबम में भी इनकी पुछ बढ़ गई थी। नजर, कुड़ी कंवारी, माही वे आदि म्युजिक एलबम में इनके द्वारा लिखे गये गीतों को लोगों ने पसंद तो किया, लेकिन वह पहचान नहीं मिल सकी जिसे वह पाना चाहते थे। हालांकि म्युजिक मार्केट में लोग इन्हें जानने लगे थे, इनके लिखने की अदा को लोग पसंद करते थे, कमोबेश पैसे भी ठीक-ठाक मिल ही जाते थे।      

टीवी धारावाहिकों के लिए लगातार गीत लिखने के दौरान ही मंथन को यह अहसास हो गया कि भले ही इससे तात्कालिक रूप से कुछ पैसे मिल जाते हैं, लेकिन व्यापकतौर पर पहचान बनाने के लिए मेन स्ट्रीम की फिल्मों के लिए गीत लिखना जरूरी है। हालांकि धारावाहिकों में उनका काम चल निकला था, लेकिन जिस मुकाम को वह पाना चाहते थे इस रास्ते पर चलते हुये वह उन्हें दिखाई नहीं दे रहा था। एक बार फिर इन्होंने फिल्मों में काम पाने के लिए जोर लगाना शुरु कर दिया।

दक्षिण भारत की कुछ फिल्में उन्हीं मिली, जो हिन्दी में डब होती थी और उनके गानों को भी हिन्दी में तब्दील किया जाता था। गीत को पूरी तरह से धुन के आधार पर ही लिखना होता था। पैसा तो यहां पर भी मिल जाता था लेकि पहचान की संकट बनी हुई थी। इस दौरान वह रेडियो के लिए भी घोस्ट राइटर के तौर पर स्क्रीप्ट लिखते रहे, ताकि पैसों की किल्लत का सामना न करना पड़े।

अपने कलाकार दोस्तों के साथ मंथन अक्सर स्टूडियो में आडिशन के लिए भी जाते थे। एक बार इनके एक दोस्त ने इनका नाम आडिशन के लिए डाल दिया और स्टूडियो में इनके चेहरे मोहरो को देखते हुये बिना आडिशन लिये ही इनका सलेक्शन हो गया। शूटिंग करने के लिए पूरी टीम को कनाडा जाना था, लेकिन मंथन के पास पासपोर्ट नहीं था। सारा मामला पासपोर्ट पर आकर फंस गया और मंथन के हाथ से एक्टिंग करने का मौका जाता रहा। वह मुंबई गीतकार बनने आये थे, लेकिन एक्टिंग उनके खाते में दस्तक देते हुये निकल गई। इसके बाद भी कई मौके आये जब मंथन को एक्टिंग करने का आफर मिला, लेकिन तब तक उन्होंने निश्चय कर लिया था कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ गीत ही लिखने है। अपने ट्रैक से डाइवर्ट नहीं होना है।  

अपने आप को पूरी तरह से गीतों पर केंद्रित करते हुये यह लोगों से मिलते- जुलते रहे। इनका मेहनत रंग लाया और एक के बाद एक इन्हें कई फिल्में भी मिलते चली गई। जगमोहन मुंदड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म चेस में  इनके लिखे गीतों को शान और श्रेया घोसाल ने स्वर दिया। इसी निर्देशक जगवीर की फिल्म कुछ करिये, निर्देशक रंजन विरानी की फिल्म हेल्प, पंजाबी फिल्म लड़ गया पेंचा के गीत भी मंथन को लिखने के लिए मिले। मुंबई की फिसलन भरी जमीन पर मंथन की जद्दोजहद अभी भी जारी है, हालांकि उन्हें इस बात का सुकून है कि बिना किसी गाडफादर के वह शनै शनै अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं।

मुंबई का यह चलन है कि फिल्म दुनिया में आने वाले नये लोगों को पुराने लोग तरह-तरह की बातें करके बुरी तरह से हतोत्साहित करते हैं। इसके विपरित मंथन नये लोगों से यही कहते हैं कि यदि आपमें प्रतिभा और लगन है तो आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। खुद का मूल्यांकन भी इसी आधार पर करते हुये मंथन मजबूती के साथ न सिर्फ मुंबई में जमे हुये हैं, बल्कि सफलता की ओर कदम भी बढ़ा रहे हैं। 

                                                       समाप्त

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One Response to सपनों के पंख के सहारे गीतकार मंथन की कच्ची उम्र में मुंबई उड़ान ( भाग 2)

  1. Grande alberino! Ringraziamenti per richiedere tempo scrivere qualcosa che sia realmente degno lettura. Trovo troppo spesso l’Info inutile e non qualcosa che sia realmente relativo. Ringraziamenti per i vostri duri lavori.

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