आदिवासियों के संघर्ष ने दिखाया रंग, हाईकोर्ट ने रैपिड सर्वे कराने का आदेश दिया

शिवदास

सत्ताधारी पार्टियों की दोहरी राजनीति की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश के आदिवासियों की आवाज उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने सुन ली  है। न्यायमूर्ति सुनील अम्बानी और न्यायमूर्ति काशी नाथ पाण्डेय की पीठ ने बृहस्पतिवार (16 सितंबर)को अपने निर्णय में उत्तर प्रदेश सरकार को गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भूनिया अनुसूचित जनजातियों का रैपिड सर्वे कराकर उनकी संख्या अलग करने के साथ आगामी पंचायत चुनाव में  उनके लिए आरक्षण कोटा निर्धारित करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनाव में अवरोध उत्पन्न होने की आशंका प्रबल हो गई है, क्योंकि राज्य चुनाव आयोग (पंचायत) ने बृहस्पतिवार को ही त्रिस्तरीय पंचायत के सामान्य निर्वाचन की अधिसूचना जारी की। उधर,हाईकोर्ट के फैसले पर आदिवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले राजनीतिक पार्टियों और संगठनों ने खुशी जाहिर की है।

 गौरतलब है कि अनुसूचित जनजाति (उत्तर प्रदेश)-1967 में संशोधन करते हुए पूर्ववर्ती राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने साल 2002 में संशोधन करते हुए “अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा(सुधार) अधिनियम-2002″ संसद में पेश किया, जिसे संसद ने पारित कर दिया। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने 8 जनवरी 2003 को भारत सरकार का राजपत्र (भाग-2, खंड-1) जारी करते हुए इसे लागू कर दिया। इस संशोधन के तहत उत्तर प्रदेश में गोंड़ (राजगोंड़, धूरिया, पठारी, नायक और ओझा)जाति को उत्तर प्रदेश के 13 जनपदों महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र में अनुसूचित जाति वर्ग से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया। साथ में खरवार, खैरवार को देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और सोनभद्र में, सहरिया को ललितपुर में, परहिया, बैगा, अगरिया, पठारी, भुईया, भुनिया को सोनभद्र में, पंखा, पनिका को सोनभद्र और मिर्जापुर में एवं चेरो को सोनभद्र और वाराणसी में अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया गया।

इस संशोधन के चलते उपरोक्त अनुसूचित जनजातियों के करीब 20 लाख लोग पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा तक का चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं। आदिवासियों के इस मुद्दे को लेकर कुछ राजनीतिक संगठनों एवं गैर-सरकारी संगठनों ने उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिकाएं दायर कर रखी हैं। उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में जन संघर्ष मोर्चा के प्रदेशीय जनजाति विकास मंच व आदिवासी विकास समिति की तरफ से दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुनील अम्बानी और न्यायमूर्ति काशी नाथ पाण्डेय की पीठ ने बृहस्पतिवार को राज्य सरकार को उपरोक्त आदिवासी जातियों का रैपिड सर्वे कराकर उनकी संख्या अलग करने के साथ आगामी पंचायत चुनाव में उनका आरक्षण कोटा निर्धारित करने का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय के इस फैसले को जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने आदिवासियों की जीत बताया। उन्होंने प्रदेश सरकार एवं चुनाव आयोग से सूबे में पंचायत चुनाव के लिए जारी अधिसूचना को रद्द करने एवं तत्काल रैपिड सर्वे कराने की मांग की है, जिससे आदिवासियों को न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि जन संघर्ष मोर्चा ने प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री तक को कई बार पत्र भेजे और दिल्ली से लेकर लखनऊ तक धरना-प्रदर्शन के माध्यम से आदिवासियों की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया। राज्य चुनाव आयुक्त ने जन संघर्ष मोर्चा की मांग को संज्ञान में लेकर प्रदेश सरकार को दिशा-निर्देश भेजे। इसके बाद भी सरकार ने रैपिड़ सर्वे कराकर आदिवासियों के लिए सीट आरक्षित करने की न्यूनतम मांग को पूरा नहीं किया। इसके बाद जन संघर्ष मोर्चा के प्रदेशीय जनजाति विकास मंच व आदिवासी विकास समिति ने उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में अलग- अलग याचिकाएं दाखिल की।

परिचय : शिवदास विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काम करने के बाद पत्रकारिता की डगर पर अग्रसर हैं।

 साभार – http://thepublicleader.blogspot.com/

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