माँ की याद (कविता)

नितीश कुमार, पटना

बचपन की यादें वक्त के फंदे पर कभी झूलती नहीं
माँ की बातें और लोरियां मुझे कभी भूलती नहीं

तसवीरें देखता हूँ जो दीवारों पर कब से लटकी हैं
माँ संग बैठी है ये देख आँखें टपकी हैं

बेकार की बात नहीं मैं सच कह रहा हूँ
माँ की यादों के संग मैं बह रहा हूँ

माँ को गले लगाये हुए एक और तस्वीर है
ये सब तसवीरें ही तो मेरी जागीर है

कभी नहीं खाली हो सकता खामोशी का संमंदर
मुझे विरासत में मिला था सुहाना सा मंजर

हाथ पकड़ा हुआ था माँ ने मेरा तब भी
हाथ पकड़ा हुआ है माँ ने मेरा अब भी

चार दीवारें हैं उस पर डाली हुयी छत है
माँ का ये कमरा उसका जीवन रुपी रथ है

सदा दी है दुआ, बेटा हमेशा आगे बढ़ना
माँ तुम्हें कभी रुलाया हो तो मुझे माफ़ करना।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to माँ की याद (कविता)

  1. Aayush says:

    aishi kavita kafi samay baad padhne ko mili hai…
    aapne bilkul matritv prem ko fir se jinda kar diya hai….
    mai samajhta hon ki yaad to sab karte hai par maa ki yaad
    sabon ki aakhon me aanshu la hi deti hogi….

  2. Nicki Minaj says:

    outstanding post! great advice, will take on board!

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