फ्रेण्डली पुलिस बनाम मधुबनी ववाल

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बिहार का मधुबनी इन दिनों चर्चा में है। चर्चा में हो भी क्यों नहीं नीतीश सरकार की फजीहत करने वाला मामला यहीं सामने आया था। दरअसल प्रशांत और प्रीति नामक प्रेमी युगल द्वारा भागने  का यह मामला जितना सीधा-सपाट था, उसे पुलिस की शिथिलता और क्रूर राजनीति ने  अत्यंत ही जटिल बना दिया। क्रूर राजनीति कितने बेगुनाहों की जान ले सकती है, इसका साक्षात उदाहरण है मधुबनी का प्रशांत- प्रीति के प्रेम प्रसंग का  मामला। अगर इस पूरे मामले का पटाक्षेप नहीं होता तो मधुबनी में लगी आग से संपूर्ण बिहार के जल उठने की शंका प्रबल हो चुकी थी। क्योंकि तमाम विपक्षी दल इस फिराक में जुटे थे कि बिहार जल उठे और पोलिटकल माईलेज लिया जाये।
कुछ दिन पहले प्रशांत झा नामक लड़के की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई गयी। इसके बाद प्रीति चौधरी नामक लड़की के अपहरण का आरोप प्रशांत झा एवं उसके परिवार पर पुलिस के समक्ष प्रीति के पिता ने लगाया। इस आरोप के बाद पुलिस ने प्रशांत के दादा को जेल भेज दिया। फिर एक लावारिश सिर कटी सड़ी गली लाश पुलिस ने बरामद की, जिसकी शिनाख्त प्रशांत के रूप में की गई। इस लावारिश लाश के मिलते  ही प्रशांत के परिजनों ने काफी मशक्कत के बाद प्रीति के परिवार पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया।  बताते चलें कि प्रशांत झा नाम का एक युवक मधुबनी में ही प्रीति नामक युवती  से प्यार करता था। बीते कुछ दिनों से दोनों लापता थे।  उनके लापता  होने की सूचना जब परिजनों ने थानें में देनी चाही तो उसे भी पुलिस ने हल्के से लिया। लेकिन जैसे ही पुलिस को सिर कटी लाश मिली पूरा प्रकरण यू टर्न ले लिया।  प्रशांत के परिजनों द्वारा पहचान के बाद, स्थानीय लोगों ने मीडिया के  सहयोग से इसे ऑनर किलिंग का मामला बना दिया। युवती को भी गुमशुदगी की हालत में  मृत मानकर कई बेसिर पैर की कहानियां बनाई गई।  हालांकि पुलिस का कहना था कि  सिर कटी लाश की प्राथमिक जांच के बाद एक्सपर्ट्स ने गुमशुदा युवक जिसकी उम्र तकरीबन 17 साल के होने का अंदाजा लगाया जा रहा था से इस लाश की उम्र का मिलान नहीं हो पा रहा है। मगर, सूबे के डीजीपी अभयानंद की फ्रेंडली पुलिस की बातों पर प्रशांत के परिजनों को यकीन नहीं हो रहा था। परिजन सिर कटी लाश का अंतिम संस्कार करना चाहते थे। वहीं पुलिस उसे लावारिश मानकर चल रही थी। अंततः प्रशांत के परिजन लाश की मांग को लेकर धरने पर बैठ गये। परिजनों को राजनैतिक दलों का भी समर्थन मिलने लगा। अनशनकारी लाश लेने  की जिद पर अड़े थे, वहीं पुलिस अपनी जिद पर। पुलिस की अपने जिद पर अडिग होने की खास वजह थी डाक्टरी प्रमाण पत्र। पुलिस डीएनए टेस्ट कर पता करना  चाहती थी कि लाश प्रशांत की है या नहीं। अब सवाल यह उठता है कि पुलिस की  जिद का कारण था डाक्टरी प्रमाण। प्रशांत के परिजनों की जिद की वजह क्या थी ? बेटा गुम होने का गम या और भी कुछ। समर्थन दे रही भीड़ विज्ञान की तकनीक को  क्यों नहीं समझने को तैयार था। यह भी सच है कि पुलिस समझाने में सफल क्यों नहीं हो रही थी। दरअसल वो गंदी  राजनीति थी जो हत्या दर हत्या पर अपनी राजनीति की रोटी सेंकने के लिये  आतुर था। हुआ भी वही जिसका डर था। उग्र भीड़ को शांत करने की बजाये गोलियां चलायी गयी। आखिर क्यों ऐसा हुआ। पुलिस इस मामलों में धैर्य क्यों नहीं रख पाई।  डीजीपी ने वातानूकुलित कमरे में बैठकर यह हिदायत क्यों नहीं दी कि जैसे ब्रहमेश्वर मुखिया की अंत्येष्टि यात्रा के वक्त पुलिस   तमाशबीन थी,  उसी तरह से यहां भी तमाशबीन बनी रहे। आखिर क्यों ? सच तो यह है कि जातीय  राजनैतिक कारणों से डीजीपी ने यह फैसला किया था। अगर इनकी चिंता पुलिस को  फ्रेडली बनाना होता तो औरंगाबाद से लेकर मधुबनी तक इनकी पुलिस उग्र नहीं हो जाती। कड़वी सच्चाई यह भी है कि सुशासन के सबसे अयोग्य डीजीपी के रूप में इनकी तस्वीर बनी है। लाश और रिश्तों की नाजुकता को आसानी से समझा जा सकता है।  आखिर प्रशासनिक अधिकारी परिजनों को यह समझाने में क्यों नहीं कामयाब हो पाये कि सिर कटी  लाश उस युवक की नहीं है जो गुम है। दरअसल पुलिस यह बताने में अक्षम थी कि वे  दोनों कहां हैं। इसका जवाब ढूढ़ने में असफल पुलिस ने गोलियां चलाईं  जिससे निर्दोष मारे गये, और इस तरह मधुबनी , जिसकी खासियत नाम से ही मधु की तरह मीठी और शालीन है, को भी आगजनी और हिंसा की चपेट में ला  दिया। जाहिर है इन सबके पीछे पुलिस का घिनौना और दोहरा चरित्र ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है। वहीं विपक्षी दलों की घटिया राजनीति भी इसके पीछे एक बड़ी बजह है। अगर पुलिस और विपक्षी दल संजीदगी से काम लेते तो प्रशांत के नाम पर कई  और प्रशांत अकाल मौत से बच जाते। ज्ञातव्य हो कि मधुबनी की हिंसक घटना  और पुलिस की गोली बारी में दो और छात्रों की मौत हो गयी थी। जबकि बाद में प्रशांत और उसकी प्रेमिका को दिल्ली से सही सलामत बरामद किया गया।  कई आला अधिकारियों के तबादले और सूबे के मुखिया का यह बयान क्या काफी है कि — अंत भला तो सब भला ….क्या वाकई एक प्रशांत की बरामदगी ने इस अंत को भला कर दिया। ऐसा कदापि नहीं है क्योंकि सत्ता- प्रशासन और विपक्षी दलों के आचरण की बुराई का अंत नहीं हुआ, साथ ही यह मामला कई और अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया कि आखिर जिस लाश की अंत्येष्ठि हुई वह किस अभागे की संतान थी जिसका कोई सगा नहीं मिला। क्या यह जंगल राज का उदाहरण नही है जहां इंसाफ़ भीड़ के दबाव पर दिया जाता हो। पुलिस की गोली से जो दो लोग मारे गये उनका कसूर क्या था? क्या जनता का आक्रोश किसी राजनीतिक षडयंत्र का नतीजा था?

इन्साफ़ का तकाजा है कि सिरकटी लाश किसकी  थी इसका पता लगाया जाये , गलत पहचान कर के लाश जलाने वाले प्रशांत के परिजनों पर मुकदमा हो, पुलिस की गोली से मारे गये युवकों की हत्या की जांच हो , कोई  सार्थक नतीजा तभी निकल सकता है जब इस पूरे घटनाक्रम की जांच का ईमानदार प्रयास हो।

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  1. आपका यह निष्कर्ष ही अब एकमात्र हल है-“इन्साफ़ का तकाजा है कि सिरकटी लाश किसकी थी इसका पता लगाया जाये , गलत पहचान कर के लाश जलाने वाले प्रशांत के परिजनों पर मुकदमा हो, पुलिस की गोली से मारे गये युवकों की हत्या की जांच हो , कोई सार्थक नतीजा तभी निकल सकता है जब इस पूरे घटनाक्रम की जांच का ईमानदार प्रयास हो।”

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