बिहार में पैर जमाने की कोशिश में लालू

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सत्ता से बेदखल होने के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद पूरी तरह से दिल्ली में जम गये थे। अब लगता है एक बार फिर से वह बिहार की राजनीति में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। विगत बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरीके से राजद खिसक गया था उससे लालू प्रसाद समेत तमाम राजद नेता पस्त पड़ हुये थे। जिस तरह से नीतीश सरकार द्वारा मीडिया को उल्टे-सीधे विज्ञापनों के नाम पर मोटी रकमें दी जा रही थी, उसका असर मीडिया में विपक्ष की सिकुड़ती खबरों के रूप में दिखाई दे रहा था। अब लगता है कि लालू प्रसाद के कानों में किसी ने यह बात फूंक दी है कि मीडिया के भरोसे रहकर बिहार की जनता से संवाद स्थापित कर पाना संभव नहीं है। यही वजह है कि अब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तर्ज पर अपने बलबूते यात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल लालू प्रसाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मोतिहारी से गया तक की यात्रा करेंगे। पांच दिनी इस यात्रा में वह पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने के साथ-साथ गया और मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के मामले पर लोगों में अलख जगाएंगे।

इसके पहले अपने शासन काल में लालू प्रसाद चरवाहा विश्वविद्यालय को लेकर शिक्षा के क्षेत्र में अनोखा प्रयोग कर चुके हैं, जो पूरी तरह से असफल साबित हुआ है। हालांकि उस समय उनके चेले चपाटियों ने उनके इस प्रयोग के लिए उन्हें सुकरात के स्तर का महान शिक्षाविद तक साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा था। नीतीश सरकार के खाद्य उपभोक्ता मंत्री श्याम रजक भी उस समय लालू की टीम में ही शामिल थे और उन्होंने भी लालू प्रसाद की जमकर वंदना की थी। अपने राजनीतिक कैरियर के दूसरी पारी में नीतीश सरकार की तरफ से बल्ला संभाल रहे श्याम रजक अब लालू की बातों पर चौका छक्का लगाते हुये दिख रहे हैं। हाल ही में लालू प्रसाद ने धान की खरीद में कमी को लेकर खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय पर सवाल उठाया तो श्याम रजक का धैर्य जवाब दे गया। वैसे भी अब उनकी निष्ठा बदली हुई है। उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुये कहा कि लालू प्रसाद को अपने शासनकाल को पीछे मुड़ कर देखना चाहिये कि उस वक्त एक लाख मीट्रिक टन से ज्यादा धान की खरीद नहीं की जाती थी।

इधर कुछ दिनों से लालू प्रसाद अन्य कई विषयों पर भी मुखर हो कर बोल रहे हैं। यूपी में सपा की वापसी के बाद राजद के अंदर लोगों को विश्वास होने लगा है कि बिहार में उनकी भी वापसी हो सकती है। एक तरह से लालू प्रसाद पर यह अपने ही कार्यकर्ताओं की ओर से सूबे की राजनीति में सक्रिय होने के लिए दबाव भी पड़ रहा है। लेकिन लालू प्रसाद के सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी भी वे खुद के  घेरे हुये रेखा से आगे नहीं निकल पा रहे हैं। आलतू फालतू की बयानबाजी करके अपने अपने समर्थको को गोलबंद करना उनकी पुरानी शैली रही है, जो एक समय में काफी कारगर थी क्योंकि जिस जनाधार पर वह सवार होकर राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज को छुआ था वह उनसे इसी तरह की बयानबाजी की उम्मीद करता था। लेकिन अब दौर बदला है और सूबे का मिजाज भी बदला है। सूबे में नये उम्र के वोटरों की एक नई फौज खड़ी हो गई है, जो विकास को सड़क और मौल के निर्माण से जोड़ कर देखती है। नीतीश कुमार मनोवैज्ञानिक रूप से इस तबके को पूरी तरह से संतुष्ट करते हुये नजर आ रहे हैं, इसके साथ ही सूबे में महादलित वर्ग को पुर्नसंगठित करके उन्होंने लालू के पिछड़ेवाद की राजनीतिक को दो फाड़ कर दिया है। ऐसे में लालू की पुरानी अक्खड़ शैली कारगर साबित होगी कह पाना मुश्किल है। सूबे में एक बड़ा तबका आज भी लालू प्रसाद को खलनायक के रूप में ही देखता है। लालू राज के नाम से उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह तबका नीतीश कुमार के शासन में राहत की सांस ले रहा है और यह कभी नहीं चाहेगा कि लालू प्रसाद की बिहार में वापसी हो या फिर लालू प्रसाद के आभामंडल का विस्तार हो।

दो जगहों से हार चुकी राबड़ी देवी को जिस तरह से पिछले दरवाजे से विधानमंडल में भेजा गया है उसको लेकर भी लालू प्रसाद की तिकड़मी छवि को ही बल मिला है। केंद्रीय स्तर पर फिलहाल लालू प्रसाद कांग्रेसी खेमे में दिख रहे हैं, और इधर बिहार में कांग्रेस के खिलाफ हवा बनी हुई है। विधानसभा के चुनाव में तो कांग्रेस ने लालू को साफतौर पर अंगूठा दिखा दिया था, लेकिन 2014 में होने वाले लोकसभा के चुनाव में बिसात कैसे बैठती है इस पर अभी से मंथन होने लगा है। होटल मौर्या में आयोजित राजद की कार्यकारिणी की बैठक में गैर-हिन्दूवादी दलों को साथ लेकर चलने की बात की गई है। रामविलास पासवान के नेतृत्व में लोजपा पहले से ही लालू प्रसाद के साथ जुड़ा हुआ है और अब इस खेमे में वामपंथी पार्टियों को भी लाने की योजना बन रह है। लेकिन यह सब करने के पहले लालू प्रसाद सूबे में अपनी जमीन को मजबूत करना चाह रहे हैं। इसी के तहत राजद का सदस्यता अभियान शुरु किया जा रहा है। पार्टी को पंचायत से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर फिर से खड़ा करने की कोशिश शुरु हो गई है। राजद का संगठनात्मक चुनाव जनवरी 2013 में कराने की बात हो रही है। मजे लेकर लोग इस संगठनात्मक चुनाव के परिणाम को अभी से घोषित करते हुये कह रहे हैं कि संगठन का नेतृत्व लालू प्रसाद के हाथ में रहेगा क्योंकि लालू के ऊपर कांग्रेस का रंग चढ़ा हुआ है, और वैसे भी राजद अब सूबे में “फैमिली पार्टी” से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे विश्लेषक नीतीश कुमार की कामयाबी में सूबे में लालू की उपस्थिति को अनिवार्य समझते हैं। बड़े भाई की हुंकार से छोटे भाई को आज भी बल मिलता है। लालू के दहाड़ने की वजह से लालू विरोधी मजबूती के साथ नीतीश कुमार के इर्दगिर्द गोलबंद होते हैं। इसलिये नीतीश कुमार भी यही चाहते हैं कि लालू प्रसाद समय समय पर बयानबाजी करते रहें। बहरहाल कहा तो यहां तक जा रहा है कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक दूसरे के पूरक हैं। यही वजह है कि लालू प्रसाद के खेमे से निकले नेताओं की नीतीश कुमार के खेमें में भीड़ है।

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