मुंबई के लोकल रेलवे स्टेशनों के पास धड़ल्ले से बिक रही हैं ब्लू फिल्मों की सीडी

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तेवरआनलाईन, मुंबई

मुंबई के लगभग सभी लोकल रेलवे स्टेशनों के साथ-साथ गली चौराहों पर पाइरेटेड और ब्लू फिल्मों की सीडी धड़ल्ले से बिक रही हैं। इससे प्रोड्यूसरों को करोड़ों रुपये का चपत तो लग ही रहा है, छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी बड़े पैमाने पर ब्लू फिल्मों की गिरफ्त में आ रहे हैं। मुंबई में आतंकी घटनाओँ की वजह से लगभग सभी रेलवे स्टेशनों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम किया गया है। बहुत बड़ी संख्या में पुलिस बल यहां पर तैनात रहते हैं। इसके बावजूद यह धंधा इनके नाक के नीचे चर रहा है। पाइरेटे और ब्लू फिल्मों की अवैध बिक्री के इस धंधे में पुलिस के साथ-साथ म्युनिसिपलिटी के लोग भी अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं।

कांदिवली,गोरेगांव, जोगेश्वरी अंधेरी, विर्ले पाले, दादर, बांद्रा, चर्चगेट, शिवा जी टर्मिनल, मीरा रोड, खार, आदि रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको पाइरेटेड और ब्लू फिल्मों की सीडी बेचने वालों की चलती फिरती दुकानें मिल जाएंगी। पाइरेडेट सीडी की कीमत 10 रुपये से लेकर 30 रुपये तक होती है, जबकि ब्लू फिल्मों की सीडी की कीमत 50 रुपये है। नई फिल्मों की पाइरेटेड सीड़ी तो आपको आसानी से मिल जाएगी, लेकिन ब्लू फिल्मों की सीडी पाने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है। ये लोग ब्लू फिल्मों की सीडी तब तक नहीं देते हैं जब तक इन्हें इस बात का यकीन नहीं हो जाता है कि ग्राहक को वाकई में इसकी तलाश है।

दिखावे का नाटक करते हुये कभी-कभी पुलिस वाले इनकी घेराबंदी करते हैं, लेकिन इस तरह की घेराबंदी की जानकारी इन्हे पहले ही मिल जाती है। ये लोग ब्लू फिल्मों की अपनी चलती फिरती दुकानों को छोड़कर कुछ देर के लिए भीड़ में गुम हो जाते हैं। दुकान के पास इन्हें न पाकर पुलिस वाले चलते बनते हैं। दुकानों को जब्त करने के संबंध में जब एक पुलिस अधिकारी से पूछा गया तो उसने टका सा जवाब देते हुये कहा, ‘इनको जब्त करने का काम हमारा नहीं है। यह म्युनिसिप्लटी वालों का काम है।’ इस मामले में म्युनिसिप्टी वालों का तर्क कुछ और है ही। उनका कहना है कि इस तरह की किसी भी दुकान की जानकारी उन्हें नहीं है। यदि कोई रेलवे स्टेशनों के पास ब्लू फिल्मों की सीडी बेच रहा है, तो उसे पकड़ने काम रेलवे पुलिस का है। लोकल ट्रेनों पर सफर करने वाले रोजाना यात्रियों को ब्लू सीडी के इस अवैध बिक्री के बारे में पूरी जानकारी है। इस संबंध में एक यात्री सहज तरीके से कहता है, ‘अरे ब्लू फिल्मों की सीडी की बिक्री तो सामान्य बात है। इसको लेकर टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। इसे देखने वालों को मजा आता है, बेचने वाले अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं, और पुलिस और म्युनिसिप्लटी वालों को वेतन के अलावा अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।’

रेलवे स्टेशनों के अलावा मुंबई के गली मुहल्लो में भी ब्लू फिल्मों की सीडी खुलेआम बिक रही है। ब्लू फिल्मों की चलती फिरती दुकानों ने मुंबई के लगभग हर इलाके में अपने खरीददार बना लिया हैं। कच्चे उम्र के स्कूली बच्चे और उम्र दाराज लोग ब्लू फिल्मों की सीडी के सबसे बड़े खरीददार हैं। दिन में इन चलती फिरती दुकानों के पास स्कूली बच्चों को अक्सर ब्लू फिल्मों की सीडी खरीदते देखा जा सकता है। ये सीडी बच्चों को कम उम्र में ही विकृत यौन प्रक्रियाओं से रूबरू करा रहे हैं और इनके मानसिक विकास को बुर तरह से प्रभावित कर रहे हैं। उम्र दराज लोग अपनी यौन कुंठा को तृप्त करने के लिए इस तरही की सीडी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

मुंबई में ब्लू फिल्मों की आपूर्ति खाड़ी देशों के बिचौलियों द्वारा की जा रही है। इनका निर्माण मुख्य रुप से अमेरिका या यूरोपीय दशों में होता है। और वहां से इन्हें सामान्य फिल्मों के लेबल के साथ खाड़ी देशों में भेजा जाता है, और फिर इन्हें सहजता से मुंबई के बाजार में धकेल दिया जाता है। वैसे कोशिश यही होती है कि एक मास्टर सीडी लाकर उसकी यहीं पर कापी की जाये। इसमें रिस्क भी कम होता है। वैसे यह पूरी तरह से इस धंधा के सौदागरों की आपसी डिलिंग पर निर्भर करता है कि सीडी को थोक में मंगवाया जाये या फिर एक मास्टर सीडी मंगा के उसकी कापी कर ली जाये। इस अवैध कारोबार का कहीं कोई लेखा जोखा नहीं है। सबकुछ मौखिक रूप से ही चल रहा है।

इस धंधे से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया कि भारत में बनने वाली ब्लू फिल्मों की क्वालिटी काफी खऱाब होती है। यहां के लोग विदेशी फिल्मों को देखना पसंद करते हैं। अब जब मार्केट में इन  फिल्मों की डिमांड है, और हम इस डिमांड को पूरा करते हैं तो क्या बुरा करते हैं। इससे अपने और अपने परिवार के लिए रोटी रोटी का जुगाड़ हो जाता है। हमें तो बस पैसों से मतलब है, अब वो लिखित रूप से मिले या अलिखित रूप से क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी काले धंधे में सबसे ज्यादा ईमानदारी की जरूरत होती है।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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