सबसे बड़े फासीवादी लालू और नीतीश हैं- नवल किशोर यादव

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नवल किशोर यादव

तेवर आनलाईन, पटना

नवल किशोर यादव

बिहार की राजनीति में एमएलसी नवल किशोर यादव एक सुलझे हुये नेता माने जाते हैं। छात्र जीवन से राजनीति की शुरुआत करने वाले नवर किशोर यादव राजनीति के पथ पर कई लंबे डग भर चुके हैं। तथाकथित जंगल राज से लेकर सुशासन सरकार के दौर में लोगों के हित के लिए अपने तरीके से लगातार संघर्ष करते रहे हैं। बीजेपी का दामन थामने के बाद उनकी राजनीतिक शैली में और निखार आ गई है। बिहार और देश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले नवर किशोर यादव लोगों से सहज राब्ता बनाते हुये राजनीति के पथ पर अग्रसर हैं। अपने बेबाकीपन के लिए जाने जाने वाले नवल किशोर यादव ने तेवर आनलाईन के संपादक आलोक नंदन से एक खास बाचतीत में सूबे और देश की राजनीति के साथ-साथ तथाकथित जंगल राज से लेकर सुशासन पर खुलकर अपनी बात रखी है। पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश-

तेवर:  आपका बैकग्राउंड समाजवादी और सेक्यूलर खेमे से रहा है, अब कुछ समय से आप बीजेपी में है। खुद को बीजेपी में कितना कंफर्टेबल महसूस कर रहे हैं, और क्या कारण रहा है कि आपको बीजेपी में आना पड़ा। क्या माना जाये कि आइडियोलॉजी पर व्यवहारिक राजनीति हावी रही ?

नवल किशोर यादव : राजनीति में आइडियोलॉजी व्यवहारिक सिद्धांत के करीब है। आइडियोलॉजी और व्यवहारवाद साथ-साथ चलता है। जो अव्यवहारिक है वो आइडियोलॉजी नहीं चलती। वह अहंकार है। और मैं अहंकार से दूर हूं। राजनीति मेरे लिए सेवा है और राजनीति सही मायने में सेवा ही है। इसमें कहीं किसी खेमे में कंफर्टेबल होने का सवाल नहीं होता है। आप जहां भी रहे लोगों की सेवा करते रहे। मैं तो राजनीति को बस सेवा का माध्यम समझता हूं।

तेवर: बीजेपी पर आरोप लगता है कि वो फासिस्ट विचारधारा वाली  सांप्रदायिक पार्टी है। आप का जुड़ाव लालू जी से भी रहा है, जिन्हें सेक्यूलरिस्ट खेमे का का चैंपियन कहा जाता है। नीतीश कुमार की छवि भी सेक्यूलर नेता की है।  आप क्या कहेंगे इनके बारे में?  

नवल किशोर यादव : लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस तीनों फासिस्ट हैं। इनका एक ही आइडियोलॉजी है, अपने बेटे-बेटी का पेट भरना। आज फासिस्ट लोग ही सिद्धांतवादी लोगों का फासिस्ट करार दे रहे हैं। इन लोगों से बड़ा फासिस्ट तो कोई है ही नहीं।

तेवर : लंबे समय तक बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय के इर्दगिर्द घूमती रही है। कभी आप भी सामाजिक न्याय के साथ कदमताल कर रहे थे। वर्तमान बिहार में सामाजिक न्याय कहां खड़ा है ?

नवल किशोर यादव : यहां सामाजिक न्याय परिवारवादी न्याय में तब्दील हो गया है। सामाजिक न्याय का नारा उछाल कर लोगों को लामबंद तो किया गया लेकिन बाद में यह सामाजिक न्याय परिवारवादी न्याय की राह पर निकल चला। सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेता अपने परिवार को राजनीति में आगे बढ़ाने में लग गये। ऐसे में सामाजिक न्याय कहां है ? बस परिवारवाद का बोलबाला है।

तेवर : तो यह माना जाये कि सामाजिक न्याय का रिजल्ट परिवारवाद के रूप में सामने आया ?

नवल किशोर यादव : बिल्कुल। बिहार की जनता इस हकीकत को अच्छी तरह से समझ रही है। सामाजिक न्याय के नाम पर उनके साथ धोखा हुआ है। उन्हें सब्जबाग तो दिखाये गये लेकिन उनके उत्थान के लिए कुछ नहीं किया गया। सामाजिक न्याय के रहनुमा परिवारवाद के मोह फांस में फंस गये।

तेवर : 2015 के चुनाव का रूख क्या होगा, बिहार राजनीतिक नजरिये से एक प्रयोगवादी जमीन है। अब बिहार में राजनीतिक तौर पर  स्पष्ट रूप से दो खेमे नजर आ रहे हैं।

नवल किशोर यादव : 2015 चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़ी जाएगी। सही मायने में कहा जा सकता है कि यहां के तथाकथित सेक्यूलर नेता ही फासिस्ट है। इन्हीं फासिस्ट नेताओं के समय जंगल राज कायम हुआ था।

तेवर : जंगल राज के खिलाफ नारा बुलंद करके ही नीतीश कुमार ने सुशासन की सरकार बनाई थी। तथाकथित जंगल राज और सुशासन को किस तरह से देखते हैं आप ?

नवल किशोर यादव : नीतीश कुमार और लालू यादव एक ही टहनी से जुड़े हुये हैं। एक टहनी में एक जैसे ही पत्ते और फल लगेंगे। दोनों में कोई फर्क नहीं है। जंगल राज का विस्तार जारी है। सेक्यूलरिज्म के नाम पर दोनों एकजुट होकर बिहार में फासीवाद, फासीवाद चिल्ला रहे हैं। मैं पूछता हूं ये होते कौन है सेक्यूलरिज्म और फासीवाद का सर्टिफिकेट बांटने वाले ? इनका असली चेहरा लोगों के समाने आ चुका है। अब लोग इनकी बातों पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। सेक्यूलर और गैरसेक्यूलर का निर्धारण करने का इन्हें कोई हक नहीं है। सूबे का हर व्यक्ति सेक्यूलर है। इसके लिए किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।

तेवर : बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण की भी अहम भूमिका मानी जाती है। सैद्धांतिक तौर पर यहां के नेता जारे किसी भी धड़े से जुड़े हो लेकिन चुनाव में व्यवहारिक स्तर पर जातीय समीकरण को खासा तव्वजो दिया जाता है। 2015 में बिहारी का चुनावी जातीय समीकरण क्या होगा ?

नवल किशोर यादव : जाति को लेकर पूरा हिन्दुस्तान बदनाम रहा है। जाति के आधार पर यहां लामबंदी होती रही है। जिस दिन ब्राह्मण जूता बनाने लगेगा और चर्मकार पूजा करने लगेगा जाति व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

तेवर : बिहार में आंदोलन तो बहुत हुये, लेकिन शिक्षा जैसे बुनियादी जरूरतों के लिए लोगों को तरसना पड़ रहा है। बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कार्यों से कितना संतुष्ट हैं आप ?

नवल किशोर यादव : जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थी उनके हाथ में कटोरा है। शिक्षकों के लिए बिहार सरकार के पास पैसा नहीं है। विश्वविद्यालयों में शिक्षा की स्थिति खराब है।

तेवर : बिहार कृषि प्रधान राज्य है, कृषि मजदूरों की संख्या भी यहां अच्छी खासी है। फिर भी यहां के किसानों और मजूदरों की हालत खराब ठीक नहीं है। क्या कहेंगे इस बारे में।

नवल किशोर यादव : अब तक यहां अहरा और पइन की उगाही तो हुई नहीं है, किसानों की क्या बात की जाये ? सरकार पर नौकरशाही हावी है और यह नौकरशाही किसानों और मजदूरों के हक में नहीं सोचती। परिवारवादी नेताओं के साथ मिलकर यह अपने स्वार्थ साधने में लगी हुई है। इससे कुछ भी उम्मीद करना बेकार है।

तेवर : 2015 में बिहार के चुनाव में मोदी फैक्टर कितना वर्क करेगा, अभी-अभी नौ राज्यों की 32 विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका लगा है।

नवल किशोर यादव : हम विकास को मुद्दा बनाएंगे, और नरेंद्र मोदी फैक्टर भी यहां मजबूती से वर्क करेगा। केंद्र में लोग बीजेपी की सरकार को पसंद कर रहे हैं, इस बार बिहार में सभी दलों का सफाया होने वाला है।

तेवर : तो क्या बिहार में अब विकास का गुजरात मॉडल चलेगा ?

नवल किशोर यादव : अब गुजरात मॉडल नहीं, बल्कि देश का मॉडल चलेगा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विकास के नये चरण में प्रवेश कर चुका है, बिहार में भी विकास के इसी मॉडल को स्थापित किया जाएगा।

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