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सुरभि, बेगूसराय, बिहार की प्रस्तुति – “चाह”

अमरनाथ, मुंबई
फणीश्वरनाथ रेणु की संवेदनशील और गहन कहानी “नेपथ्य का अभिनेता” पर आधारित नाटक “चाह” का मंचन मुंबई के वेदा चौबारा, आरामनगर पार्ट-2, अंधेरी पश्चिम के सभागार में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। सुरभि, बेगूसराय की इस प्रस्तुति ने दर्शकों को रंगमंच के उस अनदेखे, अनकहे और अक्सर उपेक्षित संसार से रूबरू कराया, जहाँ अभिनेता अपने अस्तित्व और पहचान के लिए निरंतर संघर्ष करता है।
नाटक का अभिनय एवं निर्देशन सदानंद पाटिल द्वारा किया गया, जिन्होंने एक अभिनेता के भीतरी द्वंद्व, उसकी तड़प और कला के प्रति उसकी अटूट प्रतिबद्धता को अत्यंत सशक्त और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उनका अभिनय दर्शकों को सीधे उस भावभूमि में ले जाता है, जहाँ मंच और जीवन के बीच की रेखाएँ धुंधली हो जाती हैं।
प्रकाश परिकल्पना हरीश हरिऔध द्वारा अत्यंत प्रभावी ढंग से की गई, जिसने नाटक के भावों को और अधिक तीव्रता प्रदान की। प्रकाश और छाया के संतुलन ने नायक के मनोभावों को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, संचालन कारण द्वारा प्रस्तुति को सहज और प्रवाहमय बनाए रखा गया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वरिष्ठ अभिनेता जयंत गाडेकर द्वारा की गई, जिन्होंने न केवल आज के मंचन की सराहना की, बल्कि सुरभि की आगामी योजनाओं और रंगमंचीय प्रतिबद्धताओं पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का सफल संयोजन अजय कुमार भारती और हरिध हरिऔध द्वारा किया गया, जिनकी संगठकीय दक्षता और रंगमंच के प्रति समर्पण इस आयोजन में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
“चाह” केवल एक नाटक नहीं, बल्कि एक अभिनेता की आत्मा की पुकार है—एक ऐसी पुकार जो दर्शकों के भीतर गूंजती है और उन्हें यह सोचने पर विवश करती है कि कला के पीछे छिपा संघर्ष कितना गहरा और वास्तविक होता है। यह प्रस्तुति दर्शकों के मन में लंबे समय तक अपनी छाप छोड़ने में सफल रही।
सुरभि, बेगूसराय की यह प्रस्तुति यह सिद्ध करती है कि सच्चा रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और संवेदनाओं के बीच एक सशक्त सेतु है। आने वाले समय में इस समूह से और भी प्रभावशाली प्रस्तुतियों की अपेक्षा की जा सकती है।

editor

सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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