पत्रकारिता ब्रतकथा- (भाग 1)

आशुतोष जार्ज मुस्तफा

(भौतिकता और अंधी आधुनिकता की इस अंधी दौर में ईश्वर की गलती से पैदा हुआ एक संवेदनशील इंसान)         

पत्रकारिता ब्रतकथा             

कैसे चंद पैसों के लिए किसी पवित्र कार्य को गंदा कर देता है। इसके सबसे अच्छे उदाहरणों में शुभार किए जाएंगे बिहार और देश के कोने से निकलने वाले समाचार पत्र। शोषण। सिर्फ शोषण। शारीरिक। मानसिक। आर्थिक और समाजिक। यह झूठ नहीं। किसी की हिम्मत हो तो पता कर ले। हमे कोई गुरेज नहीं। लेकिन आवाज तो उठनी ही चाहिए। भले कहीं से उठे। और इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए भड़ास है ही…..।

इसी आशा के साथ मैं अखबारों के अंदर होने वाले शोषण की नयी कहानी को गणेश चतुर्दशी और तीज त्योहारों पर होने वाले ब्रत कथा के रुप में कहता हूं…………………।

             प्रथम अध्याय………।

श्री सूत जी बोले……………….हे नारद। तुम आज भी पत्रकार माने जाते हो। लेकिन तुम्हारी दशा कुछ इसलिए अच्छी  है कि तुम………कार्य चाहे जो भी करो। देवताओं की भलाई के लिए करते हो। लेकिन अब मैं तुम्हें कलियुग के पत्रकारों की कथा कहता हूं…………ध्यान से सुनो। लेकिन ध्यान रहे। इस कथा को सुनने के लिए किसी को प्रेरित मत करना। क्योंकि इसे सुनने वाले को लाभ नहीं मिलेगा। वरन सुनने वाली यदि स्त्री नाम की कोई गर्भवती प्राणी हो तो उसका गर्भ भी गिर सकता है।

हे नारद……..इंडिया के हिंदी संस्करण के नाम से पूरे देश से एक अखबार निकलता है। नाम तो तुम समझ ही गए होगे। बड़ी बिचित्र स्थिति है। इस अखबार के अंदर शोषण के जो नजारे मैने देखें हैं। उसे देखकर मानवता भी शर्मशार हो जाएगी।..हे नारद। यहां अपना खाना,नास्ता,अपना जीवन यहां तक की अपने सपने भूलकर इस अखबार के लिए काम करने वाले लोगों का दस साल में एक बार भी वेतन नहीं बढ़ता। इतना ही नहीं उनको सबसे गिरा हुआ इंसान समझा जाता है। क्योंकि वे बेचारे तेल नहीं लगा सकते। तेल भी वैसा जो पूरी तरह ओरिजनल हो। हे देवऋषि……….तुम ध्यान से सुनना। यहां संवाद सूत्र और सुपर संवाद सूत्र के नाम से कुछ प्राणी टाइप के लोग रखे जाते हैं। जिनके शोषण की कहानी तो तुम जानकर हैरान रह जाओगे। उनका शोषण इतना होता है कि वे अपने इलाके में दूसरे का शोषण करने को मजबूर हो जाते हैं।

पैसे मिलते हैं नामात्र के और काम दिनभर। इनसे एक एग्रीमेट साइन कराया जाता है………………जिसमें लिखा होता है कि यह कार्य जो मैं करने जा रहा हूं……..यह मेरा असली प्रोफेशन नहीं हैं। मेरा असल धंधा कुछ और ही है। अब बताईए नारद जी । भला ऐसा कहीं होता है। शाम के छह बजे से रात्री के 3 बजे तक जगकर पेज बनाने वाला इंसान जब यह लिखकर दे कि उसका मेन प्रोफेशन कुछ और है तो भला तुम क्या कहोगे। खैर तुम्हारी बिरादरी ही बड़ी गंदी है।

अथ श्री नारद सूत जी प्रथम अध्याय संवाद समाप्त।

 द्वितीय अध्याय………।

प्रथम अध्याय के समाप्त होते ही……….श्री कृष्ण और युधिष्ठर संवाद शुरू हुआ। श्री कृष्ण बोले …………….हे तात…….इस पत्रकारिता में पापियों की संख्या इतनी है कि आपके जैसे सच्चे लोगों का आना अब बंद हो गया है। इसी से जुड़ी एक कथा कहता हूं ध्यान पूर्वक सुनो।

इसमें शोषण का परसेंटेज बड़ा हाई होता है। अब आप ही बताईए अपने आपको स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा भागीदार मानने वाले देश में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार और देश के नाम वाला अखबार। अपने प्रखंड के संवाददाताओं को इंच से नापकर दस रुपए के हिसाब से पैसे देते हैं। अब भला वे वसूली नहीं करें तो क्या करें। सवाल वसूली तक ही सिमित नहीं है। बेचारे स्थानीय संपादक नाम के राक्षस को चावल और गेंहू भी पहुंचाते हैं। हे तात………..तुम इस बात से अंदाजा लगा सकते हो कि अखबार की मालकिन को शायद पता नहीं। बेवजह का बीना काम के लोगों का पेमेंट 40 हजार से 50 हजार होता है और जो बेचारे काम करने वाले हैं उन्हें क्यों मारा जा रहा है। युधिष्ठीर बोले……….हे प्रमो……..आप तो अंतर्यामी हैं। क्यों नहीं अखबार के नाम पर सरकार से सब्सिडी लेने वाले इस प्रवित्र पेशे को यह लोग बदनाम कर रहे हैं। इतना ही नहीं कई ऐसे संपादक बने बैठे हैं जिनपर बलात्कार का केस चलता है। हे तात……..दिल्ली में तो बैठा एक खुरदरे चेहरे वाला तो मानवीय संवेदान की मां बहन रोज करता है। उसके कर्मचारी कही मर खप जांए तो वह पहचानने से इंकार कर देता है। इतना ही नहीं बिहार में उसके घर सब्जी पहुंचाने वाले आज भी सुखी हैं……….और टैलेंटेड लोग सड़क पर धूल फांक रहे हैं। अब हमें अपने शिविर में चलना चाहिए तीसरा अध्याय 10 दिन बाद तुम्हें बताउंगा………………………….।

अथ श्री पत्रकारिता ब्रत कथा दूसरा अध्याय समाप्त।

जारी…….

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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