जातियों से भरे देश में जातीय जनगणना के खिलाफ मार्च

तेवरआनलाईन, नई दिल्ली

हिन्दुस्तान शुरु से ही जातियों का देश रहा है, आर्य और द्रविड़ लाइम लाइट में रहे हैं। आर्य यहां के मूल जाति हैं या बाहर से आये इसे लेकर भी जबरदस्त माथापच्ची है। आर्यों की वर्ण-व्यवस्था भी कालांतर में जातियों में विभाजित होती चली गई। आज मूल रूप से भारतीय समाज जातियों में बंटा है। यहां तक की मुसलिम समाज भी जातीय आधार को मजबूती से अपनाये हुये है। ईसाई समाज में भी यह आधार मजबूती से जड़ पकड़े हुये है।  सभी राजनीतिक दल चुनावी गणित की सेटिंग जातीय आधार पर ही करते हैं, सामाजिक स्तर पर शादी-ब्याह तो पूर्ण रूप से गोत्रीय व्यवस्था पर ही आधारित है। ऐसे में जनगणना में जाति का एक अलग से ब्लाक बनाने को लेकर तमाम तरह की उठापटक हो रही है। क्या इस ब्लाक के बनने या न बनने से भारतीय समाज का मूल स्वरूप बदल जाएगा? भारतीय संविधान के तहत तमाम तरह के आरक्षण के जो प्रावधान किये गये हैं क्या वो जातीय आधार पर नहीं है?   

ऐसे में “सबल भारत” द्वारा संचालित “मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन” का भविष्य क्या होगा यह कहना मुश्किल है, क्योंकि जमीनी स्तर पर हिन्दुस्तान विभिन्न तरह के जातियों का देश है। आज भी हरियाण के खापों में इसकी धमक मजबूती से महसूस होती है। हां विभिन्न जातियों के लोगों के संख्या को काउंट करने का परिणाम क्या होगा इस पर बहस की पूरी गुंजाइश है, और यदि यह बहस तरीके से चलाई जाये तो इसके कोई रोचक पहलू सामने आ सकते हैं।लेकिन यह मामला राजनीतिक रंग ले चुका है, और अभी लोग इसे उसी चश्मे से देखेंगे। अंग्रेजों ने अपनी सेना में निम्नतर जातियों का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल किया था, जबकि उसके पहले भारत पर होने वाले विदेशी आक्रमणों के दौरान देश की रक्षा का भार एक जाति विशेष के ही कंधे पर था।

बहरहाल लालू और मुलायम जैसे नेताओं के विपरित “सबल भारत” नामक संगठन जनगणना में जाति को शामिल करने के खिलाफ दिल्ली की सड़कों दंड बैठक करने लगा है। “सबल भारत” द्वारा संचालित “मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन” ने आज एक मार्च का आयोजन किया, जिसमें छात्र, लेखकों, पत्रकारों, बुद्घिजीवियों, उद्योगपतियों एवं किसानों ने 13, बाराखंबा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया। इस मार्च का नेतृत्व आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया।  

इस मार्च में “सौ बातों की बात यही,  जनगणना में जात नहीं”, जनगणना में जात नहीं, भारत को तू बांट नहीं”, भारतमाता की यह बानी, मेरी जाति हिंदुस्तानी” आदि नारे लगाये जा रहे थे।  मार्च का समापन जंतर-मंतर पर हुआ। जंतर-मंतर पर एक सभा भी हुई। सभा में विशेष रूप से भाजपा के वरिष्ठ नेता, जाने-माने अधिवक्ता तथा राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यपाल बलराम जाखड़, प्रसिद्घ पत्रकार टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व मुख्य संपादक डॉ. दिलीप पडगांवकर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो.खान, भारत के पूर्व ज्वाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस श्री आर के खंडेलवाल, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यसभा सांसद श्री महेशचंद्र शर्मा, पूर्व राजदूत श्री जगदीश शर्मा, प्रसिद्घ नृत्यागंना सुश्री उमा शर्मा, प्रसिद्घ समाजसेवी श्रीमती अलका मधोक एवं फिल्म मेकर डॉ. लवलीन थडानी, जैन मुनि डॉ. लोकेशचंद्र, ईसाई नेता श्री फ्रांसिस आदि वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया। सभा की अध्यक्षता आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने की।

सभा को संबोधित करते हुए राम जेठमलानी ने कहा कि मैं इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन करता हूं तथा इस आंदोलन के लिए मैं अपने रक्त की अंतिम बूँद तक बहाने को तैयार हूं। हमारे देश को गुलाम बनाए रखने के लिए जाति का आधार ही अंग्रेजों का मुख्य हथियार था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राबर्ट क्लाइव ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे अपने पत्र में कहा था कि हम भारत में खुश हैं, हमारी ताकत तथा व्यापार दिन प्रतिदिन मजबूती से बढ़ रहा है, क्योंकि भारत के लोग जाति के नाम पर बंटे हुए हैं। क्या राम जेठमलानी यह बताएंगे कि जातीय जनगणना से समाज कैसे बंटेगा? भारतीय समाज की आधारशिला ही जाति है, सिर्फ जातियों की गिनती की बात हो रही है, फिर उनके शब्दों में रक्त के अंतिम बूंद बहाने तक का उबाल क्यों?  

बलराम जाखड़ ने कहा कि जनतंत्र में हम सभी को अपनी बात कहने का हक है। भारत की अखंडता एवं एकता की रक्षा हमारा धर्म है। हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश बंटे। जनगणना में जाति को शामिल करना देशद्रोह के समान है यह सबसे बड़ा कुकर्म है। इससे बड़ा बुरा काम कोई और नहीं हो सकता। बलराम जाखड़ की यह बात समझ के परे है कि समाज को आंकड़े बद्ध करना देश द्रोह कैसे हो सकता है। उनकी यह बातें समाज को एक बार फिर क्रिया और प्रतिक्रिया के दौर में ला सकता है, और जातीय आधार पर जनगणना के पक्ष में जो पिटे हुये राजनीतिज्ञ अपनी शिथिल भुजाओं में तेल मालिश कर रहे हैं यह उनके लिए संजीवनी का काम कर सकता है।  

जुलूस में भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. दिलीप पडगांवकर ने कहा कि जातिगत बातें मात्र वोट बैंक की राजनीति के लिए है। हमारे लिए देश का संविधान सबसे प्रमुख है और गणतंत्र को बचाने के लिए जातीय जनगणना का विरोध करना आवश्यक है। संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि जाति, धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए। आंबेडकर का अंतिम भाषण सभी को पढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी जातीय-भेदभाव नहीं होना चाहिए। डा. दिलीप पडगांवकर संविधान का हवाला देकर तार्किक बात कर रहे, लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि तमाम तरह की जातियों को आकड़ा बद्ध करने से भेदभाव जैसी बातें कहां आ रही है।   

देश के पूर्व राजदूत जगदीश शर्मा ने कहा कि जातीय आधार पर देश को बांटने की कोशिश भारत को सारी दुनिया में बदनाम कर देगी। भारत की सेना इसीलिए महान मानी जाती है कि उसका आधार जाति नहीं, राष्ट्र है। जगदीश शर्मा ये बताएंगे कि जाट रेजिमेंट, डोगरा रेजिमेंट आदि पीछे कौन सी भावना काम कर रही है?

भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस आर. के. खंडेलवाल ने कहा कि देश को जोड़ने के लिए गांधीजी ने हिन्दु-मुस्लिम एकता का काम किया था। आज हम जातिगत बंटवारा कर के देश को कहां ले जा रहे है?

पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मो. खान ने कहा कि जातीय गणना बिल्कुल अवैज्ञानिक है। इसके आधार पर गरीबों का नहीं, कुछ जातियों की मलाईदार परतों का ही भला हो सकता है। विज्ञान के तमाम नियम तथ्यों के सतत संग्रह करने के बाद ही प्रतिपादित होते हैं। अत: अभी से यह कहना जातीय गणना बिल्कुल अवैज्ञानिक है, विज्ञान की खिल्ली उड़ाने या विज्ञान को न समझने जैसा है।  

 रैली को संबोधित करते हुए जैन मुनि लोकेशजी ने कहा कि जाति से बड़ा हमारा राष्ट्र है। यदि राष्ट्र अखंड रहा तो हम रहेंगे, वर्ना हम ही कहां रह पाएंगे। दलित ईसाई नेता फ्रांसिस ने कहा कि जाति एक घातक बीमारी है। हम सब एक हैं। जातिगत आधार पर कोई भेदभव नहीं होना चाहिए।

इस मौके पर प्रसिद्घ कलाकार उमा शर्मा, समाजिक कार्यकर्ता श्रीमती अलका मधोक और श्रीमती लवलीन थडानी ने भी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन आंदोलन के सूत्रधार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया। अशोक कावड़िया ने मुख्य अतिथियों और जुलूस में भाग लेनेवाले साथियों को धन्यवाद दिया।

भारत में जातीय जनगणना को लेकर अभी खुली बहस की दरकार है, वैसे यदि जातीय जनगणना शुरु हो जाती है तो सोनिया गांधी और उनका परिवार अपनी जाति वाले कालम में क्या लिखेगा? इसमें अभी तमाम पेंच हैं। लेकिन जिस तरह से इसे लेकर ध्रुवीकरण हो रहा है, उससे सचेत होने की जरूरत है। राजनीतिज्ञ लोग हमेशा उसी मुद्दे को छेड़ते हैं जिससे उनके और सत्ता के बीच की दूरी कम हो। सामाजिक गणित के जोड़ घटाव में वे माहिर होते हैं, जरूरत है उनके गणित को समझने की और लोगों को तार्किक तरीके से समझाने की ताकि जो भी वह स्मूथे हो।

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2 Responses to जातियों से भरे देश में जातीय जनगणना के खिलाफ मार्च

  1. RAJ SINH says:

    यह बताना समीचीन होगा की अलग अलग राजनैतिक विचारधारा के वाहक , डा. आंबेडकर ,डा.लोहिया और सावरकर ने भी जाति को ही भारत के पतन ,पराजय और सदियों की विकासहीन जड़ता के लिए जिम्मेदार माना था तथा जाति तोड़ने और जाति प्रथा को समूल नाश करने के लिए प्रयास और संघर्ष किये थे .
    और अब यही विष हमारे लोकतंत्र की जड़ों में छुद्र स्वार्थी जनों द्वारा सींचा और इस विषबेल को पालपोस रहा है और देश को और बांटता जा रहा है .कोई भी राजनैतिक दल और नेता इस से शायद ही मुक्त हो .’ जतिनाश ‘ ही भारत की एकता का सीमेंट बन सकता है और वही विजन इंडिया ‘ २०२० ‘ का वाहक भी .

    मेरी भी जाति हिन्दुस्तानी !

  2. Hey mate, thanks for writing but this post doesn’t format correctly in Safari it is showing only half the page.

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