ता उम्र ढूढती रही अपनी मोहब्बत का मकां मीना कुमारी

सुनील दत्ता//

काश ! मीना जी एक औरत होती सिर्फ औरत | तो मुमकिन था कि मेरी कलम में
सरगोशी न होती | वे तो विशाल हृदयागिनी , प्रेम पुजारिन , शायरा , अदाकारा ,
रूप यौवन की मालिकन , सीरत की धरोहर , ममता की देवी ”महजबीन” थी |
जिन्दगी की एक पूरी गजल | जिसमे वफा का तरन्नुम था | लम्हों को पीने वाले
उनके लरजते होठो पर आबे कौसर की बूंदे शबनम की तरह टपकती थी | प्यार के
एहसास से भी प्यार मगर संगदिल कुदरत ने दिल को आँखे तो दी नजर को जुबा नही
दी | तन्हा ,ता उम्र ढूढती रही शहरे — दिल में अपनी मोहब्बत का मकान नही
मिला | कुछ पल के लिए ठहरी पर महबूब ही बेवफा निकले | फिर सुकू के लिए निजी
डायरी के पन्नो पर घायल जज्बातों को दफनाती रही — मरते दम तक |

मीना जी लगभग 35 वर्ष पहले कब्र में तो दफन हो गयी मगर आज भी दिल और रूह के
सुकून के वास्ते दुआ में उनके हाथ फलक की तरफ उठा करते है |

1 अगस्त , 1932 को बम्बई के दादर स्थित रूपतारा स्टूडियो के सामने वाली चाल
में अली बक्श और प्रभावती ( इकबाल ) की दूसरी संतान के रूप में महजबीन का
जन्म हुआ था | दौलत के भूखे पिता ने चार साल की नन्ही सी महजबीन को
निर्देशक विजय भट के सामने बाल कलाकार के रूप में लेने की पेशकश की | विजय
भट ने 1935 में नन्ही सी महजबीन को बेबी मीना नाम देकर फिल्म ”लेदर फेस ”
में बेजान कैमरे के सामने खड़ा कर दिया | बचपन का नटखटपन , अल्हड़ता ,
मासूमियत और वात्सल्य ने नन्ही सी मीना के चेहरे पर एक नकली चेहरे का लिबास
डाल दिया | परिवार की भूख मिटाने के लिए वे नाजुक उम्र में दौलते –
दरख्शा बन गयी | जैसी ही जवानी ने दरवाजे पर दस्तक दी और बेबी मीना ने
अगड़ाई ली चौदह वर्ष की कमसिन उम्र में उसे नायिका मीनाकुमारी बना दिया गया
| एक अभिनेत्री के तौर पर मीना कुमारी अपने चाहने वालो के लिए परिचय की
मोहताज नही | नकली किरदारों में मेकअप किया हुआ उनका चेहरा अक्सर दिख जाता
है | उनके चेहरे पर उठने वाले भाव और आवाज दर्शको के दिलो — दिमाग पर छा
जाते है | मगर असल में महजबीन कैमरे के पीछे रहती है जो इंसानों से प्यार
करती है | वफ़ा की उम्मीद करती है और पवित्र रिश्ते का विश्वास करती है |

मीनाकुमारी ने स्वर्गीय कमाल अमरोही से बेपनाह मोहब्बत की | उनसे निकाह
किया और उनकी बेगम कहलायी | मगर अपने वैवाहिक जीवन के दो वर्षो को ही वे
जन्नत कहती थी | ये भी कहा जाता है कि मीनाकुमारी ने कमाल साहब से तलाक ले
लिया था | बाद में फिर कमाल साहब ने मीना जी का निकाह अपने सेक्रेटरी से
करवाया और तलाक दिलवाकर निकाह किया | कमाल साहब खुद भी मशहूर फिल्मकार थे
मगर आज भी मीनाकुमारी के बगैर उनका परिचय पूरा नही होता | कमाल साहब को जीते
जी इस बात का सबसे बड़ा दुःख था कि वे अपनी पत्नी के परिचय से पहले जाने
जाते है , नतीजा इस रिश्ते में इतनी कडवाहट आई की कमाल साहब मीना जी को
डंडो से पिटते थे | अश्क उनके गालो पर तैरता था | बेबसी आँखों से चिल्लाती
थी , और ढलते सूरज के साथ दहशत उन्हें निचोड़ती थी |

यदि देखा जाए तो पत्नी की शोहरत से पति को चिढ थी | अमरोही

साहब का नाम था पर मीना जी के नाम के नीचे | यह उनके लिए एक पीड़ा थी , जिस

नाते पूरी जिन्दगी उन्होंने मीना जी को खराब बेगम कहा | शौहर से प्यार की

भूखी मीना जी ने बाहर प्यार तलाशना शुरू किया

एक रिश्ते की चाहत की बिना पर रिश्तेदार सहित कई लोग उनकी जिन्दगी में आये |

पर सबने उन्हें छला | उनसे बेवफाई की | ईनाम में उन्हें सिर्फ अपने दामन

पर दाग मिले | मीना जी के करीबियों में कई लोग आज भी मौजूद है | वे भले ही

सच को अपने होठो पर नही लाते मगर मीना जी का चेहरा उनकी कामयाबी पर जरुर

दिखता है | उनके करीबियों में गुलजार , राजेन्द्र कुमार , महमूद

,धर्मेन्द्र और सावन कुमार टाक प्रमुख माने जाते है | मीनाजी ने बहुत
इमानदारी से अपने करीबियों का जिक्र किया है | गुलजार को वे सबसे जहीन
मानती थी , इसलिए वे अपनी निजी डायरी अमानत के तौर पर सौप गयी | मीनाजी
भावनात्मक रूप से धर्मेन्द्र से इस कदर जुडी थी की उनके रिश्ते की खैरियत
भारत का राष्ट्रपति पूछता था | मशहूर छायाकार राम औरंगाबादकर के साथ नेहरु
जी की मूर्ति लगवाने के सिलसिले में एक बार वे राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन
से मिलने गयी तो उन्होंने पहला सवाल किया ” तुम्हारा बॉय फ्रेंड
धर्मेन्द्र कैसा है ? यही नही जब उनके करीबियों ने उनसे कहा कि जिस व्यक्ति
यानी धर्मेन्द्र की मदद के लिए आप जान तक कुर्बान करने को तैयार है वे
बगैर मतलब ……आपकी सूरत तक देखना पसंद नही करता ?

मीना जी मुस्कुराई ” धरम के साथ फिल्मे साइन करने से धरम के कैरियर पर
बहुत असर पड़ सकता है | मेरा नाम निर्माताओं से उसका कैरियर खरीद सकता है
|वाकई ” फूल और पत्थर ” ने धर्मेन्द्र का कैरियर सवार दिया || फिर मदद पर
मीना जी गहरी सांस लेती थी ‘, मैं इसलिए मदद करती हूँ कि मेरे दिल को सकूं
मिलता है | शुक्रिया तो मुझे कहना चाहिए उसे | आज मुझे किसी नए नाम या
शोहरत की आवश्यकता नही जो मैं किसी से उसी चीज की भीख मांगती नजर आऊ| इससे
बढिया तो मैं मदद न करना बेहतर समझती हूँ |

धर्मेन्द्र ही सही न्यू कमर्स के लिए वे हमख्याल थी –” जब बच्चा पहली बार
चलना सीखता है , उसके गिरते डगमगाते हुए कदम , किसी ऊँगली का सहारा तलाश
करते है | फिल्म इंडस्ट्री में आने वाला हर नया फनकार उस बच्चे की तरह
कमजोर होता है | उसकी आँखे भी , किसी ना किसी सहारे को लगातार उठती रहती है
| कोई उसकी तरफ हाथ बढा देता है तब ही उसके पाँव यहा टिक जाते है | हमने
भी अपने जमाने में ऐसी उम्मीदे , ऐसे सहारे , ऐसे मौके तलाश किए थे | आज
हमारे मजबूत कदमो के नीचे सहारा देने वाले हाथो की बुनियाद रखी हुई है | एक
मीनाकुमारी बन जाने से , इंडस्ट्री किसी और को मीनाकुमारी बनाने से , न तो
इनकार ही कर सकती है और न ही उसका रास्ता रोक सकती है | मदद करने से किसी
का मुकद्दर नही बदला जा सकता |”

मीना जी को माल , जर , इलाके और जागीर की परवाह नही थी | उन्हें तो सिर्फ
प्यार चाहिए था | किरदारों के लिबास को ज्यादा देर तक पहने रहने से जिन्दगी
का पाँव शीशे के टुकडो से छलनी हो जाता है | मीना जी तो हमेशा जख्मी पांवो
को कठोर — पत्थरों पर रखती थी | प्यार उनके लिए जन्नत था और जन्नत के लिए
मौत की तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है | जिसने भी उनके पास मजबूर बनके झोली
फैलाया , उन्होंने भर दी |चाहे क्यू न उनकी मदद को उसने ऐय्याशी में उड़ाया
हो | जब भी परिवार वालो ने उनकी दरियादिली पर मदद का मजाक उड़ाया तो
उन्होंने मुस्कुराकर कहा ” मुझे मदद का कोई मलाल नही | बदकिस्मती तो उसकी
है लिहाजा उसे अफ़सोस करना चाहिए की उसने उम्र भर के लिए अपने एक सहारे तो
तोड़ दिया | “” मीनाजी ने प्यार किया | हर कोई प्यार करता है | पर शायद कुछ
लोगो की तरह बदकिस्मती थी की उनका प्यार पाने वालो ने उसे कबूल नही किया और
उनका प्यार सरे आम नीलाम होता रहा | उनके प्यार ने उनके चेहरे पर हमेशा के
लिए बदनामी का दाग लगा दिया | काश ! उनकी तक़दीर ने उनके प्यार की गुलजार
में बैठाया होता तो आज उनकी पैंतीस साल पुरानी लाश को बदनामी का खौफ न होता
| संगदिल जमाने ने भले ही उन पर ताने मारे मगर उन्हें अपने प्यार पर नाज
था –” दोस्त को प्यार भी किया है तो कौन सा गुनाह कर दिया है ? जरूरत के
वक्त कौन किसका साथ नही चाहता ? अंधेरो ने चिरागों की तमन्ना की है , खिजा
ने बहारों की — शायरों ने उनकी तमन्ना को भी सजदा क्या है तो क्या एक
मामूली महजबीन को उन जैसा हक नही मिल सकता ? “”

मीना जी न केवल प्यार किया बल्कि प्यार के प्रति उनका अपना फलसफा था |
उन्होंने न केवल प्यार को समझा बल्कि परिभाषित भी किया ……”प्यार इंसान
के जिस्म की रूह है | मैं सोच भी नही सकती की एक आम इंसान बगैर रूह के ,
जिस्म को कैसे और कब तक ज़िंदा रख सकता है ? अगर कोई कर सकने का दावा कर भी
सकता है , तो मैं कहूँगी , वह अपनी लाश को रेशमी लिबास पहनाकर जीने के भरम
से जी बहला रहा है | ”

ऐसा कहा जाता है की प्यार का उन्हें जूनून था , उनका मिजाज भी शायराना था
और उन्होंने बेहतर शायरी भी की है | प्यार में वे पागलपन की हद तक गुजर
जाती थी | ” फूल और पत्थर ” की सफलता के बाद धर्मेन्द्र का संदली चेहरा फिर उनकी आँखों के सामने नही आया | वे तन्हा हो गयी …..मरते दम तक तन्हा रही |

आखरी सांस में धर्मेन्द्र की महक थी और आखरी समय में भी …………..”
जैसे शाम का डूबा हुआ सूरज , सुबह फिर नई रौशनी लेकर आता है वैसे ही मेरा
धरम वापस आएगा ” | मीना जी विशाल अदाकारा थी | हृदयागिनी , प्रेम पुजारिन
,ममता की देवी , महजबीन | औरत के दोयम दर्जे के अस्तित्व पर उन्हें आक्रोश
और अफ़सोस था | जब उनकी बदनामी उनकी आफियत का कत्ल कर देती तो उनके दिल की
आँखों से आंसुओं का समन्दर बह जाता ….. “” क्या लोग शायरों की जुबा समझते
है , औरत की नही ? यह प्रश्न ता उम्र उठता रहेगा |

आखिर कौन देगा इसका जबाब , उन्हें सभी ने तो छला |

उनकी निजी जिन्दगी इतनी तल्ख हो गयी थी की इस सवाल का जबाब वे स्वंय तलाशने
लगी | ” छोटी बहू “” के किरदार में एक बार उन्होंने मय का प्याला पकड़ा तो
ताउम्र वह उनका सहारा बन गया और ” सिरोसिस आफ लीवर ” से उन्हें 31मार्च
1972 को मौत मयस्सर हुई | शून्य के भी आंसू आखो से लहू बनकर टपके | मीना
जी नहाई | कफ़न में लपेटकर उनके ठन्डे जिस्म को दफना दिया गया | हमेशा -
हमेशा के लिए उनका जिस्म , उनकी रूह और उनका प्यार एक ख्वाब बन गया |मीना
जी खुद की लिखी नज्मो में जो दर्द था वो लिखती है

” मसर्रत पे रिवाजो का सख्त पहरा है ,

न जाने कौन सी उम्मीद पे दिल ठहरा है ,

तेरी आँखों में झलकते हुए इस गम की कसम .

ऐ दोस्त ! दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है |

……………………………..कबीर .( माजी और गुलजार
द्वारा लिखित पुस्तक ”मीनाकुमारी ” पर आधारित )

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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