नील -आन्दोलन और किसानों के लिए सबक

सुनील दत्ता,

इस देश में नील की खेती की शुरुआत फ्रांसीसियों ने की थी लेकिन अंग्रेजों ने उसे आगे बढाया। 1778  में कैरेल ब्लूम नामक अंग्रेज ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल से बड़े पैमाने पर नील की खेती करने का अनुरोध किया। इसे कम्पनी के लिए बड़े मुनाफे का साधन बताया। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद, कपड़ों में डालने के लिए नील की मांग फ़्रांस, इटली, आस्ट्रेलिया, मिस्र व ईरान आदि देशों में भी बढ़ रही थी। इसीलिए कम्पनी सरकार ने नील की खेती को बढावा दिया।  बंगाल और बिहार इसकी खेती के प्रमुख क्षेत्र बने। इसके अलावा उड़ीसा, बनारस, इलाहाबाद, गाजीपुर आदि जगहों पर नील उत्पादन को बढावा दिया गया। नील की खेती के अंग्रेज मालिकों को लोग निलहे साहब कहकर सम्बोधित करते थे। प्रारंभ में निलहे साहब किसानों से नील की खेती करवाते थे। फिर ईस्ट इंडिया कम्पनी को बेच देते थे। कम्पनी उसे ब्रिटेन तथा अन्य देशों को निर्यात करके भारी लाभ कमाती थी। निलहे साहब किसानों को निहायत अन्याय पूर्ण अनुबंधों के साथ नील की खेती करने के लिए हर तरह की जोर जबरदस्ती को मजबूर कर देते थे। नील की खेती के लिए बीज आदि को किसानो को महगे कर्ज़ के रूप में देकर उनसे अत्यंत सस्ते मूल्य पर नील खरीद लेते थे। खेती का सारा खर्च भी किसानों से ही वसूलते थे। फलत: किसान कभी भी उनके कर्ज़ से मुक्त नहीं हो पाते थे। समूचे नील उत्पादन को सौप देने के बावजूद कर्जो की पूरी अदायगी नहीं कर पाते थे। बकाया कर्ज़ व ब्याज की राशि को  निलहे साहबों द्वारा अगली बार की खेती के लिए, दिए जाने वाले कर्जो में से काट लिया जाता था। फलस्वरूप किसानों पर कर्ज़ की रकम बढ़ती जाती थी। व्यवहारत: उसे चुकता न कर पाने के कारण भी वह पुश्त दर पुश्त निलहे साहबो  के साथ गुलाम की तरह बंधा रहता था। निलहे साहबों द्वारा इतिहास में कुख्यात भयंकर शोषण अत्याचार को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर बना रहता था। कम्पनी की पुलिस-प्रशासन से लेकर निलहे साहबों के अपने लठैतों का दल -बल किसानों को नील की खेती के शोषण, लूट, अन्याय-अत्याचार को सहने के लिए मजबूर किये रहता था। 1833 में ब्रिटेन की सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की इजारेदारी खत्म कर दी। अब हर अंग्रेज को अधिकार दे दिया गया कि वह भारत में आ कर इस व्यवसाय के लिए बस सकता था। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने बड़ी-बड़ी जमींदारिया खरीदकर उसमें नील की खेती शुरू कर दी। इन जमींदारियों में “बंगाल इंडिगो कम्पनी” की जमींदारी सबसे बड़ी थी। उसने बंगाल के नदिया जिले के 594 गावों की जमींदारी हथिया ली थी। नील की इस बढ़ती व्यावसायिक खेती ने उसमें लगे  किसानों के भरण-पोषण व जीवन को अत्यंत कष्ट कर बना दिया था।  नील किसानों की दुर्दशा को उस समय के बंगाली समाचार-पत्रों में बारम्बार उठाया गया। बंगाल के संभ्रांत व प्रबुद्ध हिस्से इन किसानों के ऊपर किये जा रहे भयंकर शोषण व अत्याचार को घटाने के लिए शासन-प्रशासन से अपील पर अपील करते रहे। 1850 में रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित “तत्वबोधिनी “पत्रिका ने प्रकाशित किया —–”जो किसान जमीन में  धान या दूसरा अन्न बोकर आसानी से सारे साल परिवार का पेट पाल सकता था। उसे  निलहे साहब के नील बोने से कर्ज़ के मजबूत जाल के अलावा कुछ नहीं मिल पाता था। अत्यधिक शक्तिशाली निलहे साहबों की अनुमति के खिलाफ जाना दीन-दरिद्र प्रजा के लिए सम्भव नहीं है।
बढ़ते शोषण अत्याचार के विरुद्ध नील की खेती करने वाले किसान 1850 के बाद से ही आंदोलित व संगठित हुए। वे नदिया जिले में वे पहले संगठित हुए। वहां के कई गावों के किसानों ने नील की खेती न करने की शपथ ली। दो वर्ष (1858-60 )के भीतर ही नील की खेती न करने की शपथ का सिलसिला बंगाल के अन्य जिलों और गावों में भी फ़ैल गया। निलहे साहबों ने इसके विरोध में किसानों पर अत्याचार और जुल्म करना शुरू कर दिया। नील की खेती न करने को ढृढ़ निश्चयी आन्दोलन रुका नहीं। किसानों के अलावा बंगाली समाज के सुशिक्षित हिस्से का एक धड़ा भी नील किसानों की दुर्दशा और विरोध को  लेखो, नाटकों, गीतों के माध्यम से पूरे बंगाल के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों  में फैलाने में लगा हुआ था। फलस्वरूप नील की खेती का विरोध नील मालिकों और कम्पनी शासन के विरुद्ध विद्रोह का रूप लेने लगा था।
कम्पनी सरकार ने भी मामले कि नजाकत को देखते हुए नील कमीशन नियुक्त कर दिया। कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में नील किसानों पर होने वाले भारी शोषण ,अत्याचार को  कबूलते हुए उनकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव भी दिया। 1860 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी। सुरक्षा के सुझाव के साथ भी बंगाल के किसान नील की खेती करने के लिए बिलकुल तैयार नहीं हुए।  लिहाज़ा बंगाल में नील की खेती समाप्त हो गयी। किसानों के इस अहिंसात्मक, परन्तु जोरदार आन्दोलन के साथ -साथ बंगाल से नील की खेती खत्म होने का एक दूसरा प्रमुख कारण यह भी था कि अब एनिलिन डाई  से कृतिम नील बनाया जाने लगा था। इसके बावजूद नील की खेती पूरी तरह से खत्म नहीं हुई।  बिहार में वह खेती अगले पचास सालों तक चलती रही। नील की खेती कम्पनी शासन के अंतर्गत शुरू हुई पहली बड़ी व्यावसायिक खेती थी। केवल औद्योगिक आवश्यकता के लिए की जाने वाली खेती थी। धनाढ्य व ताकतवर नील मालिकों और गरीब तथा शक्तिहीन नील किसानों के बीच एक अनुबंध खेती थी। किसान  के गाव-घर में उसका कोई इस्तेमाल नहीं था। जबकि इस खेती से नील मालिको, नील कम्पनियों और ईस्ट इंडिया कम्पनी को लाभ ही लाभ था। ब्रिटिश राज द्वारा बनाये व लागू किये गये सारे कानूनों का लाभ भी मिल मालिकों को मिलता था, लेकिन किसानों को उन्हीं कानूनों के तहत दंड का भागीदार होना पड़ता था। आन्दोलन के सिवाय उनके पास खेती और जीवन के बचाव का दूसरा कोई रास्ता नहीं  रह गया था। आज 150 वर्ष बाद, स्थितियां चाहे जितनी बदल गयी हो,  लेकिन नील की खेती की वे चारित्रिक विशेषताए ज्यो-कि त्यों बनी हुई है और पहले से कंहीं ज्यादा व्यापक हो गयी है। बढ़ते बाजारवादी, वैश्वीकरण के साथ पिछले 20 सालों में तो कम्पनियों के द्वारा अपने बीजों के साथ ठेके पर खेती व अनुबंध खेती को खुलेआम बढावा दिया जा रहा है। फिर उसका नतीजा भी नील की खेती जैसा ही आ रहा है। कृषि के उत्पादन व्यापार में लगी देशी -विदेशी कम्पनियां व्यावसायिक व गैर व्यावसायिक फसलों से लाभ कमा रही है। परन्तु किसान कर्जो में फंसते जा रहे हैं। तबसे आज तक में फर्क है तो यह कि वह देश के बाजारवादी, वैश्वीकरण का प्रारम्भिक दौर था। इसे विदेशी ब्रिटिश राज द्वारा लागू किया जा रहा था। किसानों के नग्न शोषण के साथ पुलिस बलों, लठैतो, गुंडों के जरिये किसानों का भारी दमन भी होता रहा था। आज हम वैश्वीकरण के चरम विकास के दौर में है। हर तरह की खेती का व्यवसायी करण और अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया है। विदेशी कम्पनियों के साथ देश की धनाढ्य कम्पनिया, देश की जनतांत्रिक कही जाने वाली सत्ता –सरकारें, आधुनिक खेती के साधनों और बाजारों के जरिये किसानों के शोषण, लूट को बढाती जा रही है। तब से आज तक के  दौर में एक फर्क और भी है, वह यह कि उस समय के बंगाल के प्रबुद्ध संभ्रांत वर्ग का खास हिस्सा नील किसानों के समर्थन में खड़ा हो गया था। किन्तु आज का बौद्धिक व उच्च हिस्सा आमतौर पर किसानों के साथ खड़ा होने वाला नहीं है। उनकी बढती समस्याओं को उठाने वाला भी नहीं है। नील किसानों के पास भी संगठित होने और आंदोलित होने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था। आज के किसानों के पास  भी खेती का, जमीन का मालिकाना ले रही धनाढ्य कम्पनियों और सहायता-सहयोग दे रही सत्ता – सरकारों का विरोध करने और उसके लिए संगठित आन्दोलन चलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
फिर भी मुझे उम्मीद के रूप में दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है–

कुछ भी बन बस कायर मत बन ।
ठोकर मार पटक मत माथा
तेरी राह रोकते पाहन
कुछ भी बन बस कायर मत बन ।

-सुनील दत्ता
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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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