नक्सली हमला : आंसू बहाने तक सीमित न हों हमारी संवेदनाएं

अनुराग मिश्र,

छत्तीसगढ़ के सुकमा में कांग्रेसी नेताओं की परिवर्तन रैली पर हुए नक्सली हमले के बाद राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकारें हिली हुई हैं। इतना ही नहीं इन हमलों के बाद एक बार फिर ख़ुफ़िया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। ठीक वैसे ही निशान जैसे वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीऍफ़ कैम्प पर हुए नक्सली हमले के बाद खड़े हुए थे। उस समय नक्सलियों के खिलाफ कार्यवाही के दावें बड़े जोर शोर से किये गए था। राज्य की भाजपा सरकार से लेकर केंद्र की कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों पर सख्त कार्यवाही का भरोसा दिलाया था। पर नतीजा ढाक के तीन पात जैसा रहा। सवाल यह उठता है कि तेरह राज्यों के लगभग तीन सौ से अधिक जिलों में अपनी पैठ जमाए बैठे नक्सलियों से निपटने और उनके खात्मे के लिए कोई ठोस रणनीति अब तक क्यों नहीं बनी।

इसका सीधा जवाब है इस मसले का भी राजनीतिकरण हो जाना। दरअसल किसी भी दल ने इस मसले पर गंभीरता से विचार किया ही नहीं । वो चाहे देश की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस हो या फिर राज्य की सत्ता पर आसीन भाजपा हो। वोट बैंक की राजनीति में दोनों ही राजनैतिक दलों के आकाओं ने यह सोचने की जहमत नहीं की कि आम आदमी, राजनेताओं और सुरक्षा बलों के साथ खूनी होली खेलने वाले और लाशो का ढेर लगाकर प्रदेश में दहशत का पर्याय बन चुकी नकसली समस्या का समाधान क्या हो ? देश के राजनैतिक इतिहास में इससे पूर्व शायद ही कोई ऐसी बड़ी घटना घटी हो जिसमें एक साथ इतने नेताओं को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया हो। ऐसे में यह विचार करने योग्य प्रश्न है कि आखिर हमारी सुरक्षा व्यवस्था में कहां छेद रह गया जिसके चलते इतनी बड़ी वारदात हो गयी।

अगर हम परिस्थतियों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि यह घटना सुरक्षा और खुफियां एजेंसियों की आपसी सामंजस्य की कमी का परिणाम हैं। पर मजे की बात ये है कि कोई भी घटना की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। यहाँ गौर करने योग्य बात ये है कि घटना की घटित होने से लेकर मीडिया में सुर्ख़ियों बने रहने तक घटना के घटित होने के लिए जिम्मेदार लोग इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए बेहतर और कारगर योजना बनाने की बात करते हैं पर समय के साथ सारे दावे और योजनायें कागजों की खूबसूरती बढ़ाने के ही काम आते हैं। इसलिए बेहतर होगा नक्सली हमले के लिये जिम्मेदार संस्थाएं यानि हमारी सरकारें, सुरक्षा एजेंसीज और ख़ुफ़िया विभाग अपनी कथनी और करनी में एकरूपता लाये। यह वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने या कमजोर होने का नहीं बल्कि उचित रणनीति बनाकर नकसली समस्या को समूल जड़ से खत्म करने का है। अन्यथा वो दिन दूर नहीं होगा जब राज्यों से निकलकर नक्सली लोकतान्त्रिक अस्मिता के प्रतीक हमारी राजधानी दिल्ली पर भी हमले का साहस जुटा लेंगे।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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