‘रोशनी हादसे’ पर खामोश जेएनयू

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सकते में है। जेएनयू की कोरियाई लैंग्वेज की छात्रा रोशनी प्रिया पर कातिलाना हमले करने वाला आकाश मर चुका है और रोशनी प्रिया दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत और जिंदगी के बीच झूल रही है। जिस जेहनी हालत में आकाश ने रोशनी पर हमला किया था, उससे एक साथ कई सवाल खड़े होते हैं। आकाश के साथ ऐसा क्या हुआ कि उसने रोशनी की हस्ती मिटाने के साथ खुद को भी खत्म करने की ठान ली? यह ख्याल कई दिनों तक उसके जेहन में चलता रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी? कहा जा रहा है कि आकाश पिछले कई दिनों से रोशनी के पीछे पड़ा हुआ था। यदि यह सच है तो रोशनी ने इसकी शिकायत कालेज प्रशासन से क्यों नहीं की? जेएनयू कैंपस के अंदर छात्राओं को ‘सेक्सुअल या मेंटल हरासमेंट’ से बचाने के लिए छात्रों और शिक्षकों की कमेटियां भी बनी हुई हैं। आकाश के प्रकरण में रोशनी ने इन कमेटियों का सहारा क्यों नहीं लिया? या फिर इन कमेटियों को इस बात की भनक क्यों नहीं लगी कि आकाश रोशनी को परेशान कर रहा है? आकाश के दोस्तों को उसकी जेहनी हालत की जानकारी जरूर रही होगी, उनलोगों ने आकाश को सही ट्रैक पर लाने की कोशिश क्यों नहीं की? या फिर यह मामला जेएनयू कैंपस में ‘लिव इन रिलेशन’ और ‘ब्रेकअप’ की त्रासदी से जुड़ा है, जैसा कि बताया जा रहा है? आम तौर पर राष्टÑीय व अंतर्राष्टÑीय मसलों पर बेबाकी के साथ मुखर होने वाला जेएनयू कैंपस इन सवालों से आंख चुरा रहा है। छात्र गमगीन और फिक्रमंद तो हैं, लेकिन लेकिन जेएनयू कैंपस में हुए इस खौफनाक हादसे की तह को टटोलने से बच रहे हैं। प्रोफेसर और जेएनयू के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी सतही तौर पर सिर्फ इतना ही कह रहे हैं कि पुलिस इस हत्याकांड की तफ्तीश कर रही है, जल्द ही सबकुछ सामने आ जाएगा।
जेएनयू की तहजीब पर सवाल
जेएनयू शिक्षा का एक बहुत बड़ा मरकज तो है ही लेकिन इससे अधिक यह अपनी तहजीब के लिए जाना जाता है। शालीनता और खुलापन इसकी अहम पहचान है। छात्र और छात्राओं को बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ उन्हें कंफर्टेबल जोन में रखने की स्वाभाविक व्यवस्था की गई है। जेएनयू अपने आप में एक मुकम्मल दुनिया है। यही वजह है कि देश और विदेश के छात्र यहां शिक्षा हासिल करने के लिए आते हैं। रोशनी पर कातिलाना हमले ने इसकी तहजीबीयत पर सवालिया निशान लगा दिया है। यह हादसा उस मानसिकता को ईमानदारी से टटोलने की मांग करती है, जो एक छात्र को अपनी सहपाठी के प्रति इस कदर उग्र बनाता है कि वह कुल्हाड़ी, चाकू, पिस्तौल और जहर की बोतल लेकर उसकी हत्या करने के इरादे से निकल पड़ता है और फिर अपनी कूव्वत से सहपाठी पर हमला करने के बाद जहर की बोतल अपने हलक के नीचे उड़ेलने के साथ ही अपनी सहरग को भी काट डालता है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि बेहतरीन इल्म हासिल करने के इरादे से जेनएयू में दाखिला लेने वाला आकाश ने आखिरकार यह कदम क्यों उठाया?
रोशनी की बेरुखी
प्रारंभिक तफ्तीश में यह बात सामने आयी है कि आकाश और रोशनी एक दूसरे के काफी करीब रह चुके थे। जेएनयू की तहजीबीयत भी इस तरह की करीबी की इजाजत देती है। मुल्क के दूर दराज के क्षेत्रों से यहां आने के बाद जब छात्र व छात्राओं को अचानक खुला हुआ माहौल मिलता है तो वे एक दूसरे के करीब आ ही जाते हैं। जेएनयू कैंपस इस तरह की करीबी को सहजता से लेता है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है, जब किसी कारणवश इस तरह के संबंधों में तल्खी आ जाती है। इस भयावह घटना को अंजाम देने के पूर्व अकाश ने एक पत्र में इस बात को विस्तार से लिखा था कि रोशनी उसके काफी करीब थी और पिछले कुछ दिनों से उसे न सिर्फ इग्नोर कर रही थी बल्कि दोस्तों के बीच उसका मखौल भी उड़ा रही थी। रोशनी की बेरुखी से वह बुरी तरह से आहत था और अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा था कि रोशनी के साथ उसके ताल्लुकात फिर से बेहतर हो जाये। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आकाश एक संवेदनशील लड़का था। फेसबुक पर उसके स्टेटस से भी इस बात का पता चलता है। अपने स्टेटस में उसने लिख रखा था कि शिक्षक और वक्त और दोनों सिखाते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि शिक्षक सिखाने के बाद इम्तिहान लेते हैं और वक्त इम्तिहान लेकर सिखाता है। इस संवेदनशील छात्र को रोशनी की बेरुखी बुरी तरह से खटक रही थी और अंतत: उसने रोशनी का खात्मा करने का निश्चय कर लिया। हालांकि रोशनी के भाई सुधीर का यही कहना है कि रोशनी एक पढ़ने-लिखने वाली लड़की थी और उसका इन सब बातों से कोई संबंध नहीं था।
जेएनयू में रिलेशनशिप और ब्रेकअप आम बात है। समय के साथ वहां के छात्र इसके अभ्यस्त हो जाते हैं। रिलेशनशिप और ब्रेकअप की खबरें उन्हें चौंकाती नहीं हैं। वहां का खुला माहौल भी इस तरह के संबंधों को प्रोत्साहित करता है। कहा भी जाता है कि जब दुनिया सोती है तो जेएनयू की रात जवां होती है। वहां के खुलेपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रात में विभिन्न बूथों पर आपको सहजता से कांडम मिल सकते हैं। हालांकि इसके पीछे तर्क यही दिया जाता है कि ऐसी व्यवस्था छात्र व छात्राओं को यौन संक्रमण से बचाने के लिए की गई है। शैक्षणिक स्थल पर कांडम की बिक्री के खिलाफ नैतिकतावादी चाहे जो कहे, जेएनयू इसे प्रगति का सूचक मानता है। ऐसे खुले माहौल में प्रारंभिक दौर में छात्र व छात्राओं को खुद को संभालना जरा मुश्किल होता है। बाद में जब उन्हें गलती का अहसास होता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। आकाश और रोशनी कहां तक इंवॉल्व थे, यह जांच का विषय है, लेकिन इतना तो तय है कि रोशनी अब उस रिश्ते से बाहर निकलना चाह रही थी और एक हद तक खुद को आकाश से पूरी तरह से दूर कर लिया था। ऐसी परिस्थिति में आकाश को काउंसिलिंग की जरूरत थी। जेएनयू में खुले माहौल को स्थापित कर दिया गया है लेकिन इस माहौल के साइड इफेक्ट से बचाने के लिए छात्रों के लिए काउंसिलिंग सिस्टम ईजाद करने की कभी कोई कोशिश नहीं की गई। आकाश भले ही इस दुनिया से दूर जा चुका है, लेकिन अभी भी कैंपस के अंदर रिलेशनशिप और ब्रेकअप जैसे मसलों का छात्र व छात्राओं पर पड़ने वाले प्रभाव की ईमानदार समीक्षा नहीं की जा रही है। कैंपस के अंदर इस तरह का फिर कोई हादसा न हो, इसके लिए जरूरी है इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करने की।
जेएनयू की छवि को धक्का
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस हादसे से जेएनयू की छवि को जोरदार धक्का लगा है। रोशनी पर कातिलाना हमले के बाद से जेएनयू लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। उन बच्चों के माता-पिता काफी चिंतित हैं, जो इस वक्त जेएनयू में शिक्षा हासिल कर रहे हैं। जेएनयू की प्रतिष्ठा पूरे मुल्क में है। ऐसे में इस हादसे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। शोध के लिए विख्यात जेएनयू को इस पर भी शोध करने की जरूरत है कि आखिर यह हादसा क्यों पेश आया और भविष्य में इस तरह के हादसों को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए। कैंपस के अंदर छात्र व छात्राओं को पूरी तरह से फ्री छोड़ना कहां तक उचित है? वैसे फिलहाल जेएनयू प्रशासन इस तरह के सवालों से रू-ब-रू होने की मूड में नहीं दिख रही है। इसे महज एक हादसा मानकर सभी लोग चुप्पी साधे हुये हैं। जबकि जरूरत है रोशनी हादसे पर खुलकर चर्चा करने की। शिक्षा के इस मरकज में अंंधकार के इस कोने को टटोलना जरूरी है। इसे महज एक सनकी दीवाने द्वारा उन्माद की स्थिति में उठाया गया कदम करार नहीं दिया जा सकता।
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